Mar ०२, २०१९ १४:०० Asia/Kolkata

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके परिजनों के कथनों में ईमान वाले व सद्कर्मी लोगों की पहचान के लिए कुछ मानदंड पेश किए गए हैं।

उदाहरण स्वरूप एक हदीस में कहा गया है लोगों के अधिक नमाज़ और रोज़े को न देखो अर्थात इसे मोमिन व सद्कर्मी लोगों के निर्धारण का पूर्ण मापदंड न बनाओं क्योंकि नमाज़-रोज़ा एकमात्र मापदंड नहीं है। यह भी नहीं है कि ये मापदंड नहीं हैं बल्कि किसी मोमिन व्यक्ति को पहचानने क लिए ये संपूर्ण मापदंड नहीं हैं। इस आधार पर हदीस में आगे चल कर संकेत किया जाता है कि अगर कोई अधिक नमाज़ पढ़ता है, अधिक रोज़े रखता है, हर साल हज करता है, अच्छे कर्म करता है, रातों को जाग कर उपासना करता है और दुआ मांगता है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह मोमिन और सद्कर्मी है। हदीस में कहा गया है कि मोमिन व्यक्ति की पहचान के लिए दो बातों पर ध्यान दो, एक सच्चाई और दूसरे अमानतदारी। ये दोनों सच्चे ईमान की निशानियां हैं। निश्चित रूप से इन दोनों मापदंडों के साथ मोमिन व्यक्ति नमाज़ व रोज़े जैसे अनिवार्य धार्मिक काम और भले कर्म भी करता है।

कभी कभी ईश्वर किसी जाति व समाज को अनुकंपा प्रदान करता है लेकिन वे उसके प्रति कृतज्ञ नहीं रहते। मान लीजिए कि ईश्वर ने एक देश व राष्ट्र को अत्यधिक धन, शक्ति व भौतिक एवं आध्यात्मिक संभावनाएं प्रदान की हैं लेकिन वह ईश्वर के इन उपहारों से सही ढंग से लाभ उठा कर और सही स्थान पर प्रयोग करके अपने सौभाग्य व कल्याण को सुनिश्चित बनाने के बजाए निश्चेतना में ग्रस्त हो कर अपव्यय करने लगता है जो कि कृतघ्नता है। इसके चलते वे अनुकंपाए उस राष्ट्र और समाज से न केवल यह कि छिन जाती हैं बल्कि उसके लिए मुसीबत भी बन जाती हैं क्योंकि यह अनुकंपाएं उसकी प्रगति का कारण बनने के बजाए उसकी निश्चेतना का कारण बना जाती हैं और उसमें रचनातमकता की योग्यता समाप्त हो जाती है। इसके ठीक विपरीत ईश्वर कभी किसी राष्ट्र को मुसीबत में ग्रस्त करता है। मान लीजिए कि किसी राष्ट्र को विध्वंसक भूकंप या युद्ध का सामना होता है लेकिन वह राष्ट्र संयम से काम लेता है। संयम का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य केवल हाथ पर हाथ धरे बैठा रहे और कोई काम न करे बल्कि संयम का अर्थ प्रतिरोध और डटे रहना है। इसका अर्थ यह है कि दुर्घटनाओं के मुक़ाबले में अपने भीतर पराजय की भावना न आने दे और निरंतर प्रयास करता रहे। इस प्रकार यही युद्ध व भूकंप उसके लिए अनुकंपा बना जाएगा। उदाहरण स्वरूप उस राष्ट्र के लोग एक दूसरे की मदद करने के बारे मे सोचेंगे, अपने घरों को भूकंप का सामना करने योग्य बनाने लगेंगे। इस आधार पर हमें ईश्वरीय अनुकंपा के प्रति भी और मुसीबत और कठिनाई के प्रति भी सही व्यवहार अपनाना चाहिए। (HN)