Apr ११, २०१६ ११:३३ Asia/Kolkata
  • कोमल फ़ौलाद

इस्लामी चेतना वह विस्तृत और महा क्रांति है जो विभिन्न देशों में दो शताब्दी पूर्व से अधिक समय से आरंभ हुई है।

 इसी बीच इस्लामी समाज की आधी जनसंख्या के रूप में मुसलमान महिलाओं ने इस विशुद्ध व असली क्रांति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशेषकर ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता और उसके बाद की घटनाओं में ईरानी महिलाओं की प्रभावी भूमिका पूर्ण रूप से ध्यान योग्य रही है। क्षेत्रीय देशों विशेषकर मिस्र, लीबिया, बहरैन, ट्यूनीशिया और यमन जैसे देशों में महिलाओं ने इस्लाम के आरंभ की मुसलमान महिलाओं का अनुसरण करते हुए तथा इस्लामी चेतना में ईरानी महिलाओं को आदर्श मानते हुए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी परिधि में इस्लामी चेतना में महिलाओं की भूमिका को महत्त्व देने के लिए हालिया दिनों में तेहरान में महिला और इस्लामी चेतना शीर्षक के अंतर्गत एक काफ़्रेंस का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन में 80 इस्लामी देशों की राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय व प्रतिभाशाली 1200 से अधिक महिलाओं ने भाग लिया। यह सम्मेलन 10 और 11 जुलाई को हुआ था। इस सम्मेलन में इस्लामी चेतना के हालिया परिवर्तनों, चुनौतियों और उसके भविष्य तथा इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका और उनके स्थान के बारे विचार विमर्श हुआ।

राष्ट्रपति डाक्टर महमूद अहमदी नेजाद ने इस सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में यह बयान करते हुए कि विश्व में परिवर्तन की शर्त, इस्लामी चेतना है, कहा कि इस्लामी जागरूकता व क्षेत्र के सामाजिक परिवर्तनों में महिलाओं की भूमिका, पुरुषों से अधिक प्रभावी है और एक समाज में महिलाओं की चेतना, उस समाज के सभी सदस्यों की चेतना का कारण बनेगा।

डाक्टर महमूद अहमदी नेजाद ने महिला को सुन्दरता, ईश्वरीय प्रेम व दया का नमूना बताया जिसका हृदय प्रेम, दया और मानवता के जारी होने का केन्द्र है। वे इस बारे में कहते हैं कि शैतान जब भी किसी समाज को डुबाना चाहता है तो पहले उस समाज से महिलाओं की भूमिका को समाप्त कर देता है और समाज में उनकी उपस्थिति को कुचल देता है। उन्होंने मुसलमान महिलाओं की ज़िम्मेदारियों को बहुत भारी और महत्त्वपूर्ण बताया और कहा कि ऐसा न हो कि हम इस ज़िम्मेदारी को जातीय, भौगोलिक और भाषाओं की सीमा तक सीमित कर दें और हमारी नज़रें केवल हमारे देश की सीमाओं तक हों।

वर्तमान समय में अब पश्चिम सैनिक मार्गों से नहीं बल्कि अपने प्रचार माध्यम और सांस्कृतिक कूटनीति द्वारा इस्लामी जगत में बाधाएं उत्पन्न करने और इस्लामी चेतना की ज्वाला को बुझाने की चेष्टा में है। ईरानी समाज शास्त्री डाक्टर शहला बाक़ेरी ने इस सम्मेलन में भाषण देते हुए इस संबंध में कहा कि अमरीकी जिन देशों को निशाना बनाना चाहते हैं उनमें विभिन्न उपायों द्वारा इस्लामी जगत के आधुनिकीकरण के नारे और इस्लामी देशों में पश्चिमी संस्कृति को निर्यात करने के लिए इस्लामी देशों के वैचारिक सिद्धांत में सेंध लगाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम, इस्लामी देशों में अपनी संस्कृति के स्थानीयकरण के प्रयास में है और फ़िल्मों का निर्माण करके ईरान, पाकिस्तान और अरब जगत में अंधविश्वास व भ्रांति फैलाने की चेष्टा में है।

