May ३०, २०१८ ११:४३ Asia/Kolkata

कभी कहा जाता था कि एक तस्वीर के कई पहलू होते हैं या एक तस्वीर हज़ारों कहानियां बयान करती हैं किन्तु अब हम ऐसे काल में जीवन व्यतीत कर रहे हैं जिसमें सब कुछ बदल गया है और फ़ोटो को कम ही देखा जाता है।

फ़ोटो पर नज़र डालने से हमको अतीत की याद आने लगती है और हम अपने अतीत में खो जाते हैं।

तस्वीरों के इतिहास में बहुत से फ़ोटोग्राफ़र और चित्रकार यहां तक कि कुछ आम लोगों ने ऐसे फ़ोटो ली है जिसने दुनिया को हिलाकर रख दिया है।  वह तस्वीरें कम नहीं है जिसने आम जनमत यहां तक कि दुनिया के राजनेताओं को भी प्रभावित किया है, इतिहास बदल दिया और दुनिया में इतिहास को झिंझोड़ने वाली तस्वीरें बन गयीं।

समाचारिक फ़ोटो, यद्यपि हालिया वर्षों में घटनाओं को ख़बरों और प्रमाणों के साथ पेश किया गया किन्तु इसकी मुख्य ज़िम्मेदारी समाचार पत्रों के लिए आश्चर्यजनक और व्यापक तस्वीरों को जमा करना था ताकि अधिक से अधिक बिक्री की जा सके।

वार फ़ोटो, समाचारिक फ़ोटो की शाखा है जो युद्धग्रस्त क्षेत्रों के जीवन और सशस्त्र झड़पों का चित्रण पेश करते हैं। युद्ध संबंधी फ़ोटो लोगों को युद्ध की त्रासदियों को सही ढंग से समझने और युद्धग्रस्त क्षेत्रों के हालात को सही तरीक़े से समझने में मदद करती है, यह बात केवल युद्धग्रस्त क्षेत्रों या झड़पों वाले क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है। युद्ध के खंडहरों, इंसान को होने वाले नुक़सानों को और उसकी परेशानियों, एक थके हुए सैनिक और दुख दर्द में भरे बच्चे की तस्वीर पेश करना, दक्षता का काम है।  

 

युद्ध के क्षेत्र के फ़ोटोग्राफ़र हमेशा यह प्रयास करता है कि इस प्रकार से फोटो ले विधटनाओं ड्रामैटिक आयाम मज़बूत हो जाए। यूरोपीय सुरक्षा और सहयग संगठन में स्वतंत्र मीडिया के विशेषज्ञ फ़्रिमोट डू फ़ार्स खाड़ी के युद्ध की तस्वीरों को टेलीवीजन सीरियल की भांति बताते हैं जो हमेशा से संबोधकों में यह जिज्ञासा पैदा करती है कि मामले की तह तक जाएं और मीडिया इस प्रकार से अपने संबोधकों और पाठकों की संख्या में वृद्धि करता है और विज्ञापनों की ओर उनका ध्यान आकर्षित करता है। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि समय बीतने के साथ साथ फ़ोटोग्राफ़रों का मानवता प्रेमी संदेश और युद्ध, निर्धनता और बीमारी को समाप्त करने में निहित होता है और संकट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने में संबोधकों की संवेदनशलता को किसी सीमा तक बदल दिया है।

ईरान – इराक़ युद्ध की फ़ोटो और उसके फ़ोटोग्राफ़र्स के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है किन्तु अभी तक ईरान के इस महत्वपूर्ण भाग के पहलू अनछुए हैं।  इराक़ द्वारा ईरान पर थोपे गये आठ वर्षीय युद्ध के दौरान की झिंझोड़ देने वाली तस्वीरें अभी तक बाक़ी हैं। इन फ़ोटोज़ ने असमान्य युद्ध की वास्तविताओं को दुनिया के सामने पेश किया था। यह तस्वीरें ईरानी राष्ट्र पर पश्चिमी मीडिया के निरंतर हमलों की गाथांए सुनाती हैं जब झूठे मीडिया का ही बोलबाला था।

