Jul १६, २०१७ १५:११ Asia/Kolkata

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक धरोहर समिति की 41वीं बैठक, जुलाई में पोलेंड के क्राकोव शहर में हुई जिसमें अतिग्रहित फ़िलिस्तीन के अलख़लील या हेब्रन शहर को वैश्विक धरोहर के रूप में पंजीकृत किया गया।

ईरान के ऐतिहासिक नगर यज़्द, भारत के अहमदाबाद शहर के पुराने भाग और फ़्रान्स के स्ट्रेसबर्ग शहर के कुछ भागों को भी इस बैठक में वैश्विक धरोहर के रूप में पंजीकृत किया गया। ज़ायोनी प्रधानमंत्री बेनयामिन नेतनयाहू ने अलख़लील नगर के बारे में यूनेस्को के इस फ़ैसले की निंदा की और इसे बकवास बताया। उन्होंने अपने फ़ेसबुक पेज पर एक वीडियो संदेश में कहा कि यक और बकवास फ़ैसला है जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने पारित किया है। ज़ायोनी शासन ने घोषणा की है कि यूनेस्को के इस फ़ैसले की प्रतिक्रिया में अलख़लील नगर में यहूदियों के इतिहास का संग्रहालय बनाया जाएगा।

ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक बयान जारी करके कहा है कि नेतनयाहू ने  यूनेस्को के इस क़दम के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्राईल की सदस्यता के अधिकार के लिए दी जाने वाली राशि में से दस लाख डालर कम करने और यह राशि अलख़लील में रहने वाले यहूदियों के इतिहास के प्रदर्शन के लिए एक संग्रहालय के निर्माण में ख़र्च करने का फ़ैसला किया है। इस्राईल ने वर्ष 1967 में हुई लड़ाई में पश्चिमी तट, पूर्वी बैतुल मुक़द्दस और ग़ज़्ज़ा पट्टी के साथ ही अलख़लील नगर पर क़ब्ज़ा कर लिया था और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली व्यापक आपत्तियों के बावजूद वह अभी तक फ़िलिस्तीनियों के इन क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा किए हुए है।

ज़ायोनी शासन के युद्ध मंत्री एविग्डर लेबरमैन ने भी यूनेस्को के बारे में कहा है कि यह पक्षपात करने वाली और इस्राईल विरोधी संस्था है और इस क़दम से सिद्ध होता है कि फ़िलिस्तीनी प्रशासन, शांति स्थापना के लिए नहीं बल्कि इस्राईल की छवि बिगाड़ने के लिए प्रयास कर रहा है। ज़ायोनी विदेश मंत्रालय ने भी इसे कलंक बताया है। ज़ायोनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अमानुएल नाशोन ने भी अपने ट्वीटर पेज पर यूनेस्को के इस क़दम की निंदा करते हुए लिखाः धिक्कार हो यूनेस्को! यह क़दम इस संस्था के माथे पर कलंक है।

एक फ़िलिस्तीनी क्षेत्र के रूप में अलख़लील शहर को वैश्विक धरोहर के रूप में पंजीकृत करने के यूनेस्को के फ़ैसले के बाद अमरीका ने भी घोषणा की है कि वह यूनेस्को के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ में अमरीका की प्रतिनिधि निकी हेली ने अलख़लील के बारे में यूनेस्को के फ़ैसले को इतिहास का अपमान बताया और एक बयान जारी करके कहा कि यह प्रस्ताव, इस्राईल व फ़िलिस्तीन के बीच शांति वार्ता को बहाल कराने के ट्रम्प सरकार के वर्तमान प्रयासों की विफलता का कारण बनेगा जबकि यह प्रयास वाशिंग्टन की विदेश नीति की प्राथमिकता में शामिल है।

यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक धरोहर समिति ने इस सम्मेलन में फ़िलिस्तीनियों के पक्ष में इस संस्था के फ़ैसले को रुकवाने के इस्राईल के प्रतिनिधि के अत्यधिक प्रयासों के बावजूद अपनी स्वाधीनता की रक्षा की और अलख़लील के प्राचीन शहर पर अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन के आए दिन के हमलों के दृष्टिगत इस शहर को वैश्विक धरोहरों की सूचि में शामिल करने के पक्ष में मतदान किया। यूनेस्को के इस फ़ैसले पर इस संस्था में इस्राईल के प्रतिनिधि ने अत्यंत अपमानजनक ढंग से प्रतिक्रिया जताई और अपने भाषण के अंत में कहा कि उन्हें शौचालय जाना है क्योंकि उनके विचार में शौचालय जाना इस सम्मेलन में भाग लेने से अहम है। सम्मेलन से उनके निकलते समय सभी उपस्थित लोगों ने मिल कर उनका मज़ाक़ उड़ाया और हूटिंग की।

बहरहाल यूनेस्को ने ज़ायोनी शासन के प्रतिनिधि की कड़ी आपत्ति के बावजूद तीन नकारात्मक वोटों के मुक़ाबले में 12 सकारात्मक मतों से बैतुल मुक़द्दस के 30 किलो मीटर दक्षिण में स्थित पश्चिमी तट के सबसे बड़े शहर अलख़लील को वैश्विक सांस्कृतिक धरोहरों की सूचि में शामिल करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी जबकि छः सदस्यों ने मतदान में भाग नहीं लिया। यह प्रस्ताव फ़िलिस्तीनियों के लिए एक बड़ी विजय समझा जाता है। हज़ारों साल पुराने अलख़लील शहर में इस समय लगभग दो लाख मुसलमान रहते हैं और ज़ायोनी शासन के समर्थन से बनने वाली कुछ कालोनियों में रहने वाले ज़ायोनी, इस शहर के प्राचीन अवशेषों को नुक़सान पहुंचाने की निरंतर कोशिश करते रहते हैं। यूनेस्को के प्रस्ताव में इस शहर के प्राचीन भाग की इस्लामी पहचान पर बल दिया गया है और कहा गया है कि सदियां बीत जाने के बावजूद इस शहर के प्राचीन भाग में बड़ा मामूली परिवर्तन आया है।

इससे पहले यूनेस्को की कार्यकारी समिति ने मई 2016 में एक प्रस्ताव पारित करके अतिग्रहित बैतुल मुक़द्दस और ग़ज़्ज़ा पट्टी में अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन के कारण ज़ायोनी शासन की निंदा की थी और बैतुल मुक़द्दस की ऐतिहासिक पहचान के सम्मान की मांग की थी। उस प्रस्ताव में मस्जिदुल अक़सा और हरमे शरीफ़ की इस्लामी पहचान के सम्मान के संबंध में तेल अवीव से अपनी अंतर्राष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों को निभाने की मांग की गई थी। यूनेस्को ने घोषणा की है कि इस प्रस्ताव में, वह वाक्य, जिसमें बैतुल मुक़द्दस को यहूदियत, ईसाइयत और इस्लाम जैसे एकेश्वरवादी धर्मों की पहचान के रूप में याद किया गया है, बैतुल मुक़द्दस के यहूदीकरण के ज़ायोनी शासन के षड्यंत्रों को विफल बनाने के उद्देश्य से शामिल किया गया है। यह प्रस्ताव, तेल अवीव को एक अतिग्रहणकारी शक्ति के रूप में पेश करता है और बैतुल मुक़द्दस के पूर्वी भाग पर ज़ायोनियों के क़ब्ज़े को औपचारिकता नहीं देता। यूनेस्को ने बैतुल मुक़द्दस के पूर्वी और इसी तरह प्राचीन भाग में इस्राईल की ओर से खुदाई की निंदा करते हुए कहा है कि ग़ज़्ज़ा के लोगों, अलख़लील के पवित्र स्थलों और इसी तरह बैत लहम में रैशल के मज़ार के संबंध में तेल अवीव सरकार का रवैया अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों के ख़िलाफ़ है।

