Apr ११, २०१६ ११:३२ Asia/Kolkata
  • मिस्र में नया खेल

मिस्री तानाशाह हुस्नी मुबारक के शासन के पतन को 15 महीनों से अधिक का समय हो रहा है

मिस्री तानाशाह हुस्नी मुबारक के शासन के पतन को 15 महीनों से अधिक का समय हो रहा है, जनता ने राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे चरण में इस्लामवादी प्रत्याशी मुहम्मद मुर्सी को अपना मूल्यवान मत देकर अपनी क्रांति की उपलब्धियों की रक्षा में एक अन्य बड़ा क़दम उठाया है। राष्ट्रपति पद के लिए इख़वानुल मुसलेमीन के प्रत्याशी मुहम्मद मुर्सी के चुने जाने से एक बार फिर पश्चिम के समीकरण बिगड़ गये जिन्होंने क्षेत्र की क्रांति को अरब बसंत के नाम से याद किया और यह सिद्ध कर दिया कि ट्यूनीशिया, मिस्र या बहरैन की जनक्रांतियों की केवल इस्लामी जागरुकता की परिधि में ही परिभाषा की जानी चाहिए। मुबारक शासन के सक्रिय तत्व के रूप में अहमद शफ़ीक़ का ठुकरा दिया जाना, इस बात का चिन्ह है कि मिस्री राष्ट्र इस समय केवल अपनी क्रांति को परिणाम तक पहुंचाने और उसको परिपूर्ण करने के बारे में ही सोच रहा है और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग में बड़ी ही सूझबूझ और होशियारी से क़दम उठा रहा है। पिछले दिनों मिस्र में राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए भारी उठा पटख़ हुई। इन परिवर्तनों को बयान करने के लिए विभिन्न शब्दावलियों का प्रयोग किया गया। दूसरी क्रांति, सैन्य विद्रोह, सैनिकों के साथ इख़वानुल मुसलेमीन की सांठगांठ, क्रांति से जनता की निराशा, चुनाव में धांधली, पिछले शासन के लोगों की वापसी, पिछले शासन की ओर जनता का रूझहान और क्रांतिकारियों के प्रति हतोत्साहित होना आदि वह शब्दावलियां थीं जिनका प्रयोग चुनाव के बाद किया गया। चुनाव परिणाम घोषित होने और समय गुज़रने के साथ यह पता चल गया कि प्रयोग होने वाली अधिकतर शब्दावलियां, मिस्री समाज की गहन पहचान न रखने और स्थिति की समीक्षा करने में जल्दबाज़ी से उत्पन्न हुई हैं। वर्तमान काल में क्षेत्रीय समीकरणों में मिस्र की सदैव महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इस देश को अरब जगत का हृदय कहा जाता है। ऐसा देश जो सदैव इस्लामी और अरब जगत में बहुत से सामाजिक, वैचारिक और राजनीति आंदोलनों का प्रेरणा स्रोत रहा है और लोगों की दृष्टि को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल रहा है। एक वर्ष कुछ महीने पूर्व आने वाले परिवर्तन और हालिया दिनों में मुहम्मद मुर्सी की विजय के रूप में सामने आने वाले परिवर्तन ने सिद्ध कर दिया कि यह ऐसी कोई घटना नहीं है कि इसके किनारे से साधारण रूप से गुज़र जाया जाए और क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय समीकरणों पर इसके प्रभाव अनदेखे कर दिए जाएं। नवीन मिस्र जो अपनी कार्यपालिका के प्रमुख के रूप में इख़वानुल मुसलेमीन के प्रत्याशी को देख रहा है, वर्तमान इस्लामी आंदोलनों के सामने आने के बावजूद, मिस्र में इस्लामवादी शक्तियां चाहे वह बादशाही काल में हों या अजीवन राष्ट्रपति काल में सदैव ही दमन का शिकार रही हैं। पश्चिम ने भी पिछले चालीस वर्षों में मिस्र के इस्लामवादी आंदोलनों को क्षेत्रीय व्यवस्था के विरुद्ध ख़तरे के रूप में देखा है और उत्तरी अफ़्रीक़ा में इस धड़े के सुव्यवस्थित दमन और इस प्रकार की कई अन्य कार्यवाहियों पर मौन धारण किए रखा है। इस वातावरण में प्रश्न यह उठता है कि मिस्र में मुर्सी के सत्ता में पहुंचने से वैश्विक व क्षेत्रीय स्तर पर नये मिस्र से क्या अपेक्षा की जा सकती है?

