यमन युद्ध- 2
सऊदी अरब ने 26 मार्च 2015 से यमन के विरुद्ध हमले शुरु किए हैं।
इस युद्ध को कम अवधि में समाप्त होना था किन्तु यह युद्ध तो चौथे साल में दाख़िल हो गया है।
यमन के विरुद्ध सऊदी अरब के युद्ध में अब तक पचास हज़ार से अधिक यमनी हताहत व घायल हो चुके हैं किन्तु इस युद्ध में इंसानी जानों का नुक़सान लोगों के हताहत और घायल होने तक ही सीमित नहीं है बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में तो इससे अधिक विषम स्थिति देखने को मिल रही है। सऊदी अरब और उसके घटकों के यमन पर थोपे गये युद्ध के परिणामों से अवगत होने के लिए काफ़ी है कि आइये इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की ओर से पेश किए गये आंकड़ों पर नज़र डालते हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवता प्रेमी सहायता के समन्वय कार्यालय के आंकड़े के अनुसार जो जनवरी 2018 में जारी हुआ था, लगभग 22.2 मिलियन अर्थात इस देश की 75 प्रतिशत आबादी को जनवरी 2018 तक मानवीय सहायता की आवश्यकता थी जिनमें से 11.3 मिलियन लोगों को बहुत अधिक सहायता की आवश्यकता थी और जून 2017 से इस संख्या में दस लाख लोगों की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि उन क्षेत्रों में अधिक मानवीय सहायताओं की आवश्यकता अधिक है जहां युद्ध जारी है या लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हो चुके हैं। एक करोड़ 70 लाख यमनी अर्थात हर तीन में से दो लोगों को यह नहीं पता है कि वह अगला खाने का कहां से प्रबंध करेंगे। लाखों लोग अशांति के कारण खाद्य पदार्थों की भीषण कमी का सामना कर रहे हैं और भुखमरी का शिकार हैं। यह संख्या जून 2017 में 8.4 थी जो अब बढ़कर 24 प्रतिशत हो गयी है। यमन की दस प्रतिशत जनता इस युद्ध के कारण बेघर हो गयी है। यही कारण है कि यमन संकट के कारण यह देश दुनिया में सबसे बड़ा मानवीय संकट बना हुआ है।
दुनिया के इस निर्धन अरब देश का मुख्य कारण यमन पर सऊदी अरब के हमले हैं। इस हमले के कारण यमन के परिवार के मुखिया अपनी नौकरी से हाथ धो बैठें हैं और जिनके पास नौकरी है उनको वेतन नहीं मिल रहे हैं। यमन के घर तबाह हो चुके हैं और परिवार के लोग विस्थापन का कष्ट सहन कर रहे हैं। कृषि पूरी तरह तबाह हो चुकी है और खाद्य पदार्थ परिवेष्टन के कारण आयत नहीं कर सकते और घर के खाने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
चिकित्सा के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवता प्रेमी सहायता के समन्वयकर्ता की ओर से जारी होने वाले आंकड़ों के अनुसार देश के 16 प्रांतों में केवल 50 प्रतिशत चिकत्सा केन्द्र ही सक्रिय हैं किन्तु इन्हीं संख्या के चिकित्सा केन्द्रों में उपकरण और संसाधन नहीं हैं। यह भी रिपोर्ट है कि चिकित्सा केन्द्रों में सक्रिय लोगों को महीनों से वेतन नहीं मिल सका है। 