मार्गदर्शन- 68
अच्छाई और बुरायी की ओर रुझान हर इंसान के मन में होता है।
इंसान के सामने चुनने के लिए दो रास्ते होते हैं। एक अच्छाई की ओर और दूसरा बुरायी की ओर जाने वाला रास्ता । इस्लाम में इंसान के मन के अच्छाई की ओर रुझान को नफ़्से लव्वामा अर्थात प्रायश्चित करने वाला मन कहते हैं और जब इंसान का मन बुरायी की ओर आकृष्ट होता है तो उसे नफ़्से अम्मारा अर्थात उकसाने वाला मन कहते हैं। इस्लाम में मन के भलाई की ओर झुकाव को मज़बूत करने पर बहुत बल दिया गया है लेकिन बुरायी की ओर उकसाने वाले मन से संघर्ष अधिक अहमियत रखता है और इस्लामी संस्कृति में इसे मन से संघर्ष कहा जाता है।
इस्लाम में मन से संघर्ष और बुरायी से दूरी पर बहुत बल दिया गया है। इस बारे में इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई कहते हैं, "इस्लाम में संसार के सुधार के लिए मुख्य बिन्दु इंसान के मन में सुधार को बताया गया है। हर चीज़ यहीं से शुरु होती है।"
इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता इंसान के उद्दंडी मन के बारे में जो हर इंसान के वजूद में मौजूद है और उसे बुरायी के लिए उकसाता है, फ़रमाते हैं, "मन प्राकृतिक इच्छाओं का समूह है। अगर इन इच्छाओं को सही तरह से नियंत्रित किया गया, सही मार्ग में इस्तेमाल किया गया और सही तरह से पूरा किया गया तो इंसान परिपूर्णता के शिखर पर पहुंचता है। हर इंसान के भीतर एक उद्दंडी मन है। मस्त हाथी की तरह है कि अगर उसकी ओर से सतर्क रहें , उसके सिर पर कचोके लगाते रहें तो वह आपको तबाह नहीं करेगा, वह नियंत्रण में रहेगा और यही मन आपकी सफलता का आधार बनेगा।"
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने एक कथन में उद्दंड मन को इंसान को दुष्ट बनाने का सबसे बड़ा कारण बताया है। जी हां हमारे वजूद के भीतर हमारा सबसे बड़ा दुश्मन हमारी घात में बैठा है और वह बुराइयों के लिए उकसाने वाला मन और हमारी वासनाएं हैं। जिस क्षण हम इस ज़हरीले सांप व घातक दुश्मन को सिर उठाने न दें, उसी क्षण हम सफल होंगे, कर्म कर सकेंगे और प्रतिरोध व दृढ़ता दिखा सकेंगे। जिस वक़्त यह दुश्मन सिर उठाने और हमारे भीतर मौजूद बुद्धि, आध्यात्मिक शक्ति और अच्छे मन को दबाने में सफल हो गया उस समय हम पतन की ओर बढ़ने लगते हैं।
वरिष्ठ नेता राष्ट्रों की मुश्किलों का कारण उन लोगों के वर्चस्व को मानते हैं जो दिखने में तो इंसान नज़र आते हैं लेकिन भीतर से वह दरिंदे के समान होते हैं। वरिष्ठ नेता फ़रमाते हैं, "जिस व्यक्ति की नज़र में हज़ारों इंसानों की हत्या करना, परिवारों और छोटे बच्चों को रासायनिक हमलों का निशाना बनाना बुरी बात न हो, जो बड़ी आसानी से अपराध करता हो, वह दिखने में तो इंसान है लेकिन वास्तव में अपने उद्दंड मन का ग़ुलाम और एक फाड़ खाने वाला भेड़िया है। अगर इंसान अपने मन में सुधार न करे तो ऐसा इंसान दरिंदा बन जाता है।"
वरिष्ठ नेता अत्याचार, निर्धनता, भूख, बुरायी, इंसानों के अपमान और मानवीय प्रतिष्ठा के दमन का कारण ऐसे उद्दंडी इंसानों के वजूद को मानते हैं जो अपने मन के ग़ुलाम हैं। दुनिया में घमंडी व विशिष्टता पाने वालों के इस समूह ने, मानव समाज के बड़े भाग को इस धरती पर ईश्वरीय अनुकंपाओं से वंचित कर रखा है।
इंसान बनने और अपने डिंब से बाहर निकल कर एक सुंदर तितली बनने के लिए आत्मविश्लेषण व आत्मनिर्माण करना चाहिए। लेकिन इस बात पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि मन को पाक करना आसान काम नहीं है बल्कि इतना कठिन है कि इस्लामी शिक्षाओं में इसे संघर्ष का नाम दिया गया है। अलबत्ता ऐसे संघर्ष के बदले में स्वर्ग मिलता है।
आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई मन पर नियंत्रण के बारे में अनुशंसा करते हैं, "व्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि वह इच्छाओं व आत्ममुग्धता के जाल और घमंड से बाहर निकले और बाहर से ख़ुद को देखे। हम सबको इस बदलाव की ज़रूरत है। इंसान की प्रवृत्ति में बुरायी भी शामिल है। हम इन बुनाइयों को कब ख़त्म कर सकते हैं? जब हमारी इन बुराइयों की ओर नज़र जाए, जब हम उन्हें पहचान लें और जब इस बात को मान लें हमारे भीतर बुरायी है। अगर ख़ुद को पूरी तरह सही समझ लें तो हम धोखे का शिकार हैं। हमें लगता है कि हमारे भीतर कोई बुरायी नहीं है। मन हमारे वजूद का वह आयाम है जो हमे पतन की ओर ले जाता है, वह आयाम जो वासनाएं जगाता है और उस ओर हमें खींचता है। हमारी कमियों का स्रोत यही है। हमें आत्मविश्लेषण करना चाहिए ताकि अपनी कमियों को दूर करें।"
