मार्गदर्शन -41
इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम, इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के सुपुत्र थे।
वे इमाम हुसैन के पोते थे। करबला की घटना के समय इमाम मुहम्मद बाक़िर की आयु लगभग 5 वर्ष थी। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलमा की शहादत के पश्चात ईश्वरीय मार्गदर्शन का दायित्व इमाम बाक़िर के कांधे पर आ गया। उनका और उनके सुपुत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की इमामत का काल ऐसा काल था जब राजनीतिक दृष्टि से कुछ बड़े परिवर्तन हो रहे थे। उस समय उमवी शासन श्रंखला अपने पतन की ओर जा रही थी जबकि अब्बासी शासन श्रंखला, अपनी सत्ता को अधिक से अधिक मज़बूत करने में व्यस्त थी। सत्ता की इस खींचतान में इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम को ज्ञान संबन्धी अपना आन्दोलन चलाने में थोड़ी आसानी इसलिए थी, क्योंकि तत्कालीन शासक अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए हर प्रकार के हथकण्डे अपना रहे थे और इमाम की ओर से कुछ निश्चित हो गए थे।
इसी अवसर का लाभ उठाते हुए इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम ने इस्लाम के विरूद्ध किये जा रहे दुष्प्रचार को रोकने और शुद्ध इस्लामी शिक्षाओं को सार्वजनिक रकने के लिए अथक प्रयास किये। उन्होंने करबला की घटना के बारे में किये जा रहे दुष्प्रचारों को रोका और लोगों तक सच्चाई पहुंचाने के प्रयास किये। पैग़म्बरे इस्लमा के वे कथन जिन्हें भुला दिया गया था उनको उन्होंने पुन: लोगों में आम किया। यउस काल के कुछ लोगों ने पैसे लेकर तत्कालीन शासन के हित में हदीसें गढ़ने का काम शुरू कर दिया था। इस प्रकार के कार्यों को रोकने में इमाम मुहम्मद बाक़िर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इमाम मुहम्मद बाक़िर की सेवा में विद्धान, कवि , साहित्यकार, वक्ता और ज्ञानी सभी उपस्थित होकर अपने ज्ञान की प्यास बुझाते थे। इमाम बाक़िर ने बहुत से शिष्यों का प्रशिक्षण किया जिनमें से कुछ बाद में बहुत ही प्रसिद्ध हुए। सत्ता के लिए राजनैतिक खींचतान होने के बावजूद तत्कालीन शासन , इमाम को पूरी तरह से अनदेखा नहीं कर रहा था बल्कि उनपर नज़र रखी जा रही थी।
इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इमाम काक़िर की इमामत अर्त ईश्वरीय मार्गदर्शन का काल लगभग 18 वर्ष था। वे कहते हैं कि इस दौरान इमाम बाक़िर ने धर्म को फैलाने और सही बातों को लोगों तक पहुंचाने के लिए अथक प्रयास किये। उन्होंने कहा कि इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम ने जिस उद्देश्य के लिए वर्षों प्रयास किया, वर्तमान समय में ईरानी राष्ट्र उसी को हासिल करने के प्रयास में व्यस्त है अर्थात पथभ्रष्टता से लोगों को दूर करके सही मार्ग की ओर लाना। वरिष्ठ नेता कहते हैं कि महत्वपूर्ण बात यह है कि इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने इस्लाम शिक्षाओं को आम करने के लिए बहुत ही सीमित साधनों द्वारा गिने चुने लोगों की सहायता से महान काम किया जिससे आज भी लाभ उठाया जा रहा है।
इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम, पांचवें इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के सुपुत्र थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में ज्ञान के प्रचार के संबन्ध में अपने पिता की गतिविधियों को निकट से देखा था। इमाम सादिक़ अलैहिस्साम ने अपने काल के वातावरण से लाभ उठाते हुए इस्लाम के प्रचार व प्रसार के लिए बहुत काम किये। कहते हैं कि अन्य इमामों की तुलना में इमाम सादिक़ अलैहिस्साल के काल में सामाजिक स्ति तुलनात्मक रूप में कुछ स्थिर थी। इस बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि दूसरे इमामों