अल्लाह के ख़ास बन्दे- 27
हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद उनके सबसे बड़े बेटे इमाम हसन अलैहिस्सलाम, अपने पिता के उत्तराधिकारी बने।
अपनी आयु के अंतिम समय तक उन्होंने इस दायित्व का पूरी गंभीरता के साथ निर्वाह किया। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पद चिन्हों का ही अनुसरण किया। उत्तराधिकार के दायित्व के निर्वाह में उन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा किंतु वे इससे पीछे नहीं हटे और जीवन के अन्तिम काल तक उन सिद्धांतों पर कटिबद्ध रहे जो हज़रत अली ने निर्धारित किये थे।
इमाम हसन अलैहिस्सलाम, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सबसे बड़े बेटे थे। आपकी माता का नाम हज़रत फ़ातेमा ज़हरा था जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) की सुपुत्री थीं। तीसरी हिजरी क़मरी के रमज़ान की 14 तारीख़ को आपका जन्म मदीना नगर में हुआ था। जब आपका जन्म हुआ तो आपकी मां हज़रत फ़ातेमा ज़हरा ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कहा कि आप बच्चे का नाम रखिये। हज़रत अली ने कहा कि इस बच्चे का नाम पैग़म्बरे इस्लाम (स) ही रखेंगे। अब उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की प्रतीक्षा की। जब पैग़म्बरे इस्लाम (स) हज़रत अली के घर पहुंचे तो उन्होंने नवजात को अपनी गोद में लेकर चूमा। बच्चे के कानों में अज़ान और अक़ामत कही। इसके बाद उसका नाम हसन रखा। हसन एसा नाम था जो अज्ञानता के काल में सुना नहीं गया था। कहते हैं कि इससे पहले अज्ञानता के काल में हसन नाम नहीं रखा जाता था।
इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शिक्षा प्रशीक्षा इमाम अली और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा जैसे महान लोगों की गोद में हुआ। उन्हें ईश्वर के अन्तिम दूत पैग़म्बरे इस्लाम का मार्गदर्शन प्राप्त था। इस प्रकार के महान लोगों की देखरेख में पलकर इमाम हसन का लालन पालन हुआ। बचपन से ही उनके भीतर एसी बातें देखी जा रही थीं जो एक सामान्य बच्चे में नहीं होतीं। बचपन में इमाम हसन अलैहिस्सलाम, जो आयतें मस्जिद में अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम से सुनते थे उसे घर आकर अपनी माता को बताते थे। जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम घर आते तो वही आयतें हज़रत फ़ातेमा ज़हरा उन्हें सुनाती थीं। एक दिन हज़रत अली ने हज़रत फ़ातेमा से पूछा कि यह आयतें आपने कब सुनीं तो वे कहती थी कि हसन ने आकर मुझको सुनाई हैं।
पैग़म्बरे इस्लाम (स) इमाम हसन से बहुत प्रेम करते थे। इस बारे में वे कहते हैं कि हे ईश्वरः मैं उसको पसंद करता हूं, तू भी उसको पसंद कर। सही बुख़ारी किताब में इब्ने अब्बास से रवायत है कि एक बार पैग़म्बरे इस्लाम (स) इमाम हसन अलैहिस्सलाम को अपने कांधे पर बैठाकर ले जा रहे थे। जब एक व्यक्ति ने यह देखा तो कहा कि तुम्हारी सवारी कितनी अच्छी है। इसपर पैग़म्बर ने कहा कि देखो सवार भी कितना अच्छा है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) के एक साथी कहते हैं कि एक बार हम एक मुसलमान भाई के निमंत्रण पर उसके घर गए थे। रास्ते में मैंने देखा कि हसन खेल रहे हैं। इसी बीच पैग़म्बरे इस्लाम बहुत तेज़ी से इमाम हसन की तरफ गए। उनके खेल को देखकर पैग़म्बरे इस्लाम खुश हो रहे थे। कुछ देर के बाद आपने इमाम हसन को अपनी गोद में लिया और कहा कि मेरा हसन मुझसे है और मैं उससे हूं। ईश्वर हर उस व्यक्ति को पसंद करता है जो हसन को पसंद करता है। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम के कई कथनों में यह मिलता है कि हसन, चालढाल रंगरूप और व्यक्तित्व में मेरे जैसा है।
