Feb ०५, २०१९ १६:५५ Asia/Kolkata

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने धर्म पर आस्था और सत्य व ईश्वर से भय जैसी विशेषताओं के अलावा एक वह चीज़ जिस पर बहुत अधिक बल दिया है और जो हर समय में एक ज़रूरत रही है , वह एकता है।

अर्थात उन्होंने बल दिया है कि उनके अनुयाइयों को हर उस चीज़ से बचना और दूर रहना चाहिए जिससे एकता को नुक़सान पहुंचता हो। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के मार्गदर्शन में एक अन्य बिन्दु यह है कि सारी सिफारिशों के बाद वे फरमाते हैं कि यह जीवन शैली पैग़म्बरे इस्लाम (स) की है । इस प्रकार से इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम यह बताना चाहते हैं कि केवल हम हैं जो पैग़म्बरे इस्लाम की जीवन शैली को फैलाते और उसे जीवित करते हैं , हालांकि शासकों ने पैगम्बरे इस्लाम की जीवन शैली को मिटाने की बेहद कोशिश की लेकिन उनके वास्तविक उत्तराधिकारियों के संघर्ष से पैग़म्बरे इस्लाम (स) की जीवन शैली आज तक सुरक्षित है। पैगम्बरे इस्लाम की जीवन शैली को पूरी तरह से इतिहास और लोगों के मन मस्तिष्क से मिटाने की प्रक्रिया बनी उमैया और बनी अब्बास शासकों के काल में पूरे चरम पर थी  और यही वजह थी कि उस काल में इस्लामी समाज का नेतृत्व एेसे लोगों के हाथों में रहा जिन का इस्लाम और पैगम्बरे इस्लाम की शिक्षाओं और उनकी जीवन शैली से कोई संबंध नहीं था। लेकिन इन कठिन हालात में भी पैगम्बरे इस्लाम के सच्चे उत्तराधिकारियों अर्थात इमामों ने संघर्ष नहीं छोड़ा और पैग़म्बरे इस्लाम के धर्म और उनकी शिक्षाओं से लोगों को अवगत कराते रहे यहां तक कि शासकों द्वारा उन्हें एक एक करके शहीद करा दिया गया।

 

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम एक अन्य स्थान पर फरमाते हैं कि ईश्वर ने हमें हर बुराई और गंदगी से दूर रखा है और हमें एेसी पवित्रता प्रदान की है जो हमारे अलावा किसी के पास नहीं है और जो भी इस  प्रकार का दावा करे तो वास्तव में वह झूठ बोलता है। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के इस कथन में कुछ बुनियादी तथ्यों  का वर्णन किया गया है। सब से पहले तो इस कथन में " इस्मत" अर्थात पवित्रता की बात की गयी है जो शिया समुदाय की धार्मिक आस्था का मूल स्तंभ है और उनके अनुसार समाज के मार्गदर्शक का हर प्रकार की बुराई से सुरक्षित रहना आवश्यक है और इस सुरक्षा व पवित्रका की गारंटी केवल ईश्वर ही ले सकता है इस लिए मार्गदर्शक का निर्धारण भी ईश्वर ही कर सकता है। इसके साथ ही इस कथन में इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने स्पष्ट कर दिया है कि पवित्रता, केवल " अहलेबैत" अर्थात पैगंम्बरे इस्लाम के विशेष परिजनों के लिए है और उनके अलावा जो भी इस प्रकार का दावा करता है वह वास्तव में झूठा है।

 

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने जिस प्रकार  से पैगम्बरे इस्लाम के विचारों और इस्लामी शिक्षाओं का प्रसार व प्रचार किया उसके परिणाम स्वरूप कई ऐसे लोग सामने आए जिन्होंने बाद में इस्लामी ज्ञान में बड़ा नाम कमाया। हम इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के कुछ इसी  प्रकार के शिष्यों पर चर्चा करेंगें।

 

अहमद बिन इस्हाक़ अशअरी इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के विशेष अनुयाई थे और कु़म नगर में उनकी बड़ी इज़्ज़त थी। उन्होंने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के पास उनके अनुयाइयों के सवालों को पहुंचाने और उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करने में अत्याधिक महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने वक्फ के संदर्भ में भी बहुत काम किया है और कहा जाता है कि उन्होंने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के आदेश से कु़म नगर में एक मस्जिद बनवायी जिसे आज इमाम हसन मस्जिद के नाम से ख्याति प्राप्त है। अहमद बिन इस्हाक ने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम से पहले उनके पिता इमाम मुहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम का समय भी देखा था और उनसे भी लाभान्वित हुए थे। अहमद बिन इस्हाक़ कहते हैं कि एक दिन मैं इमाम हसन अस्करी अलैहिस्लाम की सेवा में पहुंचा और उनसे निवेदन किया कि कुछ लिख दें ताकि मैं उनका की लिखावट देख सकूं ताकि जब भी उनकी तरफ से कोई संदेश मिले तो मैं लिखावट पहचान जाऊं। यह सुन कर इमाम हसन अस्करी ने कहा कि हे अहमद छोटे और बड़े अक्षर आंखों को अलग अलग दिखायी देते हैं इस लिए शक में न पड़ना। इसके बाद उन्होंने क़लम और दवात मंगवाई और लिखने लगे जब वह लिख रहे थे तो मैं ने सोचा कि मैं वह क़लम मांग लूंगा जिससे वह लिख रहे हैं। इमाम ने लिखने के बाद मुझे बात शुरु की और उसी दौरान कलम को कपड़े से साफ किया और मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा कि यह लोग अहमद , कलम तुम्हारा ।

