मार्गदर्शन-43
आपको अवश्य याद होगा कि पिछले कार्यक्रम में हमने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के बारे में चर्चा की थी।
पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों का इतिहास ईश्वरीय धर्म के प्रचार – प्रसार में अन्थक प्रयासों और इस्लाम धर्म कीविशुद्ध शिक्षाओं को सुरक्षित रखने की शैली से भरा पड़ा है। साथ ही पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों पर बनी उमय्या और बनी अब्बासी शासकों ने जो अत्याचार किये हैं उनका भी उल्लेख हमने किया था। आज हम ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई की दृष्टि में इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के बेटे इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के जीवन के कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालेंगे।
ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के सुप्रयासों के बारे में कहते हैं ’’ इस महान हस्ती, अर्थात इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने कठिन परिस्थितियों में भी पैग़म्बरे इस्लाम के स्पष्ट मार्ग, कुरआन और इस्लाम की शिक्षाओं का इस्लामी समाज में प्रचार – प्रसार किया। उन्होंने दिलों को अहलेबैत और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से निकट किया।
ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की इमामत और उस समय की कठिन परिस्थितियों के बारे में कहते हैं’’ यद्यपि इमामों के पावन जीवन काल में उल्लेखनीय व विशेष बिन्दु बहुत हैं जिनमें से हर एक इस योग्य हैं कि उन पर ध्यान दिया जाये और उनकी व्याख्या व समीक्षा की जाये परंतु आठवें इमाम का दौर इस संबंध में एक बेहतरीन दौर है।
आठवें इमाम की इमामत के दौर का आरंभ हारून रशीद के अत्याचारपूर्ण काल में जेल में मूसा बिन जाफ़र की शहादत के बाद आरंभ हुआ। इसका हर उस व्यक्ति पर विचित्र दबाव था जो थोड़ा सा भी सरकारी तंत्र की इच्छाओं के विपरीत अमल करता था। इस प्रकार की परिस्थिति में आठवें इमाम, इमाम बने।’’
’’ अलकाफ़ी’’ नामक एक प्रसिद्ध पुस्तक है जिसे कुलैनी ने लिखा है। उसमें हारून रशीद के अत्याचारपूर्ण व्यवहार के बारे में एक रवायत इस प्रकार आयी है। मोहम्मद बिन सनान कहता है’’ हारून रशीद के शासनकाल में मैंने इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम से कहा’’ सच में आपने स्वयं को इमाम घोषित कर दिया है और अपने पिता का स्थान ले लिया है जबकि हारून रशीद की तलवार से खून टपक रहा है? ( यानी अगर उसे यह पता चल जाये कि अपने पिता के बाद शीयों के इमाम आप हैं तो वह आपकी हत्या कर देगा) परंतु एतिहासिक स्रोतों के अनुसार चूंकि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम को शहीद करने के कारण हारून रशीद को आत्मग्लानि थी जिसके कारण उसने इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की हत्या नहीं की यद्यपि उसके इर्द–गिर्द लोगों ने हारून रशीद को इस कार्य के लिए बहुत उकसाया।
हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को लेशमात्र भी सांसारिक मायामोह नहीं था। आजीविका कमाने और महान ईश्वर की बंदगी के लिए उन्होंने अपने पूर्वजों की ही भांति बहुत प्रयास किये। लोगों के सामने सुसज्जित और सुन्दर ढंग से रहते थे परंतु एकांतवास में इमाम बहुत ही सादा जीवन व्यतीत करते थे। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम सदैव पवित्र क़ुरआन की तिलावत करते– रहते थे। रोज़ा बहुत रखते थे। महान ईश्वर की उपासना बहुत करते थे। अब्बासी शासकों के अत्याचारों के मुखर विरोधी थे क्योंकि बनी उमय्या के ख़लीफ़ाओं की भांति उनके उत्तराधिकारी भी इस्लाम की विशुद्ध शिक्षाओं से बहुत दूर हो चुके थे दिखावे के अलावा उनके पास धर्म नाम की कोई चीज़ नहीं बची थी। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ख़िलाफ़त के ईश्वरीय पद को पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों का अधिकार समझते थे अत: इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को भी अपने पूर्वजों की भांति तत्कालीन सरकार का खुला दुश्मन समझा जाता था।
