अपनी देखभाल- 6
एक स्वस्थ शरीर व मन के लिए भावनाओं पर नियंत्रण बेहद ज़रूरी हो।
कभी कभी एक छोटी सी खुशी, मन को हल्का कर देती है और शरीर में प्रफुल्लता का संचार हो जाता है और कभी कभी मामली सा गुस्सा और थोड़ा सा दुख, हमें परेशान कर देता है और पूरा शरीर और मन बोझिल हो जाता है। इस लिए हम बड़ी आसानी से यह समझ सकते हैं कि हमारी भावनाएं सीधे रूप से हमारे स्नायु तंत्र को प्रभावित करती हैं। हमारा शरीर केवल खान पान को ही पचाने का काम नहीं करता बल्कि वह खाने पीने की चीज़ों के अलावा, हर प्रकार की मनोदशा पर भी प्रतिक्रिया प्रकट करता है और प्रभावित होता है। उदाहरण स्वरूप जब हम खुश होते हैं तो हमारे शरीर में सेरोटॅानिन , ऑक्सीटोसिन और डोपामीन जैसे खुशी भरने वाले हार्मोन्ज़ का स्राव होता है और इससे हमें ऊर्जा भी मिलती है लेकिन जब हम चिंतित या दुखी होते हैं तो हमारे शरीर में कोर्टिसोल जैसे हार्मोंज़ का स्राव होता है ताकि शरीर संतुलित रहे। लेकिन अगर इस का स्राव जिसे स्ट्रेस हार्मोंज़ का नाम दिया गया है, अधिक हो जाए तो यादाश्त को नुक़सान पहुंचता है इसके साथ ही हड्डियॉं खोखली होने लगती हैं, शरीर का भार बढ़ने लगता है और रक्त चाप व हदय गति में समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।
भावनाओं पर कंट्रोल के लिए आप को यह जान लेना चाहिए कि भावनाएं हमारे भीतर नहीं होती अर्थात जिस रूप में हम उसे प्रकट करते हैं वह रूप हमारे अस्तित्व के साथ ही बना नहीं होता, बल्कि इस शैली को हम सीखते हैं, अपने घर वालों से, अपने मित्रों से और अपने समाज से इसी लिए उस पर कंट्रोल करना भी आसान है। वैसे यहां पर यह बात स्पष्ट कर देना भी ज़रूरी है कि हम जिन भावनाओं को नकरात्मक कहते हैं और जिन पर अंकुश लगाने और नियंत्रण रखने की बात करते हैं वह सारी भावनाएं पूरी तरह से नकारात्मक नहीं होतीं बल्कि कुछ अवसरों पर यह भावनाएं हमारी रक्षा करती हैं और हमें खतरे से सचेत करती हैं। उदाहरण स्वरूप, भय एक नकारात्मक भावना है लेकिन वह इन्सान को संभवित खतरे से बचा सकता है और इस भावना के बल पर मनुष्य अपनी देखभाल और अपनी रक्षा ज़्यादा अच्छे अंदाज़ में कर सकता है।
इसी प्रकार क्रोध, एक नकारात्मक भावना है और हम इस बारे में चर्चा भी कर चुके हैं और यह बता चुके हैं कि क्रोध मनुष्य के लिए कितने भयानक परिणाम वाला हो सकता है लेकिन एक भी एक हक़ीक़त है कि क्रोध हमें अपनी और अपने से संबधिंत विभिन्न चीज़ों की रक्षा में मदद देता है और इसी भावना की मदद से हम दूसरों को अपने अधिकारों के हनन से रोक सकते हैं और दूसरों को उनकी सीमा में रहने पर विवश कर सकते हैं मगर बात फिर वही है कि इस पर नियंत्रण होना चाहिए , नियंत्रित क्रोध और नियंत्रित नफरत निश्चित रूप से हमारी मददगार होती है लेकिन आवश्यकता से अधिक हो जाने पर यही भावनाएं हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं इसी लिए विशेषज्ञ कहते हैं कि सकारात्मक भावना और सोच रखने वाले लोग अधिक स्वस्थ्य होते हैं और उनका जीवन अधिक खुशहाल होता है और वह लोग आसानी से दूसरों से संपर्क बना लेते हैं।