मन से संघर्ष का एक प्रभावी तरीक़ा ईश्वर को याद करना है। वरिष्ठ नेता इस बारे में फ़रमाते हैं, "मन को नियंत्रित करना ज़रूरी है। उसे ईश्वर की याद से नियंत्रित किया जा सकता है। ईश्वर की शरण और ईश्वर की ज़रूरत को महसूस करके उसे नियंत्रित किया जा सकता है। ख़ुद को ईश्वर की महानता के मुक़ाबले में तुच्छ समझ कर नियंत्रित किया जा सकता है। परम सत्य व सौंदर्य के मुक़ाबले में अपनी बुराइयों को महसूस करके मन को नियंत्रित किया जा सकता है। इन सबका स्रोत ईश्वर की याद है। जो व्यक्ति ईश्वर से डरता है, आत्मविश्लेषण करता है, ईश्वर को याद करता है, वह तो बुरायी, अत्याचार, भ्रष्टाचार और उद्दंडता की ओर नहीं बढ़ता। ईश्वर की निरंतर याद उसे ऐसा करने से रोकती है। पवित्र क़ुरआन में नमाज़ के बारे में जो यह कहा गया है कि नमाज़ बुरायी से रोकती है इसका अर्थ यह नहीं है कि इंसान के हाथ पैर को बांध देती है बल्कि इच्छाओं को नियंत्रित करती है। कुछ लोग नमाज़ बुरायी से इसका अर्थ यह समझते हैं कि अगर आपने नमाज़ पढ़ी तो अब आप बुरायी नहीं करेंगे। नहीं यह अर्थ नहीं है बल्कि इसका अर्थ यह है कि जब आप नमाज़ पढ़ते हैं तो आपकी अंतरात्मा आपको बुरायी करने से निरंतर रोकती है। बार बार कहने और मन में बिठाने का स्वाभाविक असर होता है। इंसान में विनम्रता आती है। इसलिए बारबार नमाज़ पढ़ी जाती है। रोज़ा साल में एक बार अनिवार्य है, हज जीवन में एक बार अनिवार्य है जबकि नमाज़ को हर दिन कई बार पढ़ा जाता है। नमाज़ की अहमियत का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है।"
मन को नियंत्रित करने के लिए एक अहम व्यवहवार आत्मविश्लेषण है। इस अर्थ में कि हर व्यक्ति को चाहिए कि रात में अपने पूरे दिन के व्यवहार पर ध्यान दे और दिन में की गयी अपनी बुराइयों को ढूंढे, उसके बाद उन बुराइयों को दूर करने की कोशिश करे और इस मार्ग में ईश्वर से मदद मांगे। वरिष्ठ नेता आत्मविश्लेषण के बारे में कहते हैं, "आत्मविश्लेषण बहुत अच्छी चीज़ है। इंसान को अपने मन को टटोलना चाहिए। उसके बाद एक एक करके पाप कम करता जाए। हमें कुछ पापों की आदत हो जाती है, कभी इंसान की हर दिन पांच, छह, या दस गुनाह करने की आदत हो जाती है। हमें कोशिश करना चाहिए कि इन्हें एक एक करके छोड़ें। इन कमज़ोर बिन्दुओं को एक एक करके ख़त्म करें।"
आत्मनिरीक्षण करना ईश्वरीय दूतों, पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के सुदंर आचरण का अनुसरण है। जैसा कि हम इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के आचरण पर नज़र डालते हैं तो देखते हैं कि वे किस तरह ईश्वर से प्रार्थना में कहते हैं, "हे पालनहार! मैं अपने मन, अपनी कमियों और बुराइयों के कारण तुझसे शर्मिंदा हूं। अपने मन पर क्रोधित हूं और तेरे फ़ैसलों से राज़ी हूं।" इतनी महान हस्ती कि जो पापों से दूर थी और उसने पूरी ज़िन्दगी ईश्वर की याद में बितायी, इस तरह ईश्वर के सामने ख़ुद को समझती थी। हमारे लिए ज़रूरी है कि इन महापुरुषों के जीवन से सीखें कि किस तरह ईश्वर से संपर्क बनाएं और अपने उद्दंडी मन से संघर्ष में ईश्वर से मदद मांगे।
वरिष्ठ नेता इस बारे में कहते हैं, "आत्मनिरीक्षण के लिए इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के आचरण को उदाहरण के तौर पर अपने सामने रखें। इस तरह इंसान एक के बाद एक परिपूर्णतः के चरण को तय करता है। महापुरुषों का उद्य और उनके वजूद से प्रकट होने वाली सुंदरताएं यह दर्शाती हैं कि यह सबके सब आत्मनिरीक्षण का फल है। उन लोगों के विपरीत जो अपनी कमियों की ओर से आंखें मूद लेते हैं, ख़ुद को परिपूर्ण समझ बैठते हैं, ख़ुद को और ईश्वर को भूल जाते हैं, अपनी आत्मा की उस आवाज़ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो हर इंसान के भीतर मौजूद है। कुछ ऐसे लोग होते हैं जो वजूद से बहुत ही कम ज़ाहिर होने वाली भलाई पर संतुष्ट हो जाते हैं। ऐसा शख़्स परिपूर्णतः के चरण को तय नहीं कर पाता।"