मिस्री समाज में मुहम्मद मुर्सी का नाम जाना पहचाना है। उन्होंने विश्वविद्यालय की उच्च शिक्षा प्राप्त की है। इसी के साथ जनता और विश्वविद्यालय के स्तर पर उनकी पकड़ बहुत ही मज़बूत है। जनता उन्हें राजनीति में संतुलित व्यक्ति मानती है। क्या मुहम्मद मुर्सी अपनी इस संतुलित शैली के साथ मिस्री जनता की क्रांति को सुदृढ़ करने की दिशा में आने वाली बाधाओं को पार कर सकेंगे? मिस्र के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के सामने आने वाली महत्त्वपूर्ण चुनौतियों में एक सेना और हुस्नी मुबारक के पिट्ठु हैं जो यथावत मिस्र की सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाए बैठे हुए हैं।

अमरीका के कैंट स्टेट विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर और “किस प्रकार हुस्नी मुबारक सत्ता में पहुंचा” नामक पुस्तक के लेखक ज्यूश स्टैचे का कहना है कि वास्तव में मिस्र में सत्ता जिन लोगों के हाथों में है वह हुस्नी मुबारक के लोग हैं और वे सरलता से इख़वानुल मुसलेमीन को कार्य करने की अनुमति नहीं देंगे। इख़वानुल मुसलेमीन और मिस्र की धर्मविरोधी सेना, सत्ता के ऐसे भागीदार हैं जो एक दूसरे को बिल्कुल पसंद नहीं करते और परस्पर विरोधाभासी विचारधारा के स्वामी होने के साथ साथ मिस्र के भविष्य के संबंध में भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस रिपोर्ट में आया है कि ऐसा लगता है कि मुहम्मद मुर्सी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पिछले शासन के अधिकारियों और इसी प्रकार सेना को अपना अनुसरणकर्ता बनाना है। मिस्र में सबसे शक्तिशाली न्यायालय सेना का समर्थक है। देश के संविधान के उच्च न्यायालय ने दूसरे चरण के चुनाव से पहले यह घोषणा की थी कि मिस्र की संसद जो इख़वानुल मुसलेमीन के नियंत्रण में है, ग़ैर क़ानूनी है और इसे भंग किया जाना चाहिए। सेना भी इख़वानुल मुसलेमीन के लिए स्थितियां कड़ी करने के परिप्रेक्ष्य में सरकारी संस्थाओं पर दबाव डालने के लिए अपने प्रभाव से लाभ उठा सकती है। उदाहरण स्वरूप, इस बात की बहुत आशा है कि सेना, ईंधन और पेट्रोकेमिल जैसी महत्त्वपूर्ण वस्तुओं के वितरण नेटवर्क में बाधाएं उत्पन्न करे ताकि इख़वानुल मुसलेमीन को राजनैतिक हर्जाना अदा करना पड़े। कुछ अन्य लोगों का यह मानना है कि मुहम्मद मुर्सी की सरकार के सामने आने वाली महत्त्वपूर्ण चुनौतियों में से एक पुलिस प्रमुखों की ओर से उत्पन्न समस्याएं हैं। मिस्र की आंतरिक सुरक्षा पर नियंत्रण रखने वाले पुलिस अधिकारी, हुस्नी मुबारक़ के शासन काल में इस सरकार के मज़बूत पंजे समझे जाते थे। शक्तिशाली पुलिस अफ़सरों में पैदल सेना की सेना कमान, दंगा निरोधक बल और इसी प्रकार शक्तिशाली गुप्त सूचना तंत्र शामिल होते हैं और कई दश्कों से ग़ैर क़ानूनी गिरफ़्तारियों और विपक्ष के विरुद्ध जासूसी कार्यवाहियों में लिप्त रहे हैं। यदि मुहम्मद मुर्सी यह प्रयास करें कि गृहमंत्रालय को हुस्नी मुबारक के पिट्ठुओं से साफ़ कर दें जैसा कि उन्होंने वचन दिया था, तो पूरे विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि उन्हें कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। हुस्नी