Apr ११, २०१६ ११:२७ Asia/Kolkata
  • ऐतिहासिक धरोहर

पिछले सप्ताह इस्लामी गणतंत्र ईरान की दो ऐतिहासिक धरोहरों को रूस के सेन्ट पीटर्ज़बर्ग नगर में युनेस्को की विश्व धरोहर समिति की 36वीं बैठक में पंजीकृत किया गया।

इन दोनों धरोहरों के नाम गुंबदे क़ाबूस और मस्जिदे जामे इस्फ़हान हैं। गुंबदे क़ाबूस एक मक़बरा है और मस्जिदे जामे इस्फ़हान, इस्फ़हान की सबसे पुरानी जामा मस्जिद है। इन दोनों धरोहरों के पंजीकरण के साथ ही विश्व धरोहर की सूचि में पंजीकृत होने वाली ईरानी धरोहरों की संख्या बढ़कर 15 हो गयी है।

युनेस्को की वेबसाइट ने इन धरोहरों के पंजीकरण के समाचार की पुष्टि के साथ ही इस्फ़हान की जामा मस्जिद का परिचय गत 12 शताब्दियों के दौरान मस्जिदों की वास्तुकला में परिवर्तन की चकित कर देने वाले चित्र के रूप में कराया है। इसी प्रकार इस्फ़हान की जामा मस्जिद के दो परतों वाले गुंबद को वास्तुकला में परिवर्तन व रचनात्मकता एक उदाहरण गिनवाया है।

इस्फ़हान की जामा मस्जिद या जुमा मस्जिद ईरान में सबसे पुरानी व महत्वपूर्ण धार्मिक इमारत है। पुरातत्विक खुदाई से प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार संभवतः यह मस्जिद इस्लाम से पूर्व इस्फ़हान नगर का एक महत्वपूर्ण धार्मिक केन्द्र रही है। इस मस्जिद के निर्माण से संबंधित महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि एक हज़ार वर्ष के दौरान इस मस्जिद के विभिन्न भाग अस्तित्व में आए और इस दौरान इनकी मरम्मत व पुनर्निर्माण होता रहा है।

अमरीकी पुरातत्वविद् आर्थर पोप इस मस्जिद को पहली बार देखने के पश्चात लिखता हैः जिस दिन मैं इस्फ़हान की जामा मस्जिद को देखने गया और उसके गुंबद के नीचे खड़ा हुआ तो मुझे ऐसा लग रहा था मानो मेरा पूरा अस्तित्व मस्जिद और गुंबद के नियंत्रण में है क्योंकि इस गुंबद के नीचे ईरानियों की रचनात्मकता से भरी तथा अमर रहने वाली कलाकृति को समझा जा सकता है और इसी प्रकार इस मस्जिद और उसके गुंबद की महानता पर विश्वास किया जा सकता है। उसके बाद से मैं बारंबार इस्फ़हान की जामा मस्जिद को देखने गया और इस मस्जिद को देख कर प्रशंसा के लिए मेरी ज़बान खुल गयी और इस्फ़हान एवं ईरान को देखने के लिए मेरे मन में रुचि बढ़ती गयी।

इस्फ़हान की जामा मस्जिद समय बीतने के साथ ईरान में सजावट कला और वास्तुकला शैली में हुए परिवर्तनों का संगम है। चार बरामदों वाला आंगन, रात की नमाज़ के लिए विशेष दालान, मुज़फ़्फ़री मदरसा, नेज़ामुल मुलम गुंबद, उलजायतू मेहराब, साहब, उस्ताद, शागिर्द और दरवीश के नाम से प्रसिद्ध चार बरामदे इस्फ़हान की जामा मस्जिद के महत्वूर्ण भाग हैं। इस मस्जिद के आठ प्रवेश द्वार हैं कि इनमें से हर एक मस्जिद के क्षेत्रफल को आसपास के भाग से जोड़ता है। इन प्रवेश द्वारों का एक ही समय में निर्माण नहीं हुआ है बल्कि हर एक द्वार इतिहास के किसी कालखंड में इमारत के भीतरी व बाहरी भाग से समन्वय के साथ अस्तित्व में आया है। मस्जिद के

