विकास पथ- 5
हमने यह बताया कि इस्लामी सभ्यता दूसरी शताब्दी हिजरी क़मरी से चौथी और पांचवी शताब्दी हिजरी क़मरी तक वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से बहुत विकसित हुयी और इसकी चमक दमक दुनिया के सुदूर क्षेत्रों में ख़ास तौर पर यूरोप तक पहुंची।
900 से 1200 ईसवी का काल इस्लामी सभ्यता का स्वर्णिम दौर था जिसके पीछे मुसलमानों में ज्ञान प्राप्ति की चाह थी। इस दौर में मुसलमानों ने चिकित्सा विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, गणित, रसायनशास्त्र और ऑप्टिक्स में बहुत तरक़्क़ी की थी। इस दौर में मुसलमानों और चीनियों में ज्ञान के क्षेत्र में नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा थी जबकि यूरोप बहुत पिछड़ा हुआ था। इस स्वर्णिम दौर के बाद इस्लामी सभ्यता का पतन शुरु हुआ।
इस्लाम धर्म की एक अहम विशेषता जिसने नव स्थापित इस्लामी समाज में ज्ञान-विज्ञान के प्रसार का रास्ता साफ़ किया वह मुसलमानों और इस्लामी सरकारों के अधिकारियों में मौजूद सहिष्णुता व उदारता की भावना थी। इस्लामी संस्कृति ने उस समय वैज्ञानिक गतिविधियों के क्षेत्र में क़दम रखा जब सहिष्णुता व मध्यमार्ग की भावना ख़त्म होती जा रही थी। उस दौर की दो बड़ी ताक़तें एक बाइज़ैन्टाइन साम्राज्य जो दिन ब दिन ईसाई धर्मान्धता में डूबता जा रहा था, विज्ञान व दर्शन से संबंध ख़त्म करता जा रहा था। पूर्वी रोमन साम्राज्य के ज़रिए दार्शनिक गतिविधियों पर रोक इस बात का एलान था कि रोमी समाज विज्ञान व सभ्यता से निकट भविष्य में संबंध ख़त्म कर लेगा। ईरान में भी ख़ुसरो नौशीरवान शासन की ओर से विज्ञान में रुझान सामयिक था। ऐसे दौर में जब दुनिया जातीय व धार्मिक पक्षपात में ग्रस्त भी, इस्लाम ने सभ्यता व ज्ञान की नसों में नया ख़ून दौड़ाया। हक़ीक़त में इस्लाम के उदय से धार्मिक व जातीय पक्षपात ख़त्म हुआ और उसकी जगह पर शासकों ने उदारता, ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों के साथ पारस्परिक प्रतिबद्धता और ज्ञान-विज्ञान में रूचि दिखायी।
आरंभिक शताब्दियों में इस्लामी सभ्यता के फलने फूलने का एक और कारण मुसलमानों में अद्भुत घटनाओं के संबंध में जिज्ञासा और रचनात्मकता की भावना का प्रसार था। मुसलमान मध्ययुगीन काल के यूरोपियों के विपरीत कि जो गिरजाघर की धार्मिक किताबों में मौजूद न था उसे नज़रअंदाज़ करते थे, सृष्टि के बारे में शोध की ओर प्रेरित हुए और वे सृष्टि के रहस्य को जानने के लिए जिज्ञासा को ईश्वरीय निशानियों का पता लगाने और ईश्वर को पहचानने की भावना को मज़बूत करने का साधन समझते थे और उसे उन्होंने आध्यात्मिक आयाम दिया। जिज्ञासा व रचनात्मकता की यह भावना और विचारकों की बातों को ही पर्याप्त न समझने ने मुसलमानों के लिए नए नए बिन्दुओं से पर्दा उठाने और रचनात्मकता का रास्ता समतल किया जबकि मध्ययुगीन योरोप इस चीज़ से कोसों दूर था। इस दौर में ज्ञान से पढ़ना मुराद लिया जाता था और लाभदायक ज्ञान धार्मिक ज्ञानों तक सीमित न था बल्कि जिन चीज़ों से इंसान के जीवन को बेहतर बनाने में मदद मिलती थी उसका सीखना उपासना समझा जाता था। इसके अलावा मुसलमानों ने इससे आगे क़दम बढ़ाते हुए ऐसी चीज़ों के बारे में शोध किया जिसका विदित रूप से व्यवहारिक फ़ायदा नज़र न आता था बल्कि उसे वह अपनी जिज्ञासा की भावना को तृप्त करने के लिए अंजाम देते थे।