थोपे गये युद्ध की समाप्ति को लगभग तीस साल हो रहे हैं और पवित्र प्रतिरक्षा और क्रांति के फ़ोटोग्राफ़रों के संघ के अनुसार उस काल से अब तक 12 लाख तस्वीरों को जमा किया गया है। यह तस्वीरें, फ़्रंट लाइन से लेकर योद्धाओं की जीवनियों और युद्ध की त्रासदियों को भी बयान करती हैं।

महदी मुनइम उन पहले फ़ोटोग्राफ़रों में है जिन्होंने विभिन्न रूप में ईरान विरुद्ध इराक़ द्वारा थोपे गये युद्ध से उत्पन्न होने वाले नुक़सानों और मारे गये लोगों की तस्वीरें जारी की हैं। वह एक स्वतंत्र फ़ोटोग्राफ़र है जिन्होंने "युद्ध की भेंट चढ़ने वाले" और " आशा का चमत्कार" नामक दो पुस्तकें प्रकाशित की है। युद्ध की भेंट चढ़ने वाले नामक पुस्तक में उस व्यक्ति की तस्वीर प्रकाशित की है जो धमाके के बाद अपंग हो गया था।

संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में दस करोड़ से अधिक बारूदी सुरंगें लगी हुई हैं। इसके साथ ही दुनिया में सैन्य झड़पों के नुक़सानों और ख़तरों के बावजूद इनकी संख्या में वृद्धि हुई है। होने वाले शोध के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान, बोसनिया, कंबोडिया और मोज़ाम्बिक जैसे चार देशों में, बड़ी संख्या में लोग अपने अपने देशों में अपनी दिनचर्या के दौरान बारूदी सुरंगों का सामना करते हैं।

ईरान में आम नागरिक, गांववासी, सीमावर्ती, क़बाईली और बच्चे सबसे अधिक बारूदी सुरंगों की चपेट में आते हैं। इन धमाकों में बचने वाले एक तिहाई लोग, अपंग हो जाते हैं और यह प्रतिशत बच्चों के छोटे शरीर के दृष्टिगत और अधिक बढ़ जाता है। हालिया दो दश्कों में और वर्ष 1999 से मरने वालों और घायलों की संख्या चरम सीमा तक पहुंच गयी थी।

 

हालिया कुछ वर्षों के दौरान विश्व की बड़ी शक्तियों की ओर से आतंकवादियों के समर्थन और क्षेत्रीय झड़पें बढ़ने के कारण झड़पों की तस्वीरों बढ़ गयी हैं। निसंदेह वर्ष 2015 में बच्चे की सबसे प्रसिद्ध तस्वीर सीरिया के कुर्द बच्चे की तस्वीर थी जो तुर्की के समुद्र तट पर औंधे मुंह मुर्दा हालत में पाया गया। इस तस्वीर ने यूरोप में शरणार्थियों के संकट में मानवीय त्रासदी के पहलू को उजागर किया और दुनिया के सामने शरणार्थियों की दयनीय स्थिति पर चिंतन मनन करने के लिए एक पहलू छोड़ दिया। इस वर्ष दुनिया में अपने घर से बेघर होने वालों की संख्या द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सबसे अधिक है।

यूरोप में शरणार्थियों के रूप में रहने वाले अधिकतर लोग हिंसा और पाश्विकता की वजह से फ़रार हुए हैं और हम उस हिंसा और पाश्विकता की कल्पना भी नहीं कर सकते। इनमें से आधे से अधिक लोग वर्ष 2015 में सीरिया में थे। लंदन स्थित ग़ैर सरकारी संस्था ह्यमून राइट्स वाच ने रिपोर्ट दी है कि मार्च 2011 के मध्य से अब तक कम से कम तीन लाख पचास हज़ार लोग सीरिया में आंतरिक युद्ध के कारण अपनी जान गवां चुके हैं। यूनीसेफ़ और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भी इस स्थिति के जारी रहने वाले चेतावनी भरे फ़ोटो जारी किए हैं। यदि आप कप्यूटर पर सर्च करने लगे तो आपको बहुत से बच्चों की हृदय विदारक तस्वीरें मिल जाएंगी। मीडिया द्वारा जनसंहार और युद्ध की तस्वीर पेश करने का क्रम समाप्त नहीं होगा। दूसरा उदाहरण यमन युद्ध की तस्वीर है। यह युद्ध सऊदी अरब के नेतृत्व में शुरु हुआ जिसमें अब तक दसियों हज़ार लोगों की जान जा चुकी है और इस देश में व्यापक स्तर पर सूखापन हो गया है और परिवेष्टन के कारण इस निर्धन अरब देश को दवाओं और खाद्य पदार्थों में कमी का सामना है। यही नहीं इस देश में व्यापक स्तर पर महामारी भी फैल रही है और विस्तृत पैमाने पर लोग हैज़े में ग्रस्त हो गये हैं।

