अपनी देखभाल- 11
हमने आपको बताया कि अपनी देखभाल कामों के उस समूह को कहते हैं जो व्यक्ति अपने, अपने परिवार और अन्य लोगों के लिए करता है ताकि उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करे।
अपनी देखभाल के माध्यम से व्यक्ति स्वेच्छा से अपने लिए एक समय निर्धारित करता है ताकि कुछ ऐसे काम करे जिनसे उसकी ऊर्जा सुरक्षित रहे और उसमें वृद्धि हो।
जैसा कि पिछले कार्यक्रमों में बताया गया अपनी देखभाल के विभिन्न आयाम हैं जिनमें मानसिक, भावनात्मक, शारीरिक व आध्यात्मिक आयाम शामिल हैं। भावनात्मक देखभाल में, जो हमारी आज की चर्चा का विषय है, व्यक्ति की भावनात्मक आवश्यकताओं और भावानाओं को नियंत्रित व समस्याओं का सामना करने के लिए उसके संचालन की क्षमता पर ध्यान दिया जाता है। इंसान एक सामाजिक प्राणी है और दूसरों से दोस्ती और मेल-जोल उसके जीवन की आवश्यकताओं में शामिल है। अन्य लोगों से संपर्क के बिना मनुष्य की बहुत सी योग्यता निखरती नहीं हैं। दूसरों के साथ घनिष्ठ संपर्क और मेल-जोल की ज़रूरत, सामाजिक जीवन का एक जलवा होने के साथ ही, मनुष्य के अस्तित्व की गहराई से निकलने वाली आवाज़ भी है। कोई भी मनुष्य दोस्तों से नाता तोड़ कर और अलग-थलग रह का शांति प्राप्त नहीं कर सकता। इसी लिए अधिकतर लोग अपने लिए कोई न कोई मित्र तलाश करते हैं ताकि वह सुख-दुख और भौतिक व आत्मिक समस्याओं के दौरान उनकी मदद करे।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर व अध्ययनकर्ता रॉबर्ट डेविड पटनेम, जिन्होंने सुख से ज़िंदगी बिताने के विभिन्न मार्गों और एक सुखी समाज के कारकों पर शोध किया है, कहते हैं कि मज़बूत सामाजिक व पारिवारिक संबंध, मनुष्य के भावानात्मक स्वास्थ्य और सुख के कारणों में से हैं। उनके अनुसार मनुष्य की रचना प्राकृतिक रूप से सामाजिक प्राणी के रूप में हुई और दूसरों की मदद की भावना उसके अस्तित्व में शामिल है।
अपनी मदद आपके महत्वपूर्ण कारकों में से एक दूसरों से मेल-जोल है। परस्पर सम्मान व प्रेम, मेल-जोल का सबसे मूल सिद्धांत है। दूसरों का सम्मान करने और उनके व्यक्तित्व को स्वीकार करने का अर्थ होता है उनके बारे में अच्छा सोचना और उनको मूल्यवान मानना। हर कोई अपनी छोटी सी दुनिया में यह चाहता है कि उसे महत्व दिया जाए। वह चाहता है कि उसके वास्तविक मूल्य को समझा जाए और वह अपने आस-पास वालों से अपनी पुष्टि का इच्छुक रहता है।
दूसरों में जो अच्छाइयां और क्षमताएं हैं उनकी सराहना और दिल से उत्साहवर्धन, इस अच्छी भवना को मज़बूत बनाने का एक उत्तम मार्ग है। इस आवश्यकता पर ध्यान अगर अतिशयोक्ति की सीमा और ग़लत प्रभाव का कारण न हो तो लोगों के व्यवहार में परिवर्तन बल्कि उनमें काम के लिए प्रेरणा पैदा होने का अहम कारक है। अलबत्ता उत्साहवर्धन व सराहना में इस प्रकार के शब्दों व तरीक़ों का प्रयोग करना चाहिए कि जिनसे व्यक्ति के भीतर शौक़ और उत्साह बढ़े और यह आंतरिक प्रेरक उसे बाहरी प्रयास के लिए प्रेरित करे। इसी के साथ काम और सराहना के अनुपात पर अवश्यक ध्यान देना चाहिए ताकि वांछित प्रभाव सामने आए। इस अनुपात के बिना या तो अतिशयोक्ति हो जाएगी या कमी रह जाएगी और ये दोनों ही हानिकारक हैं।