चारों ओर गलियारे मौजूद हैं जो नगर की प्राचीन संरचना के साथ मस्जिद के व्यापक संपर्क को दर्शाते हैं। इस्फ़हान की जामा मस्जिद का नक़्शा चार बरामदों वाला है और यह विशेषता ईरानियों द्वारा मस्जिद की निर्माण शैली से विशेष है। बरामदों में मुक़र्नस का काम ईरानी वास्तुकला के एक बहुत ही आकर्षक आयाम को प्रदर्शित करता है। मस्जिद के भीतर आंगन और उस पर टाइलों का काम 15 वीं ईसवी शताब्दी का है किन्तु मस्जिद का गुंबद और उसके दक्षिणी बरामदे के खंबों का निर्माण पांचवी हिजरी क़मरी में हुआ है। सलजूक़ी शासन श्रंख्ला के शासक मलिकशाह के वज़ीर निज़ामुल मुल्क ने 1086 ईसवी को बहुत बड़े हाल के निर्माण का आदेश दिया था। यह हाल तीस मीटर चौड़ा और साठ मीटर लंबा है जिसके ऊपर एक बड़ा सा गुंबद है कि ज़मीन से गुंबद की ऊंचाई सौ मीटर है। यह गुंबद निज़ामुल मुल्क गुंबद के नाम से प्रसिद्ध है। नेज़ामुल मुल्क गुंबद पर की गयी सजावट तीनों शैलियों शिलालेख, ज्योमितीय चित्र और वनस्पति के चित्रों पर आधारित हैं।

विश्व में गच पलस्तर के काम का सबसे सुंदर मेहराब इस्फ़हान की जामा मस्जिद का मेहराब है जो विश्व में ईरानी कला के उत्कृष्ट नमून के रूप में प्रसिद्ध है। इस सुंदर मेहराब पर मंगोल क़बायली प्रमुख सुलतान मोहम्मद ख़ुदाबंदे का नाम लिखा हुआ है जो इस्लाम स्वीकार करने से पूर्व उलजायतू के नाम से प्रसिद्ध थे और मुसलमान होने के बाद उन्होंने अपना नाम ख़ुदा बंदे रखा। अलजायतू मेहराब कि जो दिखने में दोहरा ताक़ लगता है, गच पलस्तर के काम, सुल्स लीपि के अनेक शिलालेखों और कूफ़ी लीपि के एक लेख तथा बहुत से ज्यामितीय और वनस्पति के ललित चित्रों से सजा हुआ है। इस ऐतिहासिक इमारत का निर्माण वर्ष 1310 ईसवी में हुआ और इसके किनारे गच पलस्तर के काम के दक्ष कलाकार उस्ताद हैदर का नाम लिखा हुआ है।

इस्फ़हान की जामा मस्जिद का उत्तरी छोर पर स्थित गुंबद, ताजुल मुल्क गुंबद या ख़ाकी गुंबद के नाम प्रसिद्ध है। यह इमारत चौकोर सतह पर बनी है जिसकी ऊंचाई साठ मीटर है जो ज्यामितीय अनुपात तथा काम की बारीकी की दृष्टि से ईरानी वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूनों में से है। ज़मीन से गुंबद के नीचे तक सुंदर व बारीक कामों से सजे खंबों के साथ चौखटे, कोने और ताक़ की भांति आर्क बने हुए है जो एक दूसरे के आमने सामने व ज्यामितीय अनुपात में हैं। शिलालेख और विभिन्न ज्यामितीय चित्र ताजुल मुल्क गुंबद के सौंदर्य में चार चांद लगाते हैं।

यह गुंबद कोण तथा अपने संपूर्ण ढांचे की दृष्टि से मस्जिद की वास्तुकला में एक नई शैली समझा जाता है और इस गुंबद को नमूना बनाकर दूसरी मस्जिदों में इस प्रकार के गुंबद बनाए गए। यह रचनात्मक शैली ईरान की वास्तुकला क्षेत्र से आगे निकली और इसे अनातोली, क़ाहेरा और अलजीरिया में मस्जिदें बनाने में प्रयोग किया गया।

