Jun ०९, २०१८ ११:४५ Asia/Kolkata

विश्व मानवाधिकार घोषणापत्र ने निर्धारित किया है कि प्राइवेसी, पारिवारिक मामले, रहने के स्थान या पत्रों को अकारण ही सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार किसी की प्रतिष्ठा और उसके सम्मान पर भी हमला नहीं किया जा सकता। हर आदमी को हक़ है कि वह इस प्रकार के हस्तक्षेपों या अतिक्रमण के मामलों में क़ानून का सहारा ले।

प्राइवेसी उन सूचनाओं को कहा जाता है कि जिनके फ़ाश होने की स्थिति में उक्त व्यक्ति को बहुत नुक़सान पहुंचते हैं, यह नुक़सान कभी आत्मिक होते हैं, कभी वित्तीय और कभी शारीरिक होते हैं। वैवाहिक स्थिति, जन्म तिथि, नेश्नल कोड, वित्तीय और क्रेडिट सूचनाएं, चिकित्सा सूचनाएं, फ़ोन काल जैसी सूचनाएं या वह सूचनाएं जिनसे नये डाटा निकाल सकते हैं या उनसे व्यापारिक या ग़ैर व्यापारिक लाभ उठा सकते हैं, इन सभी को प्राइवेसी कहते हैं।

दुनिया के बहुत से देशों में लोगों की प्राइवेसी की रक्षा के लिए क़ानून बनाए गये हैं और चूंकि यह क़ानून मानवाधिकार की श्रेणी में आते हैं, सामन्य रूप से कड़े समझे जाते हैं।

 

हमने बारंबर सुना कि उन लोगों, दोस्तों और या अपने परिचितों से जो वर्षों से काफ़ी दूर हो चुके थे, सोशल मीडिया से संपर्क में आते हैं या सोशल मीडिया के सहारे आपस में संपर्क करने में सफल हो जाते हैं। सोशल मीडिया यह सकारात्मक संभावना प्रशस्त कराता है कि लोग सरलता से एक दूसरे को तलाश करें और उनसे संपर्क लाइन पर रहे और उनके साथ अपनी सूचनाओं को शेयर करें। यहां पर सवाल यह पैदा होता है कि दोस्त और चिरपरिचित लोगों के अलावा, दूसरे लोग भी जो इन सूचनाओं को हासिल करने के प्रयास में रहते हैं, वह इन सूचनाओं से कैसे लाभ उठा सकते हैं? क्या इस प्राइवेसी में यूज़र्स के अधिकारों और शेयर की गयी सूचनाओं के मालेकाना अधिकारों का सम्मान किया जाता है? यहां पर यूज़र्स की नैतिक ज़िम्मेदारियां और सोशल मीडिया के प्रबंधकों की क्या ज़िम्मेदारी है?

निसंदेह सोशल मीडिया विशेषकर फ़ेसबुक, लोगों को प्रोफ़ाइल पढ़ने की संभावना प्रदान करता है। इस विषय की गवाही वह बहुत से समाचार हैं जो समय समय पर कम्पेन के रूप में बाहर आते हैं। वर्ष 2014 में प्रकाशित होने वाले शोध में इन्फ़ार्मेशन ग्रुप या फ़ेसबुक डाटा के अकैडमिक मिंबर का दावा है कि प्राप्त आंकड़ों के अनुसार बहुत से ऐसे प्रमाण मिले हैं कि बिना मुलाक़ात के ही केवल चैटिंग से ही यूज़र्स किसी के प्रेमजाल में फंस जाते हैं।

यह शोध बताते हैं कि जैसे ही जान पहचान शुरु होती है, यूज़र्स की पोस्ट में वृद्धि होने लगती है और उसके बाद थोड़ा और जान पहचान होने या रिश्ते की डोर में बंधने के बाद, धीरे धीरे दंपत्ति की पोस्टें कम होने लगती हैं और दंपत्ति आन लाइन होने के बजाए, एक दूसरे के साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत करने को प्राथमिकता देते हैं।

संपर्क होने या संबंध स्थापित होना एक यूज़र्स के मन को भाने वाली सूचनाओं पर निर्भर करता है। उदाहरण स्वरूप सोशल मीडिया कई लाख यूज़र्स के विज्ञापन को जो विवाह करना चाहते हैं, आन लाइन विवाह कराने वालों या गिफ़्ट पैक कंपनियों को बेच सकते हैं, या एक वैवाहिक संबंध टूटने के बाद, सूचनाओं को क़ानूनी संस्थाओं के हवाले कर सकता है।

