पश्चिम में आत्महत्या
आत्महत्या एक ऐसा काम है जिसके माध्यम से मनुष्य उन समस्याओं से मुक्ति पाने का प्रयास करता है जिस्में वह घिरा होता है।
यह वह काम है जिसमें मनुष्य स्वयं को अपने ही हाथों से ख़त्म कर लेता है। दूसरे शब्दों में मनुष्य यह साचकर आत्महत्या करता है कि इस समय वह जिन कठिनाइयों में घिरा हुआ है उस्के समाधान का कोई अन्य मार्ग आत्महत्या के अतिरिक्त नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष संसार में लगभग दस लाख लोग आत्महत्या करते हैं। इससे पता चलता है कि संसार में हर 40 सेकेण्ड में एक आत्महत्या होती है। आत्महत्या करने वाले कभी अपने गले में फंदा लगाकर, कभी ज़हर पीकर, कभी विषाक्त चीज़ें खाकर तो कभी ख़ुद को गोली से मार कर समाप्त कर लेते हैं।
सर्वेक्षणों से पता चलता है कि आत्महत्या करने वालों की आय, सामान्यतः 15 साल से 29 वर्ष के बीच होती है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि आत्महत्या का कारण यदि अधिक शराब का सेवन, या मादक पदार्थों का सीमा से अधिक सेवन न हो तो फिर मानसिक परेशानी होती है। अवसाद के कारण भी लोग आत्महत्या कर लेते हैं जबकि समय रहते इसका उपचार कराया जा सकता है। अवसाद ऐसी समस्या है जो इस समय पश्चिमी देशों में बहुत व्यापक स्तर पर फैल चुकी है। इसकी गंभीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अभी हाल ही में ब्रिटेन में एक मंत्रालय का गठन किया गया है जिसका काम अवसाद ग्रस्त लोगों की सहायता करना है।
ब्रिटेन में इस समय बीस मिलयन अर्थात दो करोड़ लोग अवसाद या डिप्रेशन का शिकार हैं। ब्रिटेन की जनसंख्या के हिसाब से यह वहां की आबादी का तीसरा भाग है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के मनोरोग विभाग का कहना है कि ब्रिटेन के बड़ी आयु के दो तिहाई लोग इस समय गंभीर मानसिक रोग से पीड़ित हैं। आंकड़ों के अनुसार संसार के विकसित देशों में ब्रिटेन ही वह देश है जहां के अधिकांश लोग अवसाद या डिप्रेशन का शिकार हैं। यही चीज़ इस देश में आत्महत्या का प्रमुख कारण है।
ब्रिटेन के राष्ट्रीय सर्वेक्षण विभाग की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक वर्ष के दौरान इस देश में लगभग छह हज़ार लोगों ने आत्महत्या की। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि जो लोग आत्महत्या करते हैं उनमें से एक तिहाई पुरुष होते हैं। ब्रिटेन के राष्ट्रीय सर्वेक्षण विभाग की इसी रिपोर्ट के अनुसार यद्धपि ब्रिटेन में आत्महत्या के कई कारण हैं जैसे मानसिक रोग, पारिवारिक परिस्थितियां, दवाओं का अधिक मात्रा में सेवन तथा मादक पदार्थों का सीमा से अधिक सेवन आदि किंतु विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक समस्या, बेरोज़गारी, नौकरी से निकाला जाना और मानसिक विकार ऐसे कारक हैं जिनके कारण अधिकतर लोग आत्महत्या करते हैं।
आत्महत्याओं को रोकने के उद्देश्य से बनाई गई एक संस्था में प्रबंधक मर्जरी वाल्स इस बारे मे लिखते हैं कि आत्महत्या का एक कारण आर्थिक मंदी भी है। वे कहते हैं कि आर्थिक मंदी के कारण लोगों में तनाव और अवसाद पैदा होता है जो बाद में आत्महत्या का कारण बनता है। उनका कहना है कि सरकार की ओर से बजट घटाने और विभिन्न क्षेत्रों में ख़र्चों में कटौती भी आत्महत्या संकट के गंभीर होने में सहायता करती है।
एक रिपोर्ट के अनुसार न केवल ब्रिटेन में बल्कि कई अन्य पश्चिमी देशों में आत्महत्या की ओर रुझान बहुत अधिक है जबकि वहां पर आर्थिक रूप से संपन्नता पाई जाती है। वर्तमान समय में पश्चिमी देशों में पहचान का संकट बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। यूरोपीय देशों में आत्महत्याओं में तेज़ी से वृद्धि के कारण इससे वहां के अधिकारी बहुत चिंतित हैं। अमरीका में भी आत्महत्याओं में तेज़ी से वृद्धि देखी गई है। अमरीका के मनोचिकित्सक संघ के प्रमुख कहते हैं कि अपने भरसक प्रयासों के बावजूद हम इस समस्या को कम करने में विफल रहे हैं। अमरीका में पिछले 18 वर्षों के दौरान आत्महत्या में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह ऐसी स्थिति में है कि जब अमरीका में आत्महत्याओं में मारे गए लोगों में से 45 प्रतशित मानसिक बीमारियों से त्रस्त नहीं थे। अमरीका में पुरुषों में आत्महत्या की दर महिलाओं की तुलना में चार बराबर है।
