काट्सा क़ानून, ईरान से मुक़ाबला कड़ा करने की कोशिश- 2
हमने बताया था कि ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद से ही अमरीका ने ईरानी राष्ट्र के खिलाफ बहुत से क़ानून पारित किये जिनका उद्देश्य, ईरान की सरकार और जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ाना रहा है।
इन में से बहुत से क़ानूनों से ईरान व अमरीका के मध्य आर्थिक संबंधों को निशाना बनाया गया जिन्हें प्राथमिक प्रतिबंध कहा जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे प्रतिबंध हैं जिन्हें दूसरे दर्जे के प्रतिबंध कहा जाता है। इस प्रकार के प्रतिबंधों से ईरान और अन्य देशों के मध्य आर्थिक संबंधों को निशाना बनाया गया है। प्रतिबंधों द्वारा अमरीकी दुश्मनों से मुक़ाबले का कानून अर्थात काट्सा, इस्लामी गणतंत्र ईरान के खिलाफ अमरीका की प्रतिबंध की नीति का ताज़ा उदाहरण है। इन प्रतिबंधों को ईरान के खिलाफ अत्याधिक विशाल व अत्याधिक प्रभावशाली प्रतिबंध कहा गया है बल्कि कुछ लोगों ने तो इसे, प्रतिबंधों की जननी का नाम दिया है। पिछले कार्यक्रम में हम ने यह बताया था कि किस तरह से सीएएटीएसए अमरीकी कांग्रेस में पारित हुआ।
काट्सा नामक यह कानून ऐसे समय में पारित हुआ जब एक ओर से वाइट हाउस की सत्ता ओबामा से ट्रम्प के हाथ लगी थी और दूसरी ओर ट्रम्प ने ईरान के परमाणु समझौते का विरोध बारम्बार कर चुके थे। इसी प्रकार, मिसाइल के क्षेत्र में ईरान की सफलताओं और आतंकवादियों विशेषकर दाइश के खिलाफ ईरान की प्रभावशाली भूमिका से ईरानी राष्ट्र के दुश्मनों में चिंता व्याप्त हो गयी थी। इसी लिए कांग्रेस में ईरान विरोधी धड़े ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके मिसाइल कार्यक्रम के खिलाफ कार्यवाही को अपने एजेन्डे में शामिल किया लेकिन जेसीपीओए के अंत के बाद की स्थिति से पैदा होने वाली चिंता की वजह से इन लोगों ने ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और आईआरजीसी की भूमिका को, ईरान के खिलाफ कार्यवाही का बहाना बनाया। इसी लिए अस्थिर करने वाले ईरान के कदमों से मुकाबले के कानून में ईरान की मिसाइल गतिविधियों से संबंधित प्रतिबंध लगाए गये और पहली बार ईरान के क्रांति संरक्षक बल आईआरजीसी को आतंकवाद का समर्थन बता कर उसके खिलाफ प्रतिबंध लगाए गये।
ईरान की मिसाइल व रक्षा गतिविधियां, हमेशा ही ईरान और अमरीका के नेतृत्व में पश्चिम के मध्य मतभेद का विषय रही हैं। इ्स्लामी क्रांति की सफलता और पश्चिम के प्रभाव से ईरान के निकलने के बाद, ईरान में रक्षा के क्षेत्र में अपने आत्मनिर्भरता की प्रक्रिया का आरंभ हुआ। आठ वर्षीय थोपे गये युद्ध के अनुभव से यह सिद्ध हो गया कि ईरानी राष्ट्र के पास अपनी रक्षा के लिए स्वंय पर भरोसा करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। ऐसी दशा में कि जब ईरान के विभिन्न नगरों पर सद्दाम की सेना मिसाइल बरसा रही थी और रासायनिक हमले कर रही थी, पश्चिमी देश, ईरान को कंटीले तार भी बेचने पर तैयार नहीं हुए। इन सब बातों के वावजूद ईरानी राष्ट्र अपने जियालों की वीरता और नेताओं की बुद्धिमत्ता के बल पर इस असमान युद्ध में विजयी