सोशल मीडिया के यूज़र्स को पेश होने वाली सबसे मूल समस्या और मुख्य समस्याओं में से एक यह है कि वह यूज़र्स के कांट्रेक्ट में वर्णित बातों का अध्ययन नहीं करते हैं और परिणाम स्वरूप सोशल मीडिया को दी गयी छूट की जानकारी हासिल नहीं करती। यह समस्या उस समय अधिक उभर कर सामने आती है जब यूज़र्स को पता ही नहीं रहता कि फ़ेसबुक ने अपने सदस्य के क़ानून में यह स्पष्ट कर दिया है कि जब वह चाहेगा उनकी सूचनाओं से लाभ उठाएगा और इस बारे में उसने न तो क़ानूनों का उल्लंघन किया है न किसी का हक़ मारा है।

वर्ष 2014 में फ़ेसबुक ने एक मुक़ाबला रखा जिसके दौरान यूज़र्स से कहा गया था कि वह अपने और अपने मित्र के बारे में व्यक्तिगत सवालों का जवाब देकर अपने व्यक्तित्व के मनो वैज्ञानिक आयाम को समझे। इस प्रकार के बहुत से कंप्टीशन और गेम्स इंटरनेट पर पेश किए जाते हैं जिसके दौरान फ़ेसबुक की ज़िम्मेदारी होती है कि वह यूज़र्स की प्राइवेसी की रक्षा करे या इसी प्रकार गेम्स या मुक़ाबला समाप्त होने के बाद उसकी जानकारी और प्राइवेसी को तबाह कर दे किन्तु कुछ दिन पहले ही कैम्ब्रिज अनालेटीका के एक कर्मी क्रिस्टोफ़र वाएली ने दावा किया था कि फ़ेसबुक ने इस कंप्टीशन में शामिल होने वाले 2 लाख 70 हज़ार यूज़र्स की जानकारियां बिना उनकी अनुमति के कैम्ब्रिज अनालेटीका को बेच दी और इस प्रकार से यह कंपनी सूचनाओं के आधार पर यूज़र्स की व्यक्तिगत सूचनाओं तक पहुंचने में सफल रही।

कैम्ब्रिज अनालेटीका एक शेयर कंपनी है जो चुनावी, राजनैतिक और रणनैतिक सर्विस जैसी प्रक्रियाओं में डाटा उपलब्ध कराती है और केवल 2014 में ही अमरीका के चुनावों में इसने हस्तक्षेप किया। मार्च 2018 में न्यूयार्क टाइम्ज़ और आबज़र्वर ने अपनी रिपोर्टों में बताया था कि इस कंपनी ने बिना अनुमति के उन आन लाइन सूचनाओं को जो अकैडमिक लक्ष्यों के लिए जमा की गयी थी, अपने राजनैतिक लक्ष्यों के लिए प्रयोग किया। इस मामले में 97 प्रतिशत अमरीकी बलि चढ़े थे जबकि अन्य दूसरे देशों के थे। कैम्ब्रिज अनालेटीका ने इन सूचनाओं  को राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के हित में चुनावी प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने के लिए प्रयोग किया।

वर्ष 2018 में इस कंपनी के विरुद्ध मीडिया के हंगामों के बाद व्यवहारिक रूप से सभी ख़रीदार और स्रोत फ़रार हो गये। कैम्ब्रिज अनालिटीका ने मई महीने के आरंभ में कहा था कि उसके लिए काम जारी रखना संभव नहीं है और उसके पास दीवालिएपन की घोषणा करने के अतिरिक्त कोई और चारा नहीं है। इसके बावजूद यह केवल एकमात्र कंपनी नहीं थी जिसने यूज़र्स की सूचनाओं का दुरुपयोग किया। वास्तविता यह है कि विभिन्न सोशल मीडिया ने कुछ वर्षों के दौरान बहुत से लोगों की व्यक्तिगत सूचनाएं प्रयोग कीं और बहुत से मामलों में यूज़र्स को मुक़ाबले में शामिल होने या आन लाइन गेम खेलने का निमंत्रण दिया जाता है।

