Jun १३, २०१८ १५:४५ Asia/Kolkata

​​​​​​​ईरान के साथ परमाणु समझौते को विश्व में कूटनीति का बहुत बड़ी उपलब्धि कहा जाता है लेकिन ट्रम्प ने अमरीका के इस से बाहर  निकलने का एलान करके , इस समझौते के लिए चुनौतियां पैदा कर दी हैं किंतु वर्तमान समय में इस संदर्भ में जो चीज़ सब से अधिक महत्वपूर्ण है वह गुट पांच धन एक के सदस्य तीन युरोपीय देशों अर्थात, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन का रुख है।

युरोपीय संध में विदेश नीति की प्रभारी, फेड्रीका मोगरेनी ने जेसीपीओए की सुरक्षा पर बल दिया  और कहा है कि उसका कोई विकल्प नहीं है। मोगरेनी ने बल दिया कि ईरान के साथ परमाणु समझौता, 12 वर्षों की कूटनैतिक कोशिश का फल है जो पूरे विश्व समुदाय से संबंधित है ، उसका नतीजा भी सामने आ चुका है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम के शांतिपूर्ण होने की गारंटी का मक़सद भी पूरा हो गया। तीन युरोपीय देशों ने भी एक संयुक्त बयान जारी करके , जेसीपीओए से निकलने के अमरीकी फैसले की आलोचना की और इस समझौते को सुरक्षित रखने पर बल दिया है। जर्मनी के विदेशमंत्री, हेको मास का ख्याल है कि जेसीपीओए से विश्व अधिक सुरक्षित हुआ है और उसके बिना विश्व असुरक्षित हो जाएगा। वह जेसीपीओए की विफलता के अंजाम के बारे में कहते हैं कि हमें इस बात की चिंता है कि जेसीपीओए की विफलता से कहीं संकट पैदा न हो जाए और हम सन 2013 की स्थिति में लौट जाएं और यह वह चीज़ है जिसकी किसी को भी इच्छा नहीं है। युरोपीय आयोग के प्रमुख  " जॅान क्लाउड यॅान्कर" के अनुसार, जेसीपीओए से अमरीका का निकलना, विश्व शांति के लिए ठीक नहीं है और परमाणु समझौते के मूल सदस्य के रूप में इस समझौते की हमें रक्षा करना चाहिए और अमरीका की आतंरिक नीतियों पर इस समझौते की बलि नहीं चढ़ानी चाहिए। उनके अनुसार युरोप को अमरीका के साथ द्वीपक्षीय समझौते के लालच का मुक़ाबला करना चाहिए क्योंकि इससे युरोप कमज़ोर होगा।

 

 

 

युरोप इस समय दोराहे पर खड़ा है । युरोप ने हालिया महीनों में जेसीपीओए को बचाए रखने की व्यापक कोशिश की है और इसके लिए तीनों युरोपीय देशों के नेताओं ने अमरीका की यात्रा भी की लेकिन उनके प्रयास विफल रहे। ट्रम्प ने इस्राईल की बात मानते हुए ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को परिणामहीन बताते हुए उससे बाहर निकलने का एलान कर  दिया। ब्रिटेन के भूतपूर्व विदेशमंत्री जैक स्ट्रॅा का मानना है कि ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से निकलने का ट्रम्प का फैसला ख़तरनाक है  जिसका कोई औचित्य नहीं है। इस समय न केवल युरोप बल्कि गुट पांच धन एक के अन्य सदस्यों को चाहिए कि एक बार हमेशा के लिए अमरीका के साथ फैसला कर लें । जेसीपीओए ने अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी है और आईएईए के अनुसार ईरान ने समझौते के दायरे में अपने सभी वचनों का पालन किया है और अमरीका के अलावा गुट पांच धन एक के सभी सदस्यों ने भी इस की पुष्टि की है हालांकि कुछ अमरीकी अधिकारियों ने भी अपने बयानों में यह स्वीकार किया है। इन हालात में ट्रम्प जो कुछ चाह रहे हैं वह न केवल यह कि समझौते में कहीं गयी बातों के खिलाफ है बल्कि वह चीज़ें, जेसीपीओए में उल्लेख प्रतिबद्धताओं के भी आगे हैं और वह इसमें ईरान की मिसाइल क्षमता तक को भी शामिल करना चाहते हैं और वास्तव में यह इ्सराईल और सऊदी अरब जैसे  अमरीका के घटकों की इच्छा है । अमरीका के पूर्व विदेश सचिव , फ्रांक विस्नर जेसीपीओए से निकलने के ट्रम्प के फैसले को रणनीतिक गलती बताते हुए कहते हैं कि, यह बहुत खेदजनक क़दम है लेकिन आशा है कि युरोप, चीन और रूस समझौते में बाकी रहेंगे और उसकी उपलब्धियों की रक्षा करेंगे।