यमन के तीन वर्षीय युद्धके कारण इस निर्धन अरब देश को बहुत अधिक नुक़सान उठाना पड़ा है। सनआ में विकास और अधिकार केन्द्र की रिपोर्ट के अनुसार इस युद्ध के हज़ारवें दिन इसमें मरने वालों की संख्या 13 हज़ार 603 हो गयी है जिनमें 2887 बच्चे और 2027 महिलाएं शामिल हैं। इस हमले के आरंभिक 33 महीनों में 26 लाख पचास हज़ार लोग बेघर हुए जबकि इस देश का आधार भूत ढांचा पूरी तरह तबाह हो गया। रेड क्रिसेंट संस्था की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान समय में यमन की 80 प्रतिशत जनता पेय जल, खाद्य पदार्थ, ईंधन और चिकित्सा संसाधनों से वंचित है।

 

यूनीसेफ़ ने घोषणा की है कि यमन के बीस लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हो गये हैं। इसके अतिरिक्त यमन में हर दस मिनट पर एक बच्चा कुपोषण और बीमारी के कारण काल के गाल में समा जाता है। मीडिया निरंतर यमन में होनी वाली त्रासदी की तस्वीरें दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं।

 

अंत में वह नमूना पेश करना चाहते हैं जो अभी हाल ही में पेश आया है। सोमवार 14 मई को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने अपने दूतावास को तेल अवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने का फ़ैसला किया। बैतुल मुक़द्दस को ज़ायोनी शासन की राजधानी के रूप में घोषित करने का ट्रम्प प्रशासन का फ़ैसला, ग़लत और अंतर्राष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध है। यह विषय संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के भी ख़िलाफ़ है तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने बल दिया है कि अवैध अधिकृत धरती की क़ानूनी हैसियत का सम्मान किया जाना चाहिए।

ट्रम्प प्रशासन के इस फ़ैसले से दुनिया के मुसलमानों और फ़िलिस्तीनियों में आक्रोश फैल गया और ज़ायोनी सैनिकों ने इस फ़ैसले के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले फ़िलिस्तीनियों का ग़ज़्ज़ा पट्टी और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में जमकर दमन किया।

 

वर्षों से मीडिया और न्यूज़ एजेन्सियां फ़िलिस्तीनी जनता की स्थिति और उन पर हो रहे अत्याचारों को दुनिया के सामने पेश करती रही हैं। हालिया दिनों में होने वाले फ़िलिस्तीनियों के प्रदर्शनों को भी मीडिया ने व्यापक स्तर पर कवरेज दिया। इन्हीं प्रदर्शनकारियों में एक फ़िलिस्तीनी जवान भी नज़र आया जो व्हील चेयर पर बैठकर प्रदर्शन कर रहा था।

 

इस अपंग फ़िलिस्तीनी का नाम फ़ादी अबू सलाह था जो वर्ष 2008 में जब वह केवल 19 साल का था, ग़ज़्ज़ा पर ज़ायोनी सैनिकों की बमबारी में अपने दोनों पैर गंवा बैठा था। अबू सलाह दस साल बाद नकबा दिवस के अवसर ज़ायोनी स्नापर की गोली से शहीद हो जाता है।

क्या मनुष्यों पर हो रहे इन अत्याचारों पर चुप रहा जा सकता है? हम कैसे इसका चित्रण पेश कर सकते हैं और कैसे इस निर्दयी दुनिया के सामने आंखें बंद कर सकते हैं?  क्या हम इस रणक्षेत्र में आराम से जीवन व्यतीत कर सकते हैं?

फ़ोटोग्राफ़र इस निर्दयी दुनिया और इस हाहाकार में अंतर्रात्मा की आवाज़ को नई आवाज़ दे सकते हैं, उनकी तस्वीरों को अधिक ध्यान से देखें और सोचें। (AK)