पैग़म्बरे इस्लाम (स) के एक साथी कहते हैं कि मैंने कई बार देखा कि रसूले ख़ुदा नमाज़ पढ़ रहे थे और जब वे सजदे में गए तो हसन उनकी पीठ पर जाकर बैठ गए। इसके बाद पैग़म्बर ने सजदे से उस समय तक सिर नहीं उठया जबतक उनकी पीठ से हसन उतरकर नहीं चले गए। इस संबन्ध में आपके बहुंत से कथन मिलते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम (स) के इन कथनों से पता चलता है कि इस काम के माध्यम से वे लोगों को अपने परिवार का महत्व बताना चाहते थे। वे यह चाहते थे कि इस बात को समझने के बाद उनके बाद मार्गदर्शक के चयन में लोगों से ग़लती न हो और लोग सही व्यक्ति का चयन करें। इस संबन्ध में आयते ततहीर, मवद्दत और मुबाहेला का उल्लेख किया जा सकता है।
खेद की बात है कि इमाम हसन अलैहिस्सलाम को केवल सात वर्षों तक ही पैग़म्बरे इस्लाम (स) का साथ मिला। जब उनकी आयु सात वर्ष की थी तो आपके नाना पैग़म्बरे इस्लाम (स) का स्वर्गवास हो गया। अब उनके पास केवल अपने नाना की यादें बाक़ी बची थीं। अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम (स) के स्वर्गवास को अभी कुछ ही समय बीता था कि आपकी माता हज़रत फ़ातेमा ज़हरा शहीद हो गईं। अब आपके पास हज़रत अली का ही सहारा बचा था। इमाम हसन ने अपने पिता की छत्रछाया में बहुत कुछ सीखा। ज्ञान की उच्चस्तरीय बातें और ईश्वरीय भय जैसी विशेषताओं को आपने अपने पिता हज़रत अली से सीखा था। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन में 25 बार हज किया। इन 25 हज़ों में कई बार आप पैदल ही हज के लिए गए।
इमाम हसन अलैहिस्सलाम की एक विशेषता यह थी कि वे बहुत अधिक दान-दक्षिणा किया करते थे। पवित्र क़ुरआन में दान देने और लोगों की सहायता करने पर बहुत बल दिया गया है। इमाम हसन के कृपालू होने और दान के बारे में एक विद्वान “मुहम्मद बिन यूसुफ़ ज़रंदी” अपनी एक किताब में लिखते हैं कि एक बार एक ज़रूरतमंद व्यक्ति ने सहायता के लिए इमाम हसन को ख़त भेजा। इमाम ने उसका पत्र पढ़े बिना ही उससे कहा कि तुमने जो भी मांगा है वह पूरा हो गया। इसपर उस व्यक्ति ने कहा कि हे इमाम आप कम से कम मेरा ख़त तो पढ़ लेते ताकि पता चल जाता कि मुझको क्या ज़रूरत है। इसके जवाब में इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मुझको इस बात का भय था कि देर में सहायता करने के कारण मांगने वाले के मुंख पर जो लज्जा की निशानी है वह देर तक रहेगी और इससे कहीं ईश्वर नाराज़ न हो जाए।
इमाम हसन की इस बात में एक नैतिक संदेश छिपा हुआ है। वह संदेश यह है कि क़ुरआन के अनुसार मदद मांगने वाले के चेहरे पर शर्मिंदी के निशान देर तक न रहें अर्थात उसकी तत्काल सहायता की जाए। साथ ही उसके मान-सम्मान और उसकी प्रतिष्ठा को भी कोई ठेस न पहुंचने पाए। इस घटना के अगले दिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम जब मस्जिद गए तो उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति ईश्वर से कुछ मांग रहा है। वह ईश्वर से दस हज़ार दिरहम की मांग कर रहा था। जब इमाम हसन ने यह सुना तो वे फौरन मस्जिद से बाहर गए और एक व्यक्ति के हाथों दस हज़ार दिरहम उसके लिए भेजे। इमाम हसन अलैहिस्सलाम के बारे में बताया जाता है कि वे ईश्वर के मार्ग में हमेशा लोगों की सहायता करते रहते थे।
इमाम हसन अलैहिस्सलाम में नैतिकता भी कूट-कूटकर भरी थी। एक बार शाम का रहने वाला एक व्यक्ति मदीने आया। वह शाम में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों के विरुद्ध किये जाने वाले दुष्प्रचारों से बहुत प्रभावित था। जब उसने इमाम हसन को देखा तो उनको देखकर अपशब्द कहने लगा। इमाम हसन उसकी बातों को बहुत धैर्य से सुनते रहे। जब वह व्यक्ति चुप हो गया तो इमाम ने कहा कि मुझको लगता है कि तुम अजनबी हो। अगर तुमको यहां पर किसी भी तरह की ज़रूरत है तो मैं उसे पूरा करने के लिए तैयार हूं। अगर तुमको भूख लग रही है तो मैं तुम्हारे लिए खाने का प्रबंध करा सकता हूं। इसके अतिरिक्त भी यदि तुमको कोई आवश्यकता है तो बताओ, मैं उसको पूरा करूंगा। शाम के रहने वाले व्यक्ति ने जब इमाम हसन के इस व्यवहार को देखा तो उसे अपने करने पर बहुत पछतावा हुआ। इमाम हसन की बातें सुनकर वह रोने लगा। फिर उसने कहा कि वास्तव में आप ही इमाम हैं और आप ही हज़रत अली के उत्तराधिकारी हैं।