एक और चीज़ जिसने मुसलमानों में ज्ञान विज्ञान को सीखने और इस्लामी सभ्यता को विकसित करने का अवसर दिया वह इस्लाम की ओर से विभिन्न प्रकार की वैज्ञानिक व सांस्कृतिक पृष्ठिभूमि वाले राष्ट्रों व जातियों के साथ एकता व समन्वय की पैदा की गयी भावना थी। इस तरह से कि मुसलमानों ने उनकी सभी अच्छी परंपराओं से नव स्थापित इस्लाम समाज के हित में बेहतरीन ढंग से फ़ायदा उठाया। मुसलमानों का यह समाज एक और अहम साधन से संपन्न था जिसका इस एकता में बहुत बड़ा योगदान था और वह एक ज़बान में अर्थात अरबी भाषा में बात करना था। इस्लामी समाज के गठन की आरंभिक शताब्दियों में सभी लोग बिना किसी हीन भावना के अरबी भाषा में लिखते थे। क्योंकि वह अरबी भाषा को पवित्र भाषा मानते थे। ऐसी भाषा जिसके ज़रिए ईश्वर ने अपने बंदों से बात की है जो सिर्फं अरब जाति की विशेष भाषा नहीं है। चूंकि इस्लामी समाज में लोगों व समाजों की एक दूसरे पर वरीयता का आधार रंग, भाषा और जाति नहीं है बल्कि ईश्वर से भय को मानदंड माना गया है, पूरे इस्लामी जगत ने इन सांसारिक मानदंडों को ख़ास तौर पर भाषा के क्षेत्र में नज़रअंदाज़ करते हुए, अरबी भाषा को विशेष सम्मान दिया और बड़ी आसानी से उसे सीखा और इस्तेमाल किया। अन्य राष्ट्रों के वैज्ञानिक स्रोतों के एक अरबी भाषा में अनुवाद ने इस्लामी सभ्यता के लिए तेज़ी से विज्ञान की चोटी को फ़त्ह करने का रास्ता समतल किया।
एक और तत्व जिसने इस्लामी सभय्ता की स्वर्णिम शताब्दियों में विज्ञान के प्रसार में बड़ा रोल अदा किया वह मुसलमानों का तर्क व चिंतन मनन पर ध्यान देना था न कि बिना किसी सोच विचार के दूसरों की बात को स्वीकार करना। तर्क व चिंतन मनन समाजों में विज्ञान के प्रसार व हर प्रकार की वैज्ञानिक गतिविधियों के लिए बुनियाद की हैसियत रखती है। इस्लामी संस्कृति में भी इसी महत्वपूर्ण बिन्दु पर ध्यान या इसकी अवहेलना का विकास व पतन से सीधा संबंध है। इस्लामी सभ्यता के विभिन्न कालों की समीक्षा से पता चलता है कि जब भी बुद्धि व तर्क के समर्थकों की संख्या बढ़ी विज्ञान ने प्रगति की यहां तक कि बातचीत में भी यही बिन्दु हावी रहा और इसके विपरीत जब शोध व मामलों में बुद्धि के रोल को नज़रअंदाज़ किया गया इस्लामी समाज में प्रगति रुक गयी। तर्क व बुद्धि ने मुसलमानों को ग़ैर मुसलमानों के साथ उदारता सिखायी और वैज्ञानिक व सांस्कृतिक प्रगति का रास्ता समतल किया। ईसाई लेखक जॉर्जी ज़ैदान इस्लामी सभ्यता के विकास में एक महत्वपूर्ण तत्व ग़ैर मुसलमान विद्वानों के साथ मुसलमान शासकों के शिष्टाचार को मानते हैं। उनका कहना है कि अब्बासियों के आंदोलन में विज्ञान व साहित्य में प्रगति और इस्लामी सभ्यता के तेज़ी से विकास में जिस तत्व की बहुत बड़ी भूमिका थी वह यह थी कि मुसलमान शासक वैज्ञानिक स्रोतों के अनुवाद व ज्ञान के प्रसार में किसी भी मूल्यवान चीज़ को देने में संकोच नहीं करते थे और बिना किसी जातीय व राष्ट्रीय भेदभाव के विद्वानों व अनुवादकों का सम्मान करते और हर तरह से उनकी मदद करते थे। यही वजह है कि मुसलमान शासकों के दरबार में ईसाई, यहूदी, ज़रतुश्ती, साबेई और सामेरी समुदाय के विद्वान मौजूद रहते थे।