अमरीका में बीमारियों को रोकने और नियंत्रण करने वाले केन्द्र की रिपोर्ट के अनुसार अमरीका में हर हज़ार व्यक्ति में से 16 लोग आत्महत्या कर लेते हैं। इस प्रकार अमरीका में हर 13वें मिनट में आत्महत्या होती है। एक सर्वेक्षण से यह भी पता चलता है कि अमरीका में हत्या का अनुपात आत्महत्या की तुलना में बहुत कम है। सन 2016 में अमरीका में लगभग 45 हज़ार लोगों ने आत्महत्या की थी। इस सर्वेक्षण में यह भी बताया गया कि आत्महत्या करने वालों का संबन्ध समाज के हर वर्ग से था।
एक समय तक आत्महत्याओं में वृद्धि जैसे विषय की समीक्षा करने वाले डाक्टर डेब्रासन कहते हैं कि आत्महत्या के लिए केवल एक ही दलील पेश नहीं की जा सकती किंतु अवसाद या डिप्रेशन को इसका प्रमुख कारक बताया जा सकता है। अमरीका के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कुछ समय पहले एलान किया था कि देश में पांच करोड़ साठ लाख से अधिक लोग प्रतिवर्ष टेंशन और अवसाद का शिकार हो जाते हैं जिनके उपचार पर सरकार पर बहुत अधिक धन का भार पड़ता है।
आत्महत्या ने न केवल मनोचिकित्सकों को ही चिंतित किया है बल्कि इस विषय ने समाज शास्त्रियों, दार्शनिकों और धर्मगुरूओं सभी को चिंतित कर रखा है। आत्महत्या की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि पश्चिमी विश्वविद्यालयों में Suicidology नामक विषय पढ़ाया जाता है। विद्वानों के अध्यनों का निष्कर्श यह बताता है कि आत्महत्या, उस समाज के प्रति व्यक्ति की घृणा को बताती है जिसने यह आत्महत्या की है। विद्वानों का यह भी कहना है कि यह घृणा आत्महत्या करने वाले में पहचान के संकट से उत्पन्न हुई है जो पश्चिमी समाज में बहुत तेज़ी से फैल रहा है।
वर्तमान समय में आधुनिक संसार की सबसे बड़ी समस्या पहचान का संकट है। समाज शास्त्रियों का कहना है कि इस समय का आधुनिक इंसान बड़े-बड़े शहरों में संपर्क साधनों के बीच में अपनी वास्तविकता को खो बैठे हैं। ऐसे लोगों में कहीं के न होने की भावना घर कर जाती है। वैसे यह भावना मनुष्य में किशोर अवस्था में भी पैदा होती है जो इस ओर ध्यान न देने के कारण उसके व्यक्तित्व के निर्माण में बाधा उत्पन्न करती है।
दूसरी ओर धार्मिक शिक्षाओं से दूरी भी इस समस्या का कारण है अर्थात धर्म से दूरी आत्महत्या का कारण बन सकती है। रिपोर्टों से पता चलता है कि वे देश जहां के लोग धर्म में आस्था रखते हैं वहां पर आत्महत्याएं कम की जाती हैं विशेषकर इस्लामी देशों में। जिन लोगों की धर्म में आस्था जितनी अधिक होगी उससे आत्महत्या की उम्मीद उतनी ही कम होगी। यह एक वास्तविकता है कि मनुष्य अपने जीवन में आत्मिक शांति और आत्मिक रूप से सुरक्षित रहने के प्रयास में रहता है। इस प्रकार वह भय, चिंता और असुरक्षा की भावना पर नियंत्रण करना चाहता है। धर्म और उसकी शिक्षाएं मनुष्य की इस अभिलाषा को पूरा कर सकती हैं।
धार्मिक मामलों के जानकारों का कहना है कि धर्म पर आस्था, मनुष्य की मनोस्वास्थ्य का सबसे अच्छा उपचार है। उनका कहना है कि यही भावना मनुष्य के भीतर आशा, विश्वास और सुरक्षा की भावना सुदृढ़ करती है। जिस व्यक्ति में भी धर्म के प्रति आस्था जितनी अधिक मज़बूत होगी उसके भीतर उसी अनुपात में निराशा दूर होती जाएगी। एसा व्यक्ति इस बात का आभास करता है जैसे वह किसी मज़बूत स्रोत से जुड़ा हुआ है और वह अकेला नहीं है। यही भावना धार्मिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को समस्याओं के समय विचलित नहीं होने देती और वह आत्महत्या जैसी बुराई की ओर नहीं बढ़ पाता।
बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि वर्तमान समय में पूरे विश्व विशेषकर पश्चिमी देशों में धार्मिक आस्था कम होती जा रही है। यही कारण है कि ऐसा लगता है कि इस प्रकार के समाज धर्म की ओर उन्मुख होकर अपनी एसी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं और एसा न करने की स्थिति में निश्चित रूप में स्थिति इससे अधिक ख़राब हो जाएगी।