हुआ और ईरान की एक इंच भूमि भी दुश्मनों के हाथ में नहीं रहने दी। युद्ध के खत्म होने के बाद, रक्षा शक्ति की प्राप्ति और आधुनिक सामरिक साधनों का उत्पादन, ईरानी अधिकारियों के मुख्य एजेन्डे में शामिल हो गया लेकिन चूंकि पश्चिम की ओर से ईरान पर हथियारों का प्रतिबंध जारी था इस लिए मजूबर होकर ईरान ने स्वंय ही मिसाइल के क्षेत्र में काम आरंभ किया और फिर पश्चिमी एशिया में एक अत्यन्त प्रभावशाली और मज़बूत मिसाइल व्यवस्था बनाने में सफलता प्राप्त कर ली। यह व्यवस्था पूरी तरह से रक्षात्मक थी और आठ वर्षीय युद्ध के अनुभव को दुश्मन की ओर से दोहराए जाने से उसे रोकने के लिए इसे बनाया गया लेकिन गत चालीस वर्षों में इलाक़े के देशों को सैंकड़ों अरब डॅालर के हथियार बेचने वाले पश्चिमी देश, ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को इलाक़े और दुनिया की शांति के लिए ख़तरा बताते हैं।
हालिया वर्षों में अमरीका, यूरोप बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद की ओर से ईरान के मीज़ाइल कार्यक्रम के ख़िलाफ़ विभिन्न प्रतिबंध लगाए गए हैं। अमरीकियों की कोशिश है कि ईरान को मध्यम दूरी के और बैलिस्टिक मीज़ाइलों के क्षेत्र में प्रगति से रोक दें। अमरीका के कुछ टीकाकारों और राजनितिज्ञों का तो यह भी कहना है कि ईरान को 300 किलो मीटर से अधिक मारक दूरी वाले मीज़ाइल तैयार करने से रोक दिया जाए। इन लोगों के विचार में चूंकि ये मीज़ाइल ईरानी राष्ट्र की स्वदेशी क्षमता पर आधारित हैं इस लिए इनसे पश्चिमी एशिया के क्षेत्र में अमरीका व उसके घटकों की हितों को ख़तरा है।
ईरान ने कई बार बल देकर कहा है कि उसका मीज़ाइल कार्यक्रम रक्षात्मक है और वह अन्य देशों की इच्छा पर अपनी रक्षा क्षमता में बदलाव नहीं करेगा। इसी कारण पिछले चालीस बरसों में ईरान पर लगने वाला कोई भी प्रतिबंध मीज़ाइल क्षेत्र में ईरान की प्रगति को नहीं रोक सका है। इन्हीं प्रतिबंधों के दौरान ईरान ने अपने मीज़ाइलों की मारक क्षमता कुछ सौ किलो मीटर से बढ़ा कर दो हज़ार किलो मीटर तक पहुंचा दी है और क्रूज़ मीज़ाइल के क्षेत्र में प्रवेश करके उसने अपने मीज़ाइलों की मारक क्षमता को भी अत्यंत सटीक बना लिया है।
पश्चिमी एशिया में इस्लामी गणतंत्र ईरान की क्षेत्रीय भूमिका पर अंकुश लगाना और इस्लामी क्रांति संरक्षक बल आईआरजीसी की शक्ति को नियंत्रित करना, काट्सा क़ानून तैयार करने वालों का एक अन्य अहम लक्ष्य था। यह क़ानून उस समय पारित हुआ जब ईरान ने आईआरजीसी विशेष कर क़ुद्स ब्रिगेड की सहायता से दाइश जैसे आतंकी गुटों को तबाह करने में अत्यधिक सफलताएं हासिल की थीं। इसी तरह आतंकियों के चंगुल से इराक़ में तिकरीत व मूसिल और सीरिया में हलब व दैरुज़्ज़ूर जैसे शहरों की स्वतंत्रता ईरानी बलों की मदद के बिना संभव नहीं थी।
