मार्गदर्शन - 34
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई, पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अलैहस्सलाम के महान व्यक्तित्व के बारे में कहते हैं।
मैं केवल औपचारिकता के लिए और हज़ारों बार दोहराए जा चुके वाक्य के रूप में नहीं कह रहा हूं बल्कि वास्तव में मेरे लिए संभव नहीं है, मेरे पास शब्द नहीं हैं, मेरे दिल में इतनी क्षमता नहीं है और मन में इतनी योग्यता नहीं है कि इस महान हस्ती के उच्च स्थान का गुणगान कर सकूं। एक इंसान, एक युवती और इतने गुण, इतनी विशेषताएं, इतनी महानता। पैग़म्बरे इस्लाम उनकी प्रसन्नता को अपनी प्रसन्नता और अपनी प्रसन्नता को ईश्वर की प्रसन्नता, उनके क्रोध को अपना क्रोध और अपने क्रोध को ईश्वर का क्रोध बताते हैं। ये हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का महान स्थान है। हज़रत अली के साथ उनका वह जीवन, बच्चों का उस प्रकार प्रशिक्षण, क्या संभव है कि इस महान हस्ती के बारे में हम जैसे लोग बात कर सकें?
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अलैहस्सलाम की निष्ठापूर्ण उपासनाओं के बारे में हसन बसरी के एक मशहूर कथन की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि इस्लामी जगत के एक प्रख्यात उपासक हसन बसरी हज़रत फ़ातेमा के बारे में कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री इतनी अधिक उपासना करती थीं और नमाज़ के लिए इतना अधिक खड़ी होती थीं कि उनके दोनों पैर सूज जाया करते थे। कहा गया है कि वे घर का काम करते समय भी ईश्वर का गुणगान और क़ुरआने मजीद की आयतों की तिलावत किया करती थीं।
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ग़रीबों व वंचितों की इस प्रकार मदद किया करती थीं कि जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने एक ग़रीब वृद्ध को हज़रत अली अलैहिस्सलाम के घर भेजा और उसके कहा कि जाओ उनसे अपनी आवश्यकता बयान करो तो फ़ातेमा ने खाल का वह टुकड़ा जिस पर उनके दोनों बेटे इमाम हसन और इमाम हुसैन सोया करते थे, उस दरिद्र व्यक्ति को दे दिया क्योंकि उस समय उनके पास उसके अलावा कुछ नहीं था। उन्होंने उससे कहा इसे ले जा कर बेच दो और उस पैसे से अपनी आवश्यकता पूरी कर लो।
इमाम हसन अलैहिस्सलाम अन्य लोगों के प्रति अपनी माता की दया व कृपा के बारे में कहते हैं। एक रात मेरी माता उपासना के लिए खड़ी हुईं और सुबह तक इबादत करती रहीं। वे निरंतर उपासना व प्रार्थना में लीन रहीं। इमाम हसन कहते हैं कि मैंने सुना कि वे निरंतर लोगों के लिए दुआ कर रही थीं, मुसलमानों के लिए दुआ कर रही थीं और इस्लामी जगत की समस्याओं की समाप्ति के लिए दुआ कर रही थीं। जब सुबह हुई तो मैंने उनसे कहा। जिस तरह आप दूसरों के लिए दुआ कर रही थीं उसी तरह आपने अपने लिए भी कम से कम एक दुआ तो की होती। उन्होंने उत्तर दिया। हे मेरे बेटे! पहले पड़ोसियों और दूसरे लोगों के लिए और फिर अपने लिए दुआ करनी चाहिए। इतनी महान सोच की स्वामी थीं हज़रत फ़ातेमा ज़हरा। अगर इंसान उन्हें अपना आदर्श बना ले तो फ़िर स्वार्थ की भावना उससे दूर हो जाएगी और वह केवल ईश्वर की प्रसन्नता को दृष्टिगत रखेगा।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं। निश्चित रूप से हज़रत फ़ातेमा मुहद्दिसा थीं। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई इस हदीस की व्याख्या करते हुए हज़रत फ़ातेमा के व्यक्तित्व के एक अन्य आश्चर्यजनक पहलू की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि मुहद्देसा का अर्थ है कि फ़रिश्ते उनके पास आते थे, उनसे घुल मिल जाते थे और उनसे बातें करते थे। इस विशेषता की कई अन्य हदीसों से भी पुष्टि होती है। मुहद्दिस या मुहद्दिसा होना शियों से विशेष नहीं है बल्कि शिया और सुन्नी दोनों का मानना है कि इस्लाम के आरंभिक काल में ऐसे लोग थे जिनसे फ़रिश्ते बातें करते थे। हमारी हदीसों में इसका उदाहरण हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा हैं।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता इस बारे में हज़रत मरयम सलामुल्लाह अलैहा की ओर संकेत करते हैं कि वे भी फ़रिश्तों के साथ बात किया करती थीं। वे कहते हैं कि जो क़ुरआने मजीद में हज़रत मरयम के बारे में हैं कि हे मरयम! निश्चय ही ईश्वर ने तुम्हें चुन लिया, तुम्हें पवित्रता प्रदान की और तुम्हें संसार की महिलाओं के मुक़ाबले में चुन लिया, तो उन्हीं शब्दों से फ़रिश्ते हज़रत फ़ातेमा को भी संबोधित करते थे और कहते थे कि हे फ़ातेमा! निश्चय ही ईश्वर ने आपको चुन लिया है, आपको पवित्रता प्रदान की और संसार की महिलाओं के मुक़ाबले में आपको चुन लिया है। इसके बाद इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम इसी हदीस में कहते हैं कि एक रात जब फ़रिश्ते हज़रत फ़ातेमा से बातें कर रहे थे और इसी प्रकार के शब्द प्रयोग कर रहे थे तो उन्होंने पूछा कि क्या मरयम वह महिला नहीं हैं जिन्हें ईश्वर ने पूरे संसार की महिलाओं पर प्राथमिकता दी और चुन लिया है? फ़रिश्तों ने उत्तर में कहा कि मरयम अपने समय की महिलाओं के मुक़ाबले में चुनी गई थीं जबकि आप आरंभ से लेकर अंत तक हर काल की महिलाओं के मुक़ाबले में चुनी गई हैं। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई इस बारे में कहते हैं कि यह बड़ा ही उच्च आध्यात्मिक दर्जा है, हम जैसे साधारण लोग, इस महानता और ऊंचे दर्जे को अपने मन में साक्षात भी नहीं कर सकते बल्कि इसकी सही कल्पना भी नहीं कर सकते।
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा कभी भी सांसारिक मोहमाया में नहीं पड़ीं और उन्होंने कभी भी धन संपत्ति को महत्व नहीं दिया। उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के साथ अपना जीवन अत्यंत सादगी के साथ और बहुत ही साधारण वस्तुओं से आरंभ किया और ग़रीबों वाला जीवन बिताया। यद्यपि वे इस्लाम जगत के सबसे बड़े नेता और पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री थीं लेकिन उन्होंने कभी भी दूसरों के सामने इस पर गर्व नहीं जताया बल्कि आम मुसलमानों विशेष कर ग़रीबों व दरिद्रों की समस्याओं के समाधान के प्रयास में रहीं। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता हज़रत फ़ातेमा के साधारण जीवन और सांसारिक मोहमाया से उनकी अद्वितीय दूरी के बारे में कहते हैं। जब मुसलमानों को विजय मिलने लगी और परिणाम स्वरूप शत्रु का माल और धन संपत्ति मुसलमानों के पास आने का मार्ग खुल गया तब भी पैग़म्बर की बेटी ने, सांसारिक मोहमाया और उन चीज़ों के प्रेम को अपने पास फटकने नहीं दिया जिनकी हर युवती और औरत की लालसा होती है। वे कहते हैं कि हज़रत फ़ातेमा की सबसे बड़ी विशेषता उनकी बंदगी और ईश्वर की उपासना है और इसी लिए उन्हें सिद्दीक़ए कुबरा अर्थात कर्म में सबसे सच्ची महिला की उपाधि दी गई है।
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने दिल को ईश्वर का घर बनाने के लिए इतने अधिक प्रयास किए कि ईमान के उच्चतम दर्जों तक पहुंच गईं। इस प्रकार के ईमान का परिणाम भौतिक और नश्वर बातों की क़ैद से मुक्ति और सदा रहने वाले ईश्वर से जुड़ाव के रूप में सामने आता है और इसका सबसे अच्छा उदाहरण पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री थीं। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई भी कहते हैं कि ईश्वर की बंदगी और उपासना के मार्ग में किया जाने वाला व्यवहारिक प्रयास ही उसे मानवता व आध्यात्मिकता की चोटी पर ले जाता है। वे इस बारे में कहते हैं कि हज़रत फ़ातेमा विदित रूप से एक इंसान, एक महिला और वह भी युवा महिला हैं लेकिन अर्थ में वे एक महान वास्तविकता, एक ईश्वरीय प्रकाश, एक सद्कर्मी बंदी और एक प्रतिष्ठित और चुनी हुई इंसान हैं। उन्हीं के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कहा कि प्रलय के दिन आप ईमान वाले पुरुषों को और फ़ातेमा ईमान वाली महिलाओं को ईश्वरी स्वर्ग की ओर ले जाएंगी। फ़ातेमा ही अली के समान और उनके जोड़ की हैं।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता महिला के बारे में पश्चिम के सभी ग़लत विचारों को रद्द करते हुए कहते हैं कि जिन लोगों ने पूरे इतिहास में, चाहे वह प्राचीन अज्ञानता का काल हो या बीसवीं शताब्दी की अज्ञानता का समय हो, इस बात की कोशिश की है कि औरत को तुच्छ और हीन तथा विदित मोहमाया का रसिया बताएं। उन्होंने औरत को फ़ैशन, अच्छे वस्त्रों, साज सज्जा और सोने चांदी की दासी तथा अपनी विलासिता का साधन बताने की कोशिश की है और उन्होंने व्यवहारिक रूप से इसी मार्ग पर क़दम बढ़ाया है। लेकिन उनके ये विचार और तर्क, हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के उच्च मानवीय स्थान के सूर्य की गर्मी के आगे बर्फ़ की तरह पिघल कर समाप्त हो जाते हैं। इस्लाम, हज़रत फ़ातेमा को महिलाओं के लिए एक आदर्श के रूप में पेश करता है। एक ओर उनका विदित जीवन है जो जेहाद, संघर्ष, ज्ञान, त्याग, बलिदान, बेटी, पत्नी और मां की महान भूमिका, इस्लाम के लिए मक्के से पलायन, सभी राजनैतिक, सैनिक और क्रांतिकारी मैदानों में भरपूर उपस्थिति और अन्य महान गुण हैं जो सभी महान पुरुषों को उनके सामने नतमस्तक होने पर विवश कर देते थे और दूसरी ओर उनका आध्यात्मिक दर्जा है जिसमें वे ईश्वर की उपासना, नमाज़, रुकू, सज्दे, दुआ और ईश्वर के समक्ष प्रार्थना के मैदान में हज़रत अली अलैहिस्सलाम और पैग़म्बर के समान दिखाई देती हैं। औरत यह है, इस्लाम जिस औरत को आदर्श बनाना चाहता है, वह यह है।