यही वजह है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम का बड़ा प्रसिद्ध कथन है कि लोगों के साथ तुम्हारा व्यवहार एेसा होना चाहिए कि जब तक जीवित रहो, लोग तुम से मिलने से लिए बेताब रहें और जब मर जाओ तो तुम्हें याद करके आंसूं बहाएं। निश्चित रूप से इस प्रकार का स्वभाव उसी व्यक्ति का हो सकता है जो सकारात्मकता को महत्व दे और नकरात्मकता से दूर रहे। नकारात्मकता से दूरी की वजह से उसके शरीर, उसके स्वभाव और उसके व्यवहार में जो शांति, ठहराव , मधुरता व पारदर्शिता आएगी वह अन्य लोगों को उसकी ओर आकृष्ट करेगी और इसी प्रकार के लोग , समाज में लोकप्रिय होते हैं और स्वभाव व व्यवहार से प्राप्त की गयी लोकप्रियता कभी खत्म नहीं होती।
अध्ययनों से पता चलता है कि अधिकांश लोग, नकारात्मक भावनाओं को , कम से कम तीन गुना अधिक महसूस करते हैं, अर्थात गुस्सा वास्तव में जितना आता है उससे तीन गुना अधिक, महसूस होता है। इसकी वजह भी यह बतायी गयी है कि चूंकि नकारात्मक भावना के समय मनुष्य का सारा ध्यान उसी ओर केद्रित रहता है इसी लिए वह इस भावना को कई गुना अधिक महसूस करता है। यही वजह है कि यदि किसी दिन आप के भीतर नकरात्मक व सकारात्मक भावना बराबर हो तो भी आप का मन बोझिल रहता है और नकारात्मकता का प्रभाव अधिक नज़र आता है। इसी लिए इस बात का अभ्यास करना चाहिए कि आप को अच्छी भावना तीन गुना अधिक महसूस हो ताकि इस तरह से आप खुश रह सकें और खुश ही नहीं, स्वस्थ्य रह सकें क्योंकि इस दुनिया में , जीवन में , और समाज में नकरात्मकता व सकारात्मकता दोनों ही हैं अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किसे अधिक महत्व देते हैं।
भावनाओं पर नियंत्रण का एक मार्ग तो यह है कि आप उसी समय उस पर ध्यान दें, जैसा कि पिछली चर्चा में हम बता चुके हैं लेकिन दूसरी राह यह भी हो सकती है कि हर रोज़ आप दिन भर के अपने व्यवहार पर ध्यान दें और देखें क्या गलत था और क्या सही? इसके साथ ही यह संकल्प लें कि सही को बढ़ाएगें और गलत कोअगले दिन फिर दोहराने से बचेंगे। यदि कुछ दिन इस तरह की शैली अपनायी जाए तो फिर मनुष्य की आदत बन जाती हैऔर यह निश्चित रूप से बहुत बड़ा काम हैऔर धर्म में भी इसका प्रोत्साहन है अर्थात हर दिन मनुष्य अपना हिसाब करे, स्वंय को कटघरे में खड़ा करे और देखे कि क्या किया है ?
एक और तरीक़ा यह बताया जाता है कि मनुष्य किसी एक भावना का चयन करे और फिर उस पर काम करे और उसे अपने भीतर मज़बूत करे। उदाहरण स्वरूप यदि आप अपने भीतर आत्मविश्वास की भावना को मज़बूत करना चाहें तो फिर आप के भीतर इस भावना को बढ़ाने में कौन सी चीज़ आप की मदद करेगी? आप को यह फैसला करना पड़ेगा कि इस के बाद आप खुद अपने बारे में फैसला करेंगे कोई दूसरा नहीं, क्या फैसला करेंगे यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि आप इस संकल्प को अपने मन में बार बार दोहराएं और इसका अभ्यास करें। कुछ लोगों कहते हैं कि हम फैसला नहीं कर सकते, क्योंकि बार बार हमें अपने फैसले के खिलाफ काम करने पर मजबूर हो जाते हैं। उनके जवाब में यह कहना चाहिए कि इन्सान को फैसला करना चाहिए, फैसला गलत होने से नहीं डरना चाहिए, क्योंकि गलत फैसला भी लाभदायक होता है और उसके परिणाम में मिलने वाली नाकामी में अनुभव का भंडार होता है। पहाड़ की चोटी पर विजय प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला पर्तवारोही कोई ज़रूरी नहीं है कि पहली ही कोशिश में सफल हो जाए बल्कि वह बार बार कोशिश करता है और हर बार पिछले अनुभवों से लाभ उठाते हुए आगे बढ़ता है और अन्ततः सफल होता है।