 

 वर्तमान समय में युरोप और अमरीका के मध्य विशेषकर व्यापार के क्षेत्र में  विवादों की लंबी सूचि है यहां तक  कि रूस पर प्रतिबंधों  के बारे में भी दोनों पक्षों में विवाद है लेकिन फिलहाल सब से बड़ा विवाद और मतभेद, जेसीपीओए को लेकर है। आज जेसीपीओए एक महत्वपूर्ण एतिहासिक मोड़ समझा जाता है जहां पर खड़े होकर युरोपीय संघ, अमरीका और विशेष कर ट्रम्प के युद्धोन्मादी मार्ग से अपना रास्ता अलग कर सकता है। इस मार्ग पर चलते हुए युरोप को जेसीपीओए के जारी रहने , ईरान के साथ संबंध सुरक्षित रखने और ईरान के विरुद्ध प्रतिबंधों को प्रभावहीन बनाने जैसे विषयों पर ध्यान देना होगा। जेसीपीओए युरोप के लिए कई आयामों से महत्वपूर्ण है। सब से पहली बात तो यह है कि जेसीपीओए युरोप की नज़र में शीत युद्ध के बाद युरोप की एक बड़ी कूटनीतिक व राजनीतिक उपलब्धि है। दूसरी बात यह है कि युरोपीय संघ, यह समझता है कि जेसीपीओए द्वारा जो सीमाएं निर्धारित की गयी उससे ईरान को परमाणु हथियारों की ओर बढ़ने से रोक दिया गया  और तीसरी बात यह है कि ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से , उत्तरी कोरिया के साथ संभावित परमाणु समझौते का एक उदाहरण मिल गया है। इसके साथ यह भी एक बात है कि जेसीपीओए ने ईरान के साथ युरोप के आर्थिक संबंधों को पुनः जीवन प्रदान किया है। अब युरोप यह नहीं चाहता कि मध्य पूर्व के एक अत्यन्त महत्वपूर्ण देश ईरान से एक बार फिर निकल जाए। वास्तव में युरोपीय देशों को, जेसीपीओए के क्रियान्वयन से बहुत लाभ हुआ और उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में ईरान के साथ बड़े बड़े आर्थिक सहयोग के समझौते किये लेकिन अमरीका को इस समझौते से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। लेकिन अमरीकी प्रतिबंधों की वापसी से युरोप के आर्थिक हित बुरी तरह से प्रभावित होंगे।

 

 

 

वर्तमान समय में ईरान के लिए जो चीज़ महत्वपूर्ण है वह जेसीपीओए में रहने का लाभ है। युरोप ने खुद कई बार यह स्वीकार किया है कि वह ईरान के खिलाफ अमरीका के व्यापक प्रतिबंधों का हर ओर से मुकाबला करने की शक्ति नहीं रखते और विशेषकर टोटल, साइमन्स, या एयरबस जैसी बड़ी कंपनियों के ईरान से निकलने के फैसले को प्रभावित करने की ताक़त नहीं रखते। इन हालात में भी युरोपीय संघ की हालिया बैठक में ईरान के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखने के लिए कुछ फैसले किये गये जिनमें सन 1996 में पारित हुए उस कानून को पुनः लागू करने का उल्लेख किया जा सकता है जिसका उद्देश्य युरोपीय कंपनियों को अमरीकी प्रतिबंधों से बचाना है।

 

 

 