16.4 मिलियन यमनी जनता को चिकित्सा सुविधाओं की आवश्यकता है जबकि 9.3 मिलियन लोगों को पिछले वर्ष 2017 के अंत तक 19 प्रांतों में 48 लोग डिफ़्थेरिया के कारण मर गये जबकि 610 लोग इस संदिग्ध बीमारी में ग्रस्त हैं। अप्रैल 2017 से यमन में अब तक 2200 लोग हैज़े से मर चुके हैं जबकि दस लाख लोग से अधिक इस बीमारी में ग्रस्त हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार यमन में पांच साल से कम एक तिहाई बच्चे इस जानलेवा बीमार में जान दे चुके हैं जबकि मरने वालों में साठ वर्ष से अधिक आयु वालों की संख्या भी बहुत अधिक है। यदि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं इस जानलेवा बीमारी पर नियंत्रण पाने में सफल नहीं हो पाती तो यमन में सऊदी अरब द्वारा थोपे गये युद्ध रके कारण इस बीमारी से मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है।
जनवरी 2018 में यमन युद्ध के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवीय सहायता समन्वय कार्यालय की ओर से जारी होने आंकड़ों में बताया गया है कि यमन के शिक्षण संस्थान भी सऊदी अरब के हमलों में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट में कहा गया है कि यमन पर सऊदी अरब के हमलों के कारण शिक्षा प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई है और लगभग बीस लाख यमनी बच्चे शिक्षा से वंचित हो गये हैं। मार्च 2015 से नवंबर 2017 तक 16 हज़ार स्कूल बंद हो गये जबकि 156 स्कूल पूरी तरह तबाह हो गये जबकि 1413 स्कूलों को थोड़ा बहुत नुक़सान पहुंचा है। इसी प्रकार 150 स्कूलों पर बेघर लोगों ने तथा 23 स्कूलों पर सशस्त्र लोगों ने क़ब्ज़ा कर लिया है। यह स्थिति स्कूलों के अध्यापकों और कर्मियों को वेतन न मिलने के कारण पैदा हुई है जिसकी वजह से यमन की आगामी पीढ़ी अज्ञानता के ख़तरे में पड़ सकती है।
यमन पर सऊदी अरब के हमलों के कारण इस देश में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और यातनाओं में वृद्धि हुई है। एमेनेस्टी इन्टरनेश्नल ने फ़रवरी 2018 में अपनी 409 पृष्ठों पर आधारित होने वाली रिपोर्ट में कहा कि यमन पर सऊदी अरब के युद्ध के दूसरे आयाम भी सामने आ गये हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि यमन में महिलाओं और पुरुषों के बीच असमानता खुलकर सामने आ गयी है जबकि इस देश में बाल विवाह के स्तर में वृद्धि हुई है। इस रिपोर्ट में सचेत करते हुए कहा गया है कि यमन युद्ध के कारण महिलाओं में अशांति बढ़ी है जबकि महिलाओं के विरुद्ध यौन उत्पीड़न में वृद्धि हुई है जबकि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और उनकी ज़बरन शादी के कई मामले भी सामने आए हैं।
यमन के विरुद्ध सऊदी अरब के युद्ध के राजनैतिक और भौगोलिक क्षेत्र सहित कई अन्य परिणाम भी निकले हैं। इस युद्ध के कारण देश कई भागों में विभाजित हो गया है जिसके कुछ हिस्सों पर अंसारुल्लाह और पिपल्ज़ कांग्रूस का नियंत्रण है जबकि त्यागपत्र दे चुके राष्ट्रपति मंसूर हादी के समर्थकों का कुछ क्षेत्रों पर नियंत्रण है जबकि कुछ भाग पर अलक़ायदा का नियंत्रण है। यद्यपि अबयन और हज़रमूत सहित कुछ प्रांतों में हालिया वर्षों में अलक़ायदा अस्तित्व में आया है किन्तु सऊदी अरब के हमलों के कारण इस गुट ने यमन में अपनी पोज़ीशन मज़बूत की है और अपने सदस्यों की संख्या बढ़ाई है। मध्यपूर्व के मामलों के विशेषज्ञ पैट्रिक काकब्रन ब्रिटिश समाचार पत्र इंडीपेंडेट में अपने लेख में लिखते हैं कि सऊदी अरब के नेतृत्व में यमन युद्ध का सबसे बड़ा परिणाम अलक़ायदा नेटवर्क का अस्तित्व है। यदि ओसामा बिन लादेन जीवित होता तो गर्व करता कि उसका नेटवर्क हज़रमूत सहित यमन के बड़े प्रांतों तक फैल रहा है।