मुबारक के पिट्ठु और सेना, मिस्री समाज के हर क्षेत्र में अपने हितों और स्थानों की रक्षा करने के लिए मुहम्मद मुर्सी के मार्ग में रोड़े अटकाना जारी रखेगी और इसी रोड़े अटकाए जाने के कारण मुहम्मद मुर्सी और इख़वानुल मुसलेमीन के सामाजिक स्थान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    जब भी मिस्र में इस्लामवादियों के सत्ता में पहुंचने की बात होती है तो इस देश के ज़ायोनी शासन के साथ भविष्य के संबंध के बारे में मन में प्रश्न उठने लगते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अवैध इस्राईली शासन के साथ टकराव या झड़प, इख़वानुल मुसलेमीन या राष्ट्रपति की कार्यसूचि में शामिल नहीं है। इख़वानुल मुसलेमीन ने अपनी 80 वर्षीय गतिविधियों से यह सिद्ध कर दिया कि वह सिद्धांतों पर चलने वाले नहीं हैं। उनसे यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वे निकट भविष्य में ज़ायोनी शासन के मुक़ाबले में शत्रुतापूर्ण नीतियां अपनाएंगे। अभी तक इस आंदोलन के नेताओं से कैंप डेविड समझौते को समाप्त किए जाने के बारे में किसी प्रकार की बात नहीं सुनी गयी, यद्यपि इस समझौते में परिवर्तन के बारे में बहुत से वचन दिए जा चुके हैं। उन रूकावटों के दृष्टिगत जो मुहम्मद मुर्सी की विजय की घोषणा के बाद सेना के रास्ते में खड़ी करेगी, इख़वानुल मुसलेमीन आरंभ में अपनी आंतरिक स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास करेगी। अमरीका के संबंध में इख़वानुल मुसलेमीन की नीति इसी परिधि में होगी। वे प्रयास करेंगे कि अमरीका के साथ तनाव पूर्ण संबंध न रहें। इसीलिए वे ऐसी नीति नहीं अपनाएंगे जो क़ाहिरा-वाशिंग्टन के संबंधों को तनावग्रस्त करने का कारण बने। राष्ट्रपति चुनाव में विजयी होने के बाद इख़वानुल मुसलेमीन अधिक से अधिक यह नीति अपनाएगी कि वह अमरीका की क्षेत्रीय नीतियों में उसका साथ न दे। इख़वानुल मुसलेमीन की नीति निर्धारण के अनुभव से यह पता चलता है कि यह गुट मिस्र को पश्चिमी घटक की परिधि से निकालने और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने का सदैव इच्छुक रहा है। इस वातावरण में इस बात की अपेक्षा स्वभाविक सी बात थी कि मुहम्मद मुर्सी और विदेश नीति निर्धारण करने वाली उनकी टीम को क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिस्र की स्वतंत्र नीति को सुदृढ़ बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। अलबत्ता मिस्र के इस्लावादी नेता इस बिन्दु से अवगत हैं कि अमरीका और कुछ पश्चिमी देशों के अब भी मिस्र में प्रभावी मोहरे मौजूद हैं। इस स्थिति में इस बात की संभावना है कि स्वतंत्र विदेश नीति और अमरीका व पश्चिम के साथ प्रभावी संबंधों की रक्षा के मध्य संतुलन बनाने के लिए इस्लामवादी धड़े प्रयास करेंगे। प्रत्येक दशा में इस बात की अनदेखी नहीं करना चाहिए कि मिस्र की क्रांतिकारी जनता में, जिन्होंने मुहम्मद मुर्सी को राष्ट्रपति की गद्दी तक पहुंचाया, अमरीका और ज़ायोनी शासन विरोधी भावनाएं बहुत अधिक पायी जाती हैं और उन्हें अपने नये राष्ट्रपति से अतीत के शासन के तत्वों को हटाने और आंतरिक सुधार की दिशा में कार्यवाही करने जैसी बहुत सी आशाएं बांध रखी हैं।