हालिया घटनाओं के बाद फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़ुकरबर्ग ने वचन दिया था कि वह अपनी कंपनी के हर इलेक्ट्रानिक कार्यक्रम की गहन समीक्षा करेंगे। उन्होंने वचन दिया था कि फ़ेसबुक ने यदि यूज़र्स की प्राइवेट सूचनाएं प्रयोग कीं तो उसके बारे में उसे सूचित करेगा। इन समस्त चीज़ों के बावजूद फ़ेसबुक ने जो नुक़सान पहुंचाया है उसकी भरपाई कभी भी नहीं की जा सकती। कुछ दूसरी कंपनियां यथावत फ़ेसबुक की प्राचीन सूचनाओं तक पहुंच रखती हैं और किसी भी शैली से उनको रोका नहीं जा सकता।

वर्तमान समय में लगभग समस्त डिजीटल डिवाइस विभिन्न शैलियों द्वारा अपने मालिकों की जीवन शैली में ताक झांक लगाए रहते हैं।  सर्च इंजन, विज्ञापनकर्ता, इलेक्ट्रानिक व्यापारिक प्लेटफ़ार्म यहां तक वायरलेस डिवाइस और इन्टरनेट सेवाएं देने वाली कंपनियां, व्यक्ति की पोज़िशन, पहचान और उसकी रुची के बारे में सब कुछ जानती हैं।

नई सूचनाएं इस बात का चिन्ह है कि फ़ेसबुक अपने यूज़र्स की सूचनाओं को एकत्रित करने के साथ इन्टरनेट की दुनिया में 84 लाख वेबसाइटों तक यूज़र्स का पीछा करता है। जानकारियों को एकत्रित करने का क्रम तब भी जारी रहता है जब यूज़र्स Incognito का बटन दबा देता है तब भी। फ़ेसबुक इस बात पर सक्षम है कि वह वेबसाइटें जो अपनी पोस्टों को प्रयोग करने के लिए इस सोशल साइट का प्रयोग करने के लिए लाइक के बटन का प्रयोग करती हैं, या वह वेबसाइटें जो इस काम के लिए स्पेशल पिक्सल का प्रयोग करती हैं, यूज़र्स की सूचनाएं लेती हैं और उसको एकत्रित करती हैं।

यहां पर महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि केवल फ़ेसबुक ही नहीं है जो इस विशेषता से संपन्न है बल्कि दूसरी सर्विसेज़ भी इस प्रकार की सूचनाएं एकत्रित करती हैं। गूगल, ट्वीटर और ब्लिंकड इन जैसी वेबसाइटों और सर्विसेज़ की ओर संकेत किया जा सकता है। उदाहरण स्वरूप गूगल एनालिटिक्स  Google Analytics एक मज़बूत सर्विस है जिसका सर्च इंजन विभिन्न यूज़र्स की जानकारियां एकत्रित करता है किन्तु जिस चीज़ ने फ़ेसबुक को ट्वीटर जैसी अन्य साइटों और सोशल मीडिया से अलग कर रखा है वह इस सर्विस में मासिक रूप से सक्रिय यूज़र्स हैं जिनकी संख्या बहुत है और इसी प्रकार यह सोशल साइट सूचनाएं एकत्रित करने का एक बड़ा प्लेटफ़ार्म है।

अंत में इस बिन्दु की ओर संकेत करना आवश्यक है कि सोशल मीडिया पर प्राइवेसी बहुत ही नुक़सानदेह हो सकती है और संभव है कि इससे किसी भी प्रकार से लाभ उठाया जा सकता है। इसी के साथ ही इससे अपराध में भी वृद्धि होती है क्योंकि सूचनाएं व्यापक रूप से अज्ञात लोगों तक पहुंच जाती है जिनको हम सरलता से पहचानते भी नहीं है और कि जिनकी सूचनाएं प्रयोग की जा रही हैं उनको इसकी भनक तक नहीं लगती।  इसी प्रकार यूज़र्स की जानकारियों पर उनका मालेकाना हक़, निश्चित व यक़ीनी नहीं है और सोशल मीडिया जैसे भी चाहे और जिस प्रकार भी चाहे अपने राजनैतिक और सामाजिक लक्ष्यों के लिए उनकी जानकारियों को एकत्रित कर सकता है और उनसे लाभ उठा सकता है।

एमपीआई एसडब्लूयएस नामक जर्मनी की साफ़्टवेयर कंपनी के शोधकर्ता  पाउल फ़्रांसिस का कहना है कि इससे पहले तक होने वाली वास्तविक प्राइवेसी या अपरिचितता अब मर गयी है किन्तु हमें केवल यह आशा होनी चाहिए कि अपनी प्राइवेसी की रक्षा के लिए धीरे धीरे आगे बढ़ना चाहिए। (AK)