की तुलना में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को इस्लामी शिक्षाओं का प्रचार करने का अधिक अवसर मिला। उन्होंने ज्ञान के प्यासे लोगों की प्यास को बुझाने का हर संभव प्रयास किया। इमाम ने भी अपने काल में बहुत से लोगों का प्रशिक्षण करके उनको एसा ज्ञानी बना दिया कि उनकी चर्चा आज पूरे संसार में हो रही है। वरिष्ठ नेता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि जो भी इमाम के पास ज्ञान अर्जित करने आता था वह शियों की भांति उनपर पूरा भरोसा करता हो या मन की गहराई से उन्हें मानता हो। क्योंकि विभिन्न धर्मों के लोग उनके पास आते थे किंतु जब वे इमाम सादिक़ की सेवा से वापस जाते थे तो फिर उनके ज्ञान और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित अवश्य होते थे। इस समय पूरी दुनिया को इस्लामी ज्ञान की बहुत आव्शयकता है।
बनी उमय्या के कमज़ोर होने और बनी अब्बास से सशक्त होने की प्रक्रिया के कारण इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के काल की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियां एसी हो चुकी थीं जो उनसे पहले या उनके बाद वाले इमामों के काल में नहीं थीं। यही कारण है कि उन्होंने इस्लामी शिक्षाओं का अधिक से अधिक प्रचार व प्रसार किया। इमाम सादिक़ के काल में उनके अथक प्रयासों से वैचारिक और सांस्कृतिक आन्दोलन ने जन्म लिया। उस काल में विभिन्न मतों के मानने वाले आपस में शास्त्रार्थ किया करते थे। हालांकि इससे पहले वाले दौर में शासकों का यह प्रयास रहा करता था कि लोग सही इस्लामी शिक्षाओं से अवगत न होने पाएं बल्कि वे अपनी परंपराओं पर ही चलते रहें। उन शासकों ने इस बात का बहुत प्रयास किया कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों के कथन, लोगों के बीच आम न होने पाएं। इन शासकों ने इस संबन्ध में एसी बाधाएं डाल दी थीं जिनको पार करना आम आदमी के लिए सरल नहीं था। इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने कील में उन सभी बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया।
इमाम ने अपने काल के लोगों को उनकी क्षमता के अनुकूल जानकारी उपलब्ध कराई। इमाम सादिक़ ने अपने पिता इमाम बाक़िर के वैचारिक और सांस्कृतिक आन्दोलन को आगे बढ़ाया। इस प्रकार के इच्छकों को अपने मांग के अनुसार ज्ञान दिया। इमाम ने बड़ी संख्या में शिष्यों का प्रशिक्षण किया। एक कथन के अनुसार इमाम सादिक़ के शिष्यों की संख्या 4000 बताई गई है। इनमें से कुछ एसे भी थे जिन्होंने विश्व ख्याति अर्जित अबान बिन तुग़लक़, मुफ़ज़्ज़ल बिन उमर, मोमिने ताक़, जाबिर हय्यान और अबू हनीफ़ा। यहां पर ध्यान योग्य बिंदु यह है कि जिस काल में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इतनी बड़ी संख्या में शिष्यों का प्रशिक्षण किया उस काल के सीमित संसाधनों के दृष्टिगत यह कार्य बहुत कठिन ही नहीं बल्कि असंभव सा लगता है।
इस्लामी क्रांति के नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि ईश्वरीय संदेशों को लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से ईश्वरीय दूत और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन, सरकार गठन के प्रयास में रहते थे ताकि इसके माध्यम से लोगों को कल्याण या सदैव ही उनपर नज़र रखा करते थे। वे उनपर अत्याचार करते और उनका विरोध करते रहते थे। वरिष्ठ नेता कहते हैं कि धर्म का प्रचार एक कर्तव्य है। पवित्र क़ुरआन कहता है कि धर्म को फैलाकर लोगों के बीच न्याय स्थापित किया जाए। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ईश्वरीय दूतों और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों ने जीवनभर कठिनाइयां सहन कीं। उनका मुख्य उद्देश्य यही था कि समाज में न्याय स्थापित किया जाए।