बेल्जियम में निर्यात संगठन के प्रमुख पास्कल डेल्कोमेंट  का कहना है कि केवल प्रतिबंधों की वजह से ही ईरान में पुंजीनिवेश कठिन नहीं होता बल्कि अमरीकी प्रतिबंधों से भय, भी ईरान की ओर बढ़ते  बहुत से निवेशकों के क़दमों को सुस्त कर देता है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ, युसुफ मौलाई इस सवाल के जवाब में कि क्या युरोप इस कानून की मदद से ईरान के साथ आर्थिक सहयोग जारी रख सकता है? कहते हैं कि निश्चित रूप से यह चीज़ युरोप के हाथ में है और अधिकतर फ्रांसिसयों ने कहा है कि वह यह काम जारी रखेगें लेकिन इस सहयोग का कानून से कोई संबंध नहीं है  हर देश अपने राष्ट्रीय हितों के दायरे में फैसला करने का अधिकार रखता है और युरोपीय संघ भी अगर राजनीतिक संकल्प रखता होता तो वह अपने स्तर पर यह काम कर सकता है। यह वास्तव में एक तरह का सहयोग है जिसके अंतर्गत युरोप और ईरान के व्यापारी , अमरीकी प्रतिबंधों के बावजूद एक दूसरे के साथ सहयोग कर सकते हैं।

 

 

 

 

 

यूरोपीय आयोग के प्रमुख जान क्लोट यूनकर के अनुसार, यूरोपीय संघ ने परमाणु समझौते से अमरीका के बाहर निकलने के परिणामों को निष्प्रभावी बनाने के लिए एक प्रतिरोधक क़ानूनी प्रक्रिया शुरू की है। इसी तरह की एक क़ानूनी प्रक्रिया उसने वर्ष 1996 में क्यूबा के ख़िलाफ़ अमरीका के प्रतिबंधों का मुक़ाबला करने के लिए तैयार की थी। यह प्रतिरोधक प्रक्रिया, यूरोपीय कंपनियों को अमरीका से बाहर वाशिंग्टन के प्रतिबंधों को स्वीकार करने से रोकती है। इस प्रकार, क्यूबा के ख़िलाफ़ अमरीका के प्रतिबंधों में यूरोपीय कंपनियों के शामिल होने को यूरोपीय संघ के क़ानूनों के विपरीत बताया गया था। इस प्रतिरोधक प्रक्रिया का उल्लंघन करने वाली कंपनियों को उनके अपने देश के आंतरिक क़ानून के हिसाब से दंडित किया जाता था। इस प्रक्रिया के परिप्रेक्ष्य में अमरीकी जजों की ओर से अमरीका के बाहर के किसी भी काम के लिए यूरोपीय नागरिकों के ख़िलाफ़ जारी किए जाने वाले फ़ैसलों को भी अमान्य समझा जाता था। इस तरह से यूरोपीय संघ के देशों ने प्रतिरोधक क़ानूनों के माध्यम से क्यूबा के ख़िलाफ़ अमरीका के प्रतिबंधों को बड़ी हद तक विफल बना दिया था।

 

यूरोपीय अधिकारियों के बयानों के दृष्टिगत इस बात की आशा रखी जा सकती है कि वे इसी तरह के क़ानून बना कर ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका के प्रतिबंधों को भी स्वीकार नहीं करेंगे। इस तरह से कहा जा सकता है कि इस समय ईरान विरोधी प्रतिबंधों को ध्वस्त करने का हथियार यूरोपीय अधिकारियों के हाथ में है। यह क़ानून बड़ी हद तक ईरान से व्यापार करने वाली यूरोप की छोटी और औसत दर्जे की आर्थिक कपंनियों के समर्थन का मार्ग प्रशस्त कर देगा। अलबत्ता यूरोप की बड़ी कंपनियों के व्यवहार में अमरीका के साथ उनके व्यापक व्यापार के दृष्टिगत बदलाव की संभावना कम ही है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि यूरोप के प्रतिरोधक क़ानून, ईरान के साथ यूरोप के आर्थिक व व्यापारिक संबंधों के लिए बहुत अधिक प्रभावी नहीं होंगे और अमरीका के प्रतिबंधों के सभी प्रभावों को विफल नहीं बना पाएंगे।(Q.A)