सऊदी अरब के यमन पर हमले के कई परिणाम हैं जिनमें निम्न लिखित परिणामों की ओर संकेत किया जा सकता है।
पहलाः सऊदी सरकार के प्रति दुनिया भर के देशों और यमन की जनता के क्रोध में वृद्धि हुई है। मार्च 2018 में ब्रिटिश क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की लंदन यात्रा के दौरान होने वाले प्रदर्शनों को इसी परिधि में देखा जा सकता है। लंदन सरकार ने जनता के दबाव में आकर कई बार सऊदी क्राउन प्रिंस की ब्रिटिश यात्रा को रद्द कर दिया था।
दूसराः युद्ध का लंबा खिंचना, आले सऊद शासन की पराजय का कारण बना है क्योंकि यमन युद्ध के समय इस देश के रक्षामंत्री रहे सऊदी क्राउन प्रिंस ने यह युद्ध शुरु करने से पहले ही कहा था कि एक महीने के भीतर ही वह युद्ध जीत लेंगे किन्तु अब यह युद्ध चौथे वर्ष में दाख़िल हो चुका और अब तक इसके परिणाम के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।
तीसराः यमन युद्ध सऊदी अरब के लिए बहुत ख़र्चीला युद्ध सिद्ध हुआ है। इस ख़र्चीले युद्ध के कारण सऊदी अरब आर्थिक समस्या में ग्रस्त हो गया जिसके कारण उसे कर में वृद्धि करनी पड़ी, सब्सिडी काटनी पड़ी, कर्मियों का वेतन काटना पड़ा और सरकारी ख़ज़ाने का प्रयोग करना पड़ा। कुछ टीकाकारों का यह मानना है कि भ्रष्टाचार से संघर्ष के नाम पर नवंबर वर्ष 2017 में सऊदी राजकुमारों की गिरफ़्तारियां, इसी आर्थिक समस्या को निपटाने के लिए सऊदी सरकार की चाल थी।
चौथाः यमन युद्ध के कुछ परिणामों में से एक सऊदी परिवार में बढ़ता मतभेद भी है क्योंकि सऊदी राजकुमार आरंभ से ही एक अरब देश के विरुद्ध युद्ध के विरोधी थे और यमन युद्ध शुरु होते ही शाही परिवार में राजनैतिक मतभेद बढ़ गये और यह मतभेद उस समय और बढ़ गये जब मुहम्मद बिन सलमान को जो सऊदी अरब के अगले नरेश हैं, क्राउन प्रिंस बना दिया गया।
पांचवाः यमन युद्ध के कारण सऊदी अरब की विदेश नीति की बहुत अधिक आलोचना होने लगी और सऊदी अरब के क़तर और लेबनान सहित कई देशों से संबंध ख़राब हो गये क्योंकि सऊदी अरब ने लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी के साथ ग़ैर कूटनयिक बर्ताव किया था।
छठाः यमनी सेना और स्वयं सेवी बलों की मीज़ाइल क्षमताओं में वृद्धि के कारण जो रियाज़ में यमामा महल को निशाना बनाने में सफल रही, सऊदी अरब में अशांति बढ़ गयी जिसने सऊदी परिवार की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
आख़िर में यह कहा जा सकता है कि यमन युद्ध जितना अधिक चलेगा इस देश में मानव त्रासदी उतना ही बढ़ेगी और जितना युद्ध बढ़ेगा तथा यमन में मानव त्रासदी बढ़ेगी आले सऊद शासन की पराजय उतनी ही निकट होती जाएगी। यमन युद्ध सऊदी अरब के लिए वियतनाम युद्ध बनता जा रहा है। यमन की जनता ने सऊदी अरब के हमलों का भरपूर जवाब देकर यह सिद्ध कर दिया है कि वह किसी भी स्थिति में सऊदी अरब को यमन में सफल नहीं होने देगी।