फ़िलिस्तीन के पर्यटन और पुरातन अवशेष मंत्री का कहना है कि यूनेस्को ने फ़िलिस्तीनी पक्ष के आवेदन पर अलख़लील शहर और हरमे इब्राहीमी को वैश्विक धरोहरों की सूचि में चौथे फ़िलिस्तीनी अवशेष के रूप में पंजीकृत किया है। उन्होंने इस ऐतिहासिक घटना के महत्व पर बल देते हुए कहा कि इससे हरमे इब्राहीम को यहूदी धरोहर से जोड़ने के संबंध में ज़ायोनी शासन के झूठ की पोल खुल जाएगी और इस पवित्र स्थल पर ज़ायोनियों के आए दिन के हमलों को रुकवाने में मदद मिलेगी। उन्होंने इसी तरह यूनेस्को के इस फ़ैसले को फ़िलिस्तीन में पर्यटन के लिए भी अहम बताया और कहा कि फ़िलिस्तीन का पर्यटन मंत्रालय इस बात की कोशिश करेगा कि इसे इस शहर में पर्यटन को बढ़ावा देने और इस सांस्कृतिक धरोहर के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल करे।

अलख़लील, फ़िलिस्तीन के सबसे पुराने शहरों में से एक है जिसका इतिहास छः हज़ार साल पुराना है और यह शहर सभी आसमानी धर्मों में पवित्र माना जाता है। अलख़लील, मक्के, मदीने और बैतुल मुक़द्दस के बाद मुसलमानों का चौथा बड़ा पवित्र शहर माना जाता है जबकि इस शहर में स्थित हरमे इब्राहीमी, अलख़लील का सबसे अहम प्राचीन अवशेष है। अलख़लील में हज़रत इब्राहीम के मक़बरे के अलावा हज़रत इस्हाक़, हज़रत याक़ूब और उनकी पत्नियों के मज़ार भी स्थित हैं। इसी लिए यह शहर यहूदियों का दूसरा बड़ा पवित्र शहर और अन्य एकेश्वरवादी धर्मों के लिए पवित्र स्थान समझा जाता है।

अलख़लील या हेब्रन फ़िलिस्तीन के पर्वतीय क्षेत्र में और बैतुल मुक़द्दस के दक्षिणी पहाड़ों के निकट स्थित है। अलख़लील प्रांत के उत्तरी व पश्चिमी क्षेत्र, भूमध्य सागर की जलवायु से प्रभावित है और यहां हर साल औसतन 500 मिली मीटर बारिश होती है। अलख़लील प्रांत में अनेक सांस्कृतिक व ऐतिहासिक अवशेष हैं और इसी तरह यहां के सोते, प्राकृतिक दृश्य और चटानें देखने योग्य हैं।

वर्ष 1967 के युद्ध के बाद ज़ायोनियों ने हरमे इब्राहीमी को यहूदियों के उपासना स्थल में बदलने की कोशिश शुरू कर दी। इसके अंतर्गत उन्होंने इस्लामी शिलालेखों को हटा कर उनके स्थान पर हेब्रू भाषा में लिखे हुए बोर्ड लगा दिए। अलख़लील शहर में पचास से अधिक प्राचीन व नई मस्जिदें हैं जिनमें पैग़म्बर हज़रत यूनुस के मज़ार के निकट नबी यूनुस मस्जिद और कई अन्य पुरानी मस्जिदें शामिल हैं। हैब्रन शब्द हेब्रू भाषा में साथी व मित्र के अर्थ में प्रयोग होता है और अरबी भाषा में इसके लिए अलख़लील शब्द का प्रयोग होता है। चूंकि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का एक उपनाम ख़लीलुल्लाह अर्थात ईश्वर का मित्र था और इस शहर में उनका मज़ार स्थित है इस लिए इस शहर को अलख़लील या हेब्रन कहा जाता है।