हारून रशीद के मरने के बाद सत्ता प्राप्त करने के लिए उसके बेटों अमीन और मामून में विवाद आरंभ हो गया जो पांच वर्षों तक चलता रहा। इससे इस्लाम की शिक्षाओं के प्रचार–प्रसार के लिए इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को सुनहरा अवसर मिल गया। इस अवसर से लाभ उठाकर उन्होंने समाज में इस्लाम की विशुद्ध शिक्षाओं का प्रचार–प्रसार किया। जब सत्ता की बागडोर मामून ने ली तो इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को कठिन परिस्थितियों का सामना हुआ। मामून को अब्बासी ख़लीफ़ाओं में सबसे अधिक चालाक व होशियार ख़लीफ़ा की उपाधि मिली थी। उसे इस बात का ज्ञान था कि लोगों में पैग़म्बरे इस्लाम सत्ता और लोगों में अपनी पकड़ को मज़बूत बनाने के लिए दरबारियों व राजनेताओं से विचार विमर्श किया और इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को पवित्र नगर मदीना से ख़ुरासान के मर्व बुनाने का फैसला किया। जब इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम मामून की सत्ता के केन्द्र मर्व आ गये तो उसने इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी बना दिया। उस समय स्वयं मामून के अनुसार यह बहुत बुनियादी कार्य था और उसके इस कार्य से उसकी सत्ता के गिरने व समाप्त होने का ख़तरा समाप्त हो गया। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम भी बहुत अच्छी तरह से मामून की चाल को समझ गये और इस शर्त के साथ पवित्र नगर मदीना से मर्व आये थे कि वह किसी भी सरकारी कार्य में भाग नहीं लेंगे। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई इस संबंध में कहते हैं’’ मामून की बारी आती है, उस हस्ती अर्त इमाम रज़ा इलैहिस्सलाम पर मदीना से मर्व लाने के लिए काफ़ी दबाव डाला और आग्रह किया जाता है। मामून ने एक चाल चली वह केवल राजनीतिक थी। इसका उद्देश्य अपनी सरकार की बुनियादों को मज़बूत करना और अहले बैत से परिचित कराने के अभियान को जिसे इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम अंजाम देते थे, कमज़ोर करना था। यह थी मामून की चाल। मामून की इस चाल के मुकाबले में आठवें इमाम ने एक ईश्वरीय कार्यक्रम बना रखा था और उस पर अमल किया और उसे आगे बढ़ाया जिससे न केवल प्रशासन की मांगे पूरी नहीं हुईं बल्कि ठीक इसके विपरीत इस्लामी जगत में कुरआन और अहले बैत की शिक्षाओं के प्रचार–प्रसार का कारण बना। ईश्वर पर हरोसा करके और अपनी दूरदृष्टि से इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने एक बड़ा आंदोलन चलाया जिससे अत्याचारी सरकार के शत्रुतापूर्ण षड़यंत्रों पर पानी फिर गया और इस बड़े आंदोलन को सच और सच्चाई की दिशा में मोड़ दिय। यह इमामों के इतिहास की एक उज्वल व स्पष्ट विशेषता है।
वरिष्ठ नेता आगे कहते हैं ’’ इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम उसी हाल में जब उन पर मामून के उत्तराधिकारी होने का नाम था और न चाहते हुए भी उन्हें सरकारी संभावनाएं प्राप्त थीं वह इस प्रकार का व्यवहार करते थे कि मानो सरकार के विरोधी हैं और उस पर उन्हें आपत्ति है। वह यानी इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम न कोई आदेश देते , न किसी चीज़ से रोकते, न कोई पद स्वीकार करते, न कोई कार्य स्वीकार करते , न सरकारी कार्यों की वकालत करते और स्वाभाविक रूप से सरकारी कार्यों का किसी प्रकार से ओचित्य पेश नहीं करते थे। स्पष्ट है कि सरकारी तंत्र का जो सदस्य अपनी स्वेच्छा व मर्ज़ी से समस्त सरकारी ज़िम्मेदारियों से स्वयं को अगल कर लेगा वह उस सरकार का निष्ठावान व पक्षधर नहीं हो सकता। मामून इस बात को बहुत अच्छी तरह समझता था अत: उत्तराधिकारी का कार्य अंजाम पा जाने के बाद बारमबार उसने अपने पहले वाले वचनों के विपरीत इस बात की चेष्टा की कि इमाम सरकारी कार्यों को अंजाम दें और सरकार के विरुद्ध संघर्ष की जो नकारात्मक नीति उन्होंने अपना रखी है उसका उल्लंघन कर दें परंतु इमाम ने हर बार होशियारी से उसके षड़यंत्रों को विफल बना दिया।
ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता धूर्त व चालाक बनी अब्बासी ख़लीफ़ा के मुक़ाबले में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की होशियारी से भरे व्यवहार के कुछ नमूनों की ओर संकेत करते हुए कहते हैं एक नमूना यही है कि मामून इमाम से कहता है कि अगर संभव हो तो आप उन लोगों के लिए एक ख़त लिख दें जो आपकी बात मानते हैं और उस ख़त को उन क्षेत्रों में भेज दिया जाये जहां स्थिति अशांत है। इमाम इस कार्य को अंजाम नहीं देते हैं और पहले वाले वचन को याद दिलाते हैं कि वह सरकारी कार्यों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे और एक अन्य महत्वपूर्ण व रोचक नमूना नमाज़े ईद का नमूना है। मामून इमाम से इस बहाने और यह कहकर नमाज़ें ईद पढ़ाने के लिए कहता है कि लोग आपका मूल्य अधिक समझेंगे और आपकी कद्र करेंगे पर इमाम उसके आग्रह को स्वीकार नहीं करते हैं किन्तु जब मामून ने बहुत आग्रह किया तो इमाम ने इस शर्त के साथ नमाज़ पढ़ाना स्वीकार किया कि वह पैग़म्बरे इस्लाम और अली बिन अबी तालिब की शैली में नमाज़े ईद पढ़ायेंगे और उस वक्त इमाम ने उस समय से एसा लाभ उठाया कि मामून को अपने आग्रह पर पछताना पड़ा और उसने इमाम को रास्ते से ही वापस आने का आदेश दिया यानी विवश होकर मामून अपनी पाखंडी व दिखावटी सरकारी तंत्र पर एक अन्य आघात लगाता है।’’
मामून यह चाहता था कि इमाम और लोगों के मध्य किसी प्रकार का कोई संपर्क न रहे और इसके लिए वह भांति –भांति की चालें चलता था परंतु जब भी अवसर मिलता था इमाम स्वयं को एसी स्थिति में करार देते थे कि लोग उनसे संपर्क कर सकें। मामून ने जब इमाम को पवित्र नगर मदीना से मर्व लाने का फ़ैसला किया तो उसने जानमूझ कर उस रास्ते का चयन किया था जिसमें कूफ़ा और कुम जैसे वह नगर न पड़ें जो प्रसिद्ध थे कि वहां पर पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से प्रेम करने वाले रहते हैं परंतु इमाम की यात्रा के लिए जिस रास्ते का चयन किया गया था उसी रास्ते में जब भी इमाम को अवसर मिलता था वह अपने और लोगों के मध्य संपर्क स्पित करने का प्रयास करते थे। इस लंबी यात्रा के दौरान इमाम ने जगह–जगह लोगों का मार्गदर्शन किया और मर्व में , जो मामून की सरकार का केन्द्र और इमाम की यात्रा का अस्ली पड़ाव था, जब भी अवसर मिलता था इमाम सरकारी घेरे को तोड़कर लोगों की भीड़ में पहुंच जाते थे।
ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की होशियारी के मुक़ाबले में मामून की धूर्धतापूर्ण नीतियों की विफलता की ओर संकेत करते और कहते हैं’’ मामून ने इमाम के विरुद्ध अफ़वाह फैलाने सहित दूसरी कष्टदायक नीतियां अपना रखी थीं इसके साथ वह देखता था कि मक्का, मदीना और दूसरे इस्लामी क्षेत्रों में उनके विदित वैभव ने उनकी आध्यात्मिक इज़्ज़त व प्रतिष्ठा में वृद्धि कर दी है और दसियों वर्षों के बाद प्रशंसकों की जबानें इमाम रज़ा के मज़लूम पूर्वजों की प्रशंसा में खुल गयी हैं। संक्षेप में यह कि मामून ने देखा कि इस बड़े जुए में उसे न केवल कुछ मिला नहीं बल्कि बहुत सी चीज़ों से उसे हाथ धोना पड़ा है और अगर एसे ही रहा तो दूसरी चीज़ें भी उसके हाथ से चला जायेंगी। उस समय मामून को अपनी विफलता व पराजय का आभास हुआ और उसने अपनी खुली गलतियों की भरपाई का इरादा किय और देखा कि इतना राब कुछ ख़र्च करने के बाद कुछ नहीं मिला तो उसने सरकार के मुखर दुश्मनों यानी अहले बैत से मुकाबले के लिए उसी मार्ग को चुना जिसका चयन सदैव अत्याचारियों ने किया था यानी इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की शहादत।’’