फ़िलिस्तीन इस्राईल विवाद के समाधान के लिए अमरीकी राष्ट्रपति का अनुवाद
फिलिस्तीन और इस्राईल के मध्य विवाद के समाधान के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जो सुझाव दिया है उसे “द डील आफ सेन्चुरी” का नाम दिया गया है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी राष्ट्राध्यक्षों के समक्ष एक महत्वपूर्ण चुनौती फ़िलिस्तीन- इस्राईल विवाद का समाधान रहा है परंतु वे कभी भी इस विवाद का समाधान करने में सफल नहीं हो सके। क्योंकि अमेरिका ने कभी भी निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभाई और वह सदैव इस्राईल और उसके अपराधों का प्रबल समर्थक रहा है। अमेरिकियों ने फिलिस्तीन- इस्राईल विवाद के समाधान के लिए विभिन्न योजनाएं, सुझाव एवं प्रस्ताव पेश किये परंतु उनके द्वारा पेश किये गये सुझाव कभी भी न तो फिलिस्तीन- इस्राईल विवाद का समाधान कर सके और न ही इस विवाद के कम करने में वे कोई भूमिका निभा सके। डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाने के बाद उनका एक लक्ष्य फिलिस्तीन- इस्राईल विवाद का खत्म कर देना रहा है। इसके लिए उन्होंने डील आफ द सेन्चुरी नामक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव के कुछ अनुच्छेदों को अब तक लागू भी किया जा चुका है। डोनाल्ड ट्रम्प के दामाद और उनके सलाहकार जार्ड कुश्नर मध्यपूर्व में अमेरिका के विशेष दूत जेसिन और इस्राईल में अमेरिका के राजदूत डेविड फ्रेडमैन इस प्रस्ताव के मुख्य सूत्राधार हैं।
यद्यपि अभी फिलिस्तीन- इस्राईल विवाद के समाधान के लिए दिये गये प्रस्ताव की साफ साफ घोषणा नहीं की गयी है परंतु संचार माध्यमों और जानकार हल्कों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार ने गत 7 महीनों के दौरान जो कुछ अंजाम दिया है उसके दृष्टिगत डील आफ द सेन्चुरी के कुछ महत्वपूर्ण अनुच्छेद इस प्रकार हैं।
डील आफ द सेन्चुरी का एक महत्वपूर्ण अनुच्छेद फिलिस्तीन में दो देशों का गठन है परंतु इस अनुच्छेद के कुछ विवरण भी हैं। फिलिस्तीन में दो देशों के गठन का प्रस्ताव वर्षों पुराना है जिसे जायोनी शासन के साथ तथाकथित शांतिवार्ता के पक्षधर गुटों ने स्वीकार किया था परंतु इस प्रस्ताव में काफी मतभेद हैं जिसके कारण अब तक उसे लागू नहीं किया जा सका है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने डील आफ द सेन्चुरी नाम का जो प्रस्ताव दिया है उसमें यह बात भी शामिल है यानी फिलिस्तीन में दो देशों के गठन का प्रस्ताव।
“डील आफ द सेन्चुरी” प्रस्ताव का पहला कदम, पुराने क़ुद्स को अतिग्रहणकारी जायोनी शासन की राजधानी के रूप में उसके हवाले करना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दिसंबर 2017 में कुद्स नगर को जायोनी शासन की राजधानी के रूप में मान्यता दी और निर्देश दिया कि अमेरिकी दूतावास को तेअलवीव से क़ुद्स स्थानांतरित करने की भूमि प्रशस्त की जाये और यह निर्णय जारी वर्ष के मई महीने में व्यवहारिक कर दिया गया। मध्यपूर्व मामलों के एक विशेषज्ञ सैयद हादी इस संबंध में कहते हैं कि “डील आफ द सेन्चुरी” का पहला कदम कुद्स को इस्राईल की राजधानी के रूप में मान्यता देना था। वास्तव में कुद्स को एक बनाये रखना, उसका यहूदीकरण और दोबारा उसके बटवारे का विरोध “डील आफ द सेन्चुरी” का महत्वपूर्ण भाग है और फिलिस्तीन और इस्राईल के मध्य विवाद के समाधान के लिए जो तथाकथित शांतिवार्ता होगी उसमें अब कुद्स के बारे में कोई वार्ता नहीं होगी क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी इस संबंध में बल देकर कहा है कि अब वार्ता की मेज़ पर कुद्स के संबंध में कोई बात नहीं होगी।
इसी प्रकार “डील आफ द सेन्चुरी” नामक समझौते में सुझाव दिया गया है कि कुद्स से लगे क्षेत्र “अबूदीस” को फिलिस्तीन की राजधानी बनाया जायेगा। इस्राईली समाचार पत्र हआरेत्ज़ ने इस संबंध में लिखा है कि “डील आफ द सेन्चुरी” नाम से प्रसिद्ध ट्रम्प का प्रस्ताव इस बात का सूचक है कि अमेरिका कुद्स के पूरब में स्थित अबूदीस गांव को फिलिस्तीन की राजधानी के रूप में सुझाव देने का इरादा रखता है और इसके मुकाबले में इस्राईल कुद्स के इर्द- गिर्द के तीन या पांच गांवों से पीछे हट जायेगा। ज्ञात रहे कि ये वे गांव हैं जिन पर वर्ष 1967 से जायोनी शासन ने कब्ज़ा कर रखा है जबकि कुद्स का पुराना भाग इस्राईल के नियंत्रण में रहेगा और ट्रम्प द्वारा पेश किये गये प्रस्ताव में इस बात का सुझाव नहीं दिया गया है कि इस्राईल जायोनी कस्बों को खाली करेगा या उनसे पीछे हटेगा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रम्प ने “डील आफ द सेन्चुरी” नाम का जो समझौता दिया है उसमें यह प्रस्ताव दिया गया है कि जो फिलिस्तीन देश होगा उसके पास न कोई सेना होगी और न भारी हथियार होंगे। इसी प्रकार “डील आफ द सेन्चुरी” के अनुसार जो फिलिस्तीनी शरणार्थी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं उन्हें वापसी का अधिकार नहीं होगा और वे जिन देशों में हैं वहीं रह जायें ताकि इस प्रकार से इस्राईल की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाया जा सके।