 

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के एक अन्य शिष्य अबू हाशिम दाऊद बिन अलकासिम अलजाफरी  थे। वह पैगम्बरे इस्लाम के  चचेरे भाई की नस्ल से थे और अपने रिश्तेदारों में उनका विशेष स्थान था। उन्होंने नवें दसवें और ग्यारहवें इमाम के अलावा बारहवें इमाम का भी युग देखा था। बारहवें इमाम के संक्षिप्त अज्ञातवास के दौरान वह उनके प्रतिनिधि भी रहे। उन्होंने इन इमामों से शिक्षा प्राप्त की और केवल शिक्षा प्राप्ति पर ही संतोश नहीं किया बल्कि उन्होंने इस शिक्षा के प्रसार व प्रचार में अथक संघर्ष किया । इसके साथ ही वह साहित्या से भी बेहद लगाव रखते थे यही वजह है कि उन्होंने पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के लिए बहुत सी कविताएं कही हैं ताकि इस प्रकार से भी समाज को इन महान हस्तियों के महत्व के बारे में अवगत कर सकें।

 

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के एक अन्य शिष्य जिन्होंने बारहवें इमाम का संक्षित अज्ञातवास भी देखा है, अब्दुल्लाह बिन जाफर बिन हिमयरी हैं जो तीसरी और चौथी हिजरी सदी से संबंध रखते थे। उनकी बेहद मूल्यवान रचनाएं हैं जिनसे इस्लामी धर्मगुरुओं ने बेहद लाभ उठाया है। उन्होंने इमामत के बारे में अत्याधिक महत्वपूर्ण समझी जाने वाली किताब " अद्दलायल" लिखी है जो सातवें सदी तक बुद्धिजीवियों के लिए उपलब्ध थी। उनकी एक अन्य प्रसिद्ध रचना " अलग़ैबा" है जो बारहवें इमाम , इमाम मेहदी अलैहिस्लाम के अज्ञात वास के बारे  में लिखा गयी है और प्रसिद्ध शिया धर्मगुरु शेख तूसी ने इसी नाम की किताब में हिमयरी से बहुत सी हदीसों का वर्णन किया है। खेद की बात यह है कि उनकी सभी रचनाओं में से केवल " क़ुरबुल इसनाद" नामक किताब ही बची है।

 

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के एक शिष्य का नाम अब उमर उस्मान बिन सईद उमरी थे। उन पर इमाम अली नक़ी और इमाम हसन अस्करी अलैहिमुस्सलाम को बहुत भरोसा था और वह बारहवें इमाम की सेवा में रहे। मात्रा ग्यारह वर्ष की आयु  में दसवें इमाम की सेवा में पहुचे थे और तीन इमामों की सेवा करते करते उन्होंने ज्ञान व शिक्षा के क्षेत्र में उच्च स्थान प्राप्त किया। तीनों इमामों ने उनसे संपर्क बनाने का काम लिया और वह इमाम और आम जनता के मध्य संदेश वाहक थे इसी लिए बारहवें इमाम के अज्ञातवास के दौरान वह अपने विशेष प्रतिनिधि बने। उन पर इमामों के भरोसे को इसी से समझा जा सकता है कि इमाम हसन अस्करी के काल में जब भी कोई उनसे कोई सवाल पूछता तो वह कहते कि यह सवाल जाकर  उस्मान बिन सईद से पूछो और दोनों इमामों ने कहा कि वह हमारे लिए भरोसे मंद हैं। जो भी वह कहते हैं वह मेरी बात होती है।

 

अब्बासी शासक इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की हर गतिविधि पर  कड़ी नज़र रखते थे और उन्हें सदैव इस बात की चिंता लगी रहती थी कि समाज में और लोगों में उनके प्रति लोकप्रियता कहीं उनके लिए खतरा न पैदा कर कदे । इसी लिए अब्बासी शासक , मोतमिद ने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की हत्या की योजना बनायी और फिर एक साज़िश के तहत उन्हें चुपके से ज़हर दे दिया गया और इस तरह से उन्हें शहीद कर दिया। मोतमिद को यह भी डर सता रहा था कि कहीं उनके चाहने वाले विद्रोह न कर दें इसी लिए उसने आदेश दिया जिसकी वजह से इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के अंतिम संस्कार में सारी शाही अधिकारियों ने भाग लिया और शाही आदेश से इमाम हसन अस्करी के एक भाई को उनकी नमाज़ पढ़ाने का आदेश दिया जिनसे इमाम प्रसन्न नहीं थे किंतु अचानक ही इमाम हसन अस्करी के आठ वर्षीय बेटे इमाम महदी लोगों को आश्चर्यचकित करते हुए प्रकट हुए और उन्होंने अपने पिता की नमाज़ पढ़ाई और शुक्रवार के दिन आठ रबीउल अव्वल  सन 260 हिजरी क़मरी को इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को उनके घर में दफ्न कर दिया गया। (Q.A.)

 

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