ऐतिहासिक नगर जुर्जान इस्लामी जगत के बड़े नगरों में गिना जाता था जो रय, मर्व, और जुन्दीशापूर की बराबरी करता था। यह नगर नगर निर्माण एवं वास्तुकला की दृष्टि से बहुत आगे था। पुरातात्विक खुदाई से यह तथ्य सामने आए हैं कि हज़ार वर्ष पूर्व इस नगर में सिवरेज सिस्टम, सचित्र ईंटों से बनी हुयी सड़कों तथा घरों तक पानी पहुचाने वाले तंत्र से संपन्न था। ये बातें इस नगर के सुनियोजित निर्माण का पता देते हैं। इस नगर में प्राप्त शीशे और मिट्टी के बर्तनों से पता चलता है कि यह नगर इस्लाम के बाद की शताब्दियों में शीशे और मिट्टी के बर्तनों के उद्योग का केन्द्र रहा है।

यद्यपि मंगोलों के आक्रमणों में जुर्जान नगर नष्ट हो गया किन्तु मौजूद खंडहर अभी भी इस नगर के वैभव का पता देते हैं और इस नगर की एकमात्र ऐतिहासिक इमारत गुंबदे क़ाबूस इसकी साक्षी है।

गुंबदे काऊस या गुंबदे क़ाबूस चौथी हिजरी क़मरी की इमारत है जो उत्तरी ईरान के गुंबद काऊस नगर में स्थित है।

गुंबद काबूस की ऊंचाई 70 मीटर है जो विश्व में मौजूद ईंट की सबसे ऊंची इमारत है। क़ाबूस की मीनार के शिलालेखों के अनुसार 1006 ईसवी में शम्सुल मआली नामक स्थानीय शासक ने इसका निर्माण कराया और इसके निर्माण में पांच वर्ष का समय लगा। शंकुआकार मीनार की ऊंचाई 37 मीटर और इसके शंकुआबार गुंबद की ऊंचाई 18 मीटर है और यदि इसकी ऊंचाई में उस 15 मीटर के कृत्रिम टीले की ऊंचाई को भी जोड़ दे जिसके ऊपर यह बना है तो इसकी ज़मीन से ऊपर तक कुल ऊंचाई सत्तर मीटर है।

गुंबद क़ाबूस के बाहरी भाग पर पंद्रह दनदाने समानांतर दूरी पर बने हुए हैं। इमारत के नीचे से गुंबर की छत बने हुए ये दन्दाने नब्बे अंश के हैं। इसका गुंबद दो परत का है। गुबद का भीतरी भाग 18 मीटर तक सामान्य ईट से बना है कि जिसके पूर्वी भाग में एक रौशनदान भै है। यह गुंबद मिट्टी के गुंबदों की भांति अर्धगोलाकार है।

इस इमारत ताक़ के भीतरी भाग को मुक़र्नस के काम से सजाया गया है जो अपनी परम सादगी व सुंदरता के साथ इस्लामी काल की इमारतों में इस प्रकार की सजावट का पहला नमूना समझी जाती है। गुंबदे क़ाबूस का ढांचा एक बेल्ट की भांति कूफ़ी लीपि में शिलालेख से सुशोभित है कि जिसकी एक लाईन इस बेलानाकार इमारत के ऊपरी और एक लाइन निचले भाग की शोभा बढ़ा रही है।

इस इमारत का मसाला गारा और ईंट है। वातावरण के कारण इसकी पकी हुई लाल ईंट तांबे के रंग की दिखती है। इस इमारत के निर्माण के समय संभावनाओं के अभाव में लकड़ी के फाड़ के स्थान पर मिट्टी को घुमावदार रूप इकट्ठा कर सीढ़ी के स्थान पर प्रयोग किया गया। इमारत के पूरा होने के बाद मिट्टी को आस पास फेक दिया गया जो टीले के रूप में मौजूद है।

इस इमारत के शिलालेख के अनुसार इसके निर्माण का उद्देश्य मक़बरे का निर्माण था। जैसा कि आर्थर पोप इस इमारत के बारे में लिखते हैं अलबुर्ज़ पर्वत श्रंख्ला के पूरब और एशिया के विशाल मरुस्थल के समानांतर ईरानी वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने में से एक अपने वैभव के साथ खड़ी है। इस इमारत का नाम गुंबदे क़ाबूस है जो क़ाबूस बिन वश्मगीर का मक़बरा है। एक ऐसा वैभवशाली मक़बरा जो हर प्रकार की सजावट से ख़ाली है।