इसी प्रकार “डील आफ द सेन्चुरी” के अनुसार समस्त अवैध जायोनी बसतियां पूरी तरह इस्राईल के नियंत्रण में रहेंगी यहां तक कि जार्डन नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित अवैध जायोनी कस्बे भी इस्राईल के नियंत्रण में रहेंगे। “डील आफ द सेन्चुरी” को इस्राईल की सबसे बड़ी सेवा का नाम दिया जा सकता है। यह प्रस्ताव उस समय पेश किया गया है जब 33 और 51 दिवसीय युद्ध ने दर्शा दिया है कि इस्राईल के बारे में जो यह कहा जाता था कि वह अजेय है उसके इस मिथक का अंत हो चुका है। इसी तरह “डील आफ द सेन्चुरी” को ट्रम्प सरकार ने एसी स्थिति में पेश किया है जब सीरिया और इराक में आतंकवादी गुटों से मुक्ति पाने के बाद प्रतिरोधक गुट फिर से मज़बूत हो रहे हैं। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि जायोनियों ने बारमबार घोषणा की है कि अब वे दोबारा 33 और 51 दिवसीय युद्ध की भांति प्रतिरोध के खिलाफ दूसरा युद्ध नहीं कर सकते। इस प्रकार की परिस्थिति में फिलिस्तीन में दो देशों के गठन के प्रस्ताव के व्यवहारिक होने से प्रतिरोधक गुटों की बढ़ती शक्ति के मुकाबले में इस्राईल की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाया जा सकता है और साथ ही फिलिस्तीन- इस्राईल विवाद के समाधान के लिए अमेरिका की जो योजनाएं विफल हो गयीं उनकी भरपाई भी की जा सकती है।
फिलिस्तीन विषय के बाद प्रतिरोध को कमज़ोर करना “डील आफ द सेन्चुरी” का एक अन्य लक्ष्य है। हालिया वर्षों में मध्यपूर्व दो गुटों का साक्षी रहा है एक वह जो जायोनी शासन के साथ तथाकथित शांति का पक्षधर रहा है और दूसरा वह जो उसके साथ वार्ता का विरोधी है और इस गुट का मानना है कि जायोनी शासन से वार्ता का कोई फायदा नहीं है और अपने अधिकारों को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग सशस्त्र संघर्ष है। वर्ष 2011 में जब इस्लामी देशों में जनांदोलन आरंभ हुए और जायोनी शासन के घटक तानाशाहों का अंत होने लगा तो परिस्थिति प्रतिरोध के हित में होने लगी और वह दिन प्रतिदिन मज़बूत होने लगा तो सीरिया में अशांति की चिनगारी जला दी गयी और इस देश को आतंकवाद के युद्ध में ढकेल दिया गया। इस युद्ध का लक्ष्य सीरिया की कानूनी सरकार को गिराना और प्रतिरोध को कमजोर व उसे खत्म करना था परंतु सीरिया में होने वाले युद्ध में जो चीज़ सामने आई वह यह है कि इस देश की कानूनी सरकार अपने स्थान पर बनी हुई है और प्रतिरोध मजबूत हुआ है। इस आधार पर “डील आफ द सेन्चुरी” का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य मध्यपूर्व में प्रतिरोध को कमज़ोर करना है।
इसी तरह “डील आफ द सेन्चुरी” का एक लक्ष्य अरब देशों और इस्राईल को निकट करना है तथा उन्हें ईरान और प्रतिरोध के मुकाबले में खड़ा कर देना है। जब से क्षेत्र में इस्लामी जागरुकता आंदोलन आरंभ हुआ है और आतंकवादी योजनाएं विफल हो गयी हैं तो अमेरिका का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य सऊदी अरब और इस्राईल को निकट करना और दोनों के मध्य जो गुप्त संबंध हैं उन्हें सार्वजनिक एवं आधिकारिक कर देना है। पिछले मार्च महीने में सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान द्वारा जायोनी शासन को मान्यता दिये जाने का बयान और उसके बाद बहरैन की आले ख़लीफा सरकार द्वारा इस्राईल को मान्यता दिये जाने का रूझान “डील आफ द सेन्चुरी” के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। कुछ अरब देशों के साथ इस्राईल के संबंधों को सामान्य बनाने का प्रयास जारी है ताकि अतिग्रहणकारी जायोनी शासन के लिए मध्यपूर्व की सतह पर वैधता प्रदान की जाये। साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस चीज़ का प्रयोग देश के भीतर और बाहर अपनी लोकप्रियता के लिए कर सकते हैं और वे इस विषय को बढ़ा- चढ़ाकर पेश कर सकते हैं कि इससे पहले के अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष फिलिस्तीन- इस्राईल विवाद का समाधान नहीं कर सके थे जबकि वह इस विवाद का समाधान करने में सफल रहे हैं। श्रोताओ आज के कार्यक्रम का समय यहीं पर समाप्त हुआ और अगले कार्यक्रम हम इस बात की चर्चा करेंगे कि “डील आफ द सेन्चुरी” में अरब देशों के दृष्टिकोण और उनकी भूमिका क्या है। तब तक के लिए हमें अनुमति दें।