इस्लामी सभ्यता चूंकि बहुत व्यापक थी इसलिए इस्लामी जगत की सीमाओं से बाहर इसके दुश्मन मौजूद थे जो ऐसे अवसर की तलाश में थे कि इस व्यापक सभ्यता को दबा दें। इन्हीं अवसरों में एक सलीबी जंग भी थी। यह जंग पूरब में इस्लाम के साथ पश्चिम के ईसाइयों के बीच सैन्य टकराव से पहले इस्लामी सभ्यता से पश्चिम का पाश्विक टकराव था कि जिसकी ओर बहुत से इतिहासकारों व शोधकर्ताओं ने इशारा किया है। 1096 से 1291 ईसवी तक सलीबी जंगों का क्रम जारी रहा और अंततः इस्लामी जगत से पश्चिम पूरी तरह पीछे हटा। सलीबी जंगों के दौरान सलीबी लश्कर के सिपाही सलीब के चिन्ह को बलिदान के चिन्ह के रूप में अपने लिबास पर लगाए रहते थे इसलिए यह जंग सलीबी जंग के नाम से मशहूर हुयी। ये जंग योरोपीय शासकों व कुलीन वर्ग ने इसलिए शुरु की क्योंकि वे इस्लाम की शक्ति से डरे हुए थे और उन्होंने ईसाइयों को बैतुल मुक़द्दस के अतिग्रहण के लिए रवाना किया। इन हमलों के कारण इस्लामी समाज काफ़ी समय तक उथल पुथल का शिकार रहा, बड़े पैमाने पर जान-माल का नुक़सान हुआ और बड़ी संख्या में शहर और गांव तबाह हुए। सन 1099 ईसवी में कि जब पहली बार बैतुल मुक़द्दस पर सलीबियों का अतिग्रहण हुआ, उन्होंने एक हफ़्ते तक पूरी तरह मुसलमानों का जनसंहार किया और मस्जिदुल अक़्सा में 60000 से ज़्यादा मुसलमानों का क़त्ल किया। सन 1109 ईसवी में जब त्रिपोली पर सलीबियों का क़ब्ज़ा हुआ तो उन्होंने दारुल इल्म लाइब्रेरी की 1 लाख किताबों को आग लगा दी।
मुसलमानों के ख़िलाफ़ पश्चिम की सलीबी जंगों की आग बुझी नहीं थी कि पूरब से एक और तबाही वाला तूफ़ान शुरु हुआ। मंगोलिया में बिखरे हुए क़बीले चंगेज़ ख़ान के नेतृत्व में एकजुट हो गए और उन्होंने जिस समय पूरब के इस्लामी क्षेत्रों पर ख़्वारज़्मशाही शासन व्यवस्था का राज था, अपने कुछ व्यापारियों के क़त्ल का बदला लेने के लिए इस्लामी क्षेत्रों पर धावा बोल दिया। 617 हिजरी क़मरी में इस्लामी जगत पर मंगोलों का हमला शुरु हुआ। ख़्वारज़्म की प्राचीन राजधानी गुर्गान्ज पर क़ब्ज़ा और उसे तबाह करने के बाद ख़ुरासान के शहरों पर एक के बाद एक करके अतिग्रहण होता गया और इन शहरों में रक्तपात व लूटमार हुयी। चंगेज़ और उसके कुछ उत्तराधिकारियों के बाद चंगेज़ के पोते हलाकू ने इस्लामी जगत पर मंगोलों की विजय को पूरा किया। उसने इस्माइली शासन श्रंख्ला को हराया और बग़दाद पर क़ब्ज़ा करने के बाद अब्बासियों के अंतिम शासक मुस्तअसम को क़त्ल किया और इस तरह अब्बासियों की 525 साल से चली आ रही कथित ख़िलाफ़त का अंत किया। इसके बाद इस्लामी क्षेत्र को मंगोलों के क़बायली सरदारों में बांट दिया। हालांकि मंगोल सांस्कृतिक दृष्टि से कमज़ोर होने और इस्लामी सभ्यता के प्रभावी होने के कारण अपेक्षाकृत राम हो गए लेकिन इस्लामी जगत में ख़ास तौर पर ख़ुरासान में उनके हमलों के कारण हुयी तबाही इतनी व्यापक थी कि इस्लामी सभ्यता व संस्कृति के आधार हिल गए। उस समय ख़ुरासान इस्लामी जगत का दीपक और इस्लामी संस्कृति व सभ्यता का पालना था।
हालांकि इस्लामी सभ्यता के पतन में सलीबी जंगों और मंगोलों के हमलों का बहुत बड़ा रोल था लेकिन इस सभ्यता के पतन में आंतरिक तत्वों के रोल का इंकार नहीं किया जा सकता।