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस संबंध में कहते हैं कि योग्यता की हद से अधिक सराहना, चापलूसी है और योग्यता से कम तारीफ़, अक्षमता या ईर्ष्या है। अगर हज़रत अली के इस कथन पर ध्यान दिया जाए तो यह वास्तविकता अच्छी तरह स्पष्ट हो जाएगी कि हर मनुष्य को उसके द्वारा किए गए अच्छे काम पर दूसरों की ओर से सराहना की आशा होती है क्योंकि इससे उसका उत्साहवर्धन होता है और वह आगे भी उस प्रकार के काम करने के लिए प्रेरित होता है। अलबत्ता अगर यह सराहना, हद से अधिक हो तो व्यक्ति घमंडी भी हो सकता है, जबकि दूसरों को इससे यह भी लग सकता है कि उस व्यक्ति की चापलूसी की जा रही है जो कि बहुत ही निंदनीय है। इसके विपरीत उस व्यक्ति ने जिस प्रकार का काम किया है उस पर अगर उसकी प्रशंसा न की जाए या उस काम के अनुपात में उसकी कम प्रशंसा की जाए तो इसका यही अर्थ होगा कि हम उससे जल रहे हैं और यह भी किसी तरह से उचित नहीं है।
दूसरों के साथ अच्छी तरह से रहने और भले व्यवहार के लिए समय ख़र्च करने, त्याग और बलिदान की ज़रूरत होती है। लोगों के साथ अच्छे संबंध और संपर्क के लिए कष्ट उठाने पड़ते हैं क्योंकि यह कला समय ख़र्च किए बिना, चिंतन किए बिना और त्याग व बलिदान के बिना हाथ नहीं आती। उदाहरण स्वरूप आपके जीवन में जिन दोस्तों व लोगों का सकारात्मक प्रभाव है, उनके जन्म दिवस के बारे में आपको किसी तरह से पता चल जाता है और आप उस तारीख़ को याद कर लेते हैं। जैसे ही वह दिन आता है आप उन्हें बधाई देते हैं। ध्यान दीजिए कि इससे उनके अंदर कितनी अच्छी भावना पैदा होती है। आप अपने इस काम से, चाहे उन्हें कोई तोहफ़ा न दें तब भी, उन्हें यह समझा देते हैं कि वे आपके लिए अहम हैं। अच्छे मेल-जोल की आपकी यह भावना दोनों पक्षों की भावानात्मक आवश्यकताओं की सकारात्मक ढंग से पूर्ति करती है।
मेल-जोल में भावनाओं का बहुत अधिक ध्यान रखा जाना चाहिए। कभी कभी लोग कुछ बुरे काम करते हैं लेकिन न केवल यह कि उन्हें बुरा नहीं समझते बल्कि कभी कभी तो उन्हें मूल्यवान भी मानते हैं। जो व्यक्ति इस प्रकार के लोगों के साथ मेल-जोल रखता है और उन पर आपत्ति करना चाहता है उसे इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि केवल नर्मी और स्नेह से ही उनका ध्यान उनकी ग़लतियों की ओर आकृष्ट किया जा सकता है।
जब किसी पर सीधे आपत्ति की जाती है तो उसके व्यक्ति, बुद्धि और अभिमान पर सीधे चोट लगती है और अगर किसी को यह आभास हो जाए कि उसका अपमान हुआ है तो फिर वह दूसरे पक्ष की बात स्वीकार नहीं करता। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि हर किसी की दृष्टि में उसका विचार और उसकी आस्था सही होती है और इस विचार को बदलवाने के लिए विशेष कला की ज़रूरत है। इस आधार पर जब आप अपने मेल-जोल वाले किसी व्यक्ति की राय बदलना चाहें तो यह बात उससे इस प्रकार कहिए कि उसे लगे कि यह आपका नहीं बल्कि स्वयं उसी का विचार है या इस प्रकार उससे कहिए कि यह बात भी ध्यान व समीक्षा योग्य है।
अंत में हम यह कहना चाहते हैं कि अगर आप भावनात्मक स्वास्थ्य के मार्ग पर क़दम बढ़ाना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि हमें देख कर दूसरों को भी अच्छा महसूस हो तो पहले हमें उन्हें देख कर ख़ुश होना चाहिए और उनके साथ अच्छा समय बिताना चाहिए। तो श्रोताओ इसी के साथ कार्यक्रम अपनी देखभाल की यह कड़ी यहीं पर समाप्त होती है, अगली कड़ी में भी हम संबंध में अपनी चर्चा जारी रखेंगे, सुनना न भूलिएगा। (HN)