इन सफलाताओं पर अमरीकियों ने आले सऊद और ज़ायोनियों के साथ मिल कर यह शोर मचाना शुरू किया कि ईरान क्षेत्र पर वर्चस्व जमाने की कोशिश में है और उसका मुक़ाबला किया जाना चाहिए। इस परिप्रेक्षय में अमरीकी कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने आईआरजीसी पर प्रतिबंध को अपने एजेंडे में शामिल किया। अलबत्ता इससे पहले आईआरजीसी की क़ुद्स ब्रिगेड को, जिसका दायित्व ईरान के ख़िलाफ़ सीमा पार ख़तरों का मुक़ाबला करना है, अमरीकी प्रतिबंधों की सूची में शामिल किया गया था और इस ब्रिगेड के कमांडर, जनरल क़ासिम सुलैमानी को प्रतिबंधित किया गया था। कुल मिला कर यह कि अमरीका के भीतर व बाहर ईरान विरोधी तत्वों का दावा था कि आईआरजीसी पर दबाव डाल कर पश्चिमी एशिया में ईरान के प्रभाव और सफलताओं को रोका जा सकता है।
बहरहाल पहली बार काट्सा क़ानून की मंज़ूरी से ईरान की इस्लामी क्रांति संरक्षक बल या आईआरजीसी का नाम अमरीका के कथित आतंकी गुटों की सूची में शामिल हो गया। इससे पहले तक किसी भी देश की किसी सैन्य संस्था को एक आतंकी गुट के रूप में पहचाना जाए लेकिन ईरान की क्षेत्रीय सफलताओं से अमरीका की गहरी चिंता के चलते इस देश ने हर तरह के संकोच को अलग रखते हुए आईआरजीसी को आतंकियों का समर्थक गुट घोषित कर दिया। अलबत्ता आईआरजीसी के कमांडरों समेत इस्लामी गणतंत्र ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों की ठोस चेतावनी के बाद अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने आईआरजीसी का नाम इस देश के वित्त व विदेश मंत्रालय की सूची के अंतर्गत नहीं रखा। इसके कारण आतंकियों के कथित समर्थक गुट के रूप में अमरीकी सेना की ओर से आईआरजीसी को निशाना बनाने का विकल्प अलग रख दिया गया क्योंकि ईरान ने चेतावनी दी थी कि इस संबंध में की जाने वाली किसी भी तरह की कार्यवाही दोनों देशों के बीच टकराव का कारण बनेगी।
ईरान की इस धमकी के बाद ट्रम्प ने आईआरजीसी और उसके कमांडरों के ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबंध लगाए लेकिन इससे क्षेत्र में आतंकी गुटों के दमन के लिए ईरान और आईआरजीसी की कार्यवाहियों और इसी तरह आतंकवाद से लड़ने में इराक़ व सीरिया जैसे देशों की ईरान द्वारा मदद को नहीं रोका जा सका। इससे पता चलता है कि काट्सा के योजनाकारों की कल्पना के विपरीत, जो इसे प्रतिबंधों की मां का नाम दे रहे थे, ईरान की राजनैतिक, सुरक्षा व सामरिक गतिविधियों पर बहुत कम प्रभाव पड़ा।
कुल मिला कर यह कि ईरान, रूस और उत्तरी कोरिया के ख़िलाफ़ “प्रतिबंधों के माध्यम से अमरीका के दुश्मनों से मुक़ाबले का क़ानून” पारित और क्रियान्वित हुए कई महीने बीत चुके हैं और इस अवधि में तीनों ही देशों ने अमरीका के नए प्रतिबंधों के बावजूद अपनी प्रगति जारी रखी है। ईरान के संबंध में काट्सा क़ानून ने ईरान की क्षेत्रीय भूमिका और उसकी प्रक्षेपास्त्रिक गतिविधियों को निशाना बनाने की कोशिश की थी लेकिन अमरीका का यह क़ानून अपने दृष्टिगत लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सका। इसी के चलते ट्रम्प सरकार ने परमाणु समझौते से निकलने की धमकी दी थी और आठ मई को उसने अपनी इस धमकी को व्यवहारिक भी कर दिया लेकिन ईरान चालीस बरस से अमरीकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और आगे भी कर सकता है। अब यह अमरीका है जिसे परमाणु समझौते से निकलने और एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते की अनदेखी करने की क़ीमत चुकानी पड़ेगी। (HN)