लीबिया की श्रीमती विजदान मीलाद ने भी तेहरान सम्मेलन में देशों के सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए संचार माध्यमों का प्रयोग करने के पश्चिमी देशों के प्रयासों के बारे में बताया और पश्चिमी संचार माध्यमों के प्रभावों पर बल देते हुए कहा कि विदेशी संचार माध्यम, मनोविज्ञान का दुरुपयोग करके तथा परोक्ष या अपरोक्ष ढंग से विभिन्न शैलियों से लाभ उठाकर जनमत को अपने हित में परिवर्तित करने के प्रयास में है। उन्होंने इस बात की ओर संकेत करते हुए कि परिवार, धर्म, स्कूल और इससे संबंधित मंत्रालय, सामाजिक संस्थाएं हैं, कहा कि टेलीवीजन के अनुचित कार्यक्रम, युवाओं में अनुचित विचारधारा और पहचान के पैदा होने और उनको अपने मूल्यों की रक्षा से रोकने का कारण बनते हैं।

इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति की सफलता, विश्व में मुसलमान महिलाओं के लिए बेहतरीन आदर्श के रूप में सामने आई। लेबनान, अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ जैसे विभिन्न देशों की बहुत सी प्रतिभाशाली व विचारक महिलाओं ने इस कांफ़्रेंस में इस्लामी जागरूकता में महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए ईरान के इस्लामी आदर्श के दृष्टिकोण के बारे में विचार विमर्श किया। लेबनान की अंग्रेज़ी भाषा की लेक्चरर श्रीमती वफ़ा ने इमाम ख़ुमैनी से अपने लगाव को बयान करते हुए कहा कि मैं इमाम ख़ुमैनी और उनकी शिक्षाओं की प्रेमी हूं क्योंकि जब मैं सांसारिक मायामोह में ग्रस्त थी तो उनके भाषणों ने मुझे स्वतंत्र किया और मुझे पिघलाकर अपने में अवशोषित कर लिया जैसा कि वह स्वयं इस्लाम में घुल गये थे। पहली बार ईरान आने वाली श्रीमती वफ़ा का कहना था कि इमाम ख़ुमैनी की स्पष्ट विशेषताएं जिनसे मैं प्रभावित हुई, ईश्वर पर उनका भरोसा और इस भरोसे के प्रभाव में उनकी शांति थी जिसके कारण ईरान की क्रांति सफल हुई और आज भी अन्य क्रांतियां इसी शांति की पैदावार हैं।

मुसलमान महिलाओं ने पुरुषों के साथ साथ कठिन परिस्थितियों में भी इस्लामी चेतना में अपनी प्रभावी भूमिका निभाई। इस सम्मेलन में भाग लेने वाली महिलाओं में से एक अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन की जेल में तीन वर्षों तक बंद रहने वाली फ़िलिस्तीन की संघर्षकर्ता हना शलबी भी थीं। वह हालिया दिनों में 44 दिनों की भूख हड़ताल के बाद ज़ायोनी जेल से स्वतंत्र हुईं। श्रीमती शलबी ने इस्लामी चेतना में महिलाओं की भूमिका को एक मूल भूमिका बताया और कहा कि हम इस बात के साक्षी हैं कि महिलाओं ने इस्लामी समाज के समक्ष, संघर्ष के मार्ग में बंदी, शहीद और घायल प्रस्तुत किए हैं। आज हम देखते हैं कि फ़िलिस्तीन की साहसी महिलाएं ज़ायोनी जेलों में किस प्रकार अपने संघर्षकर्ता भाइयों के साथ ज़ायोनी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रही हैं।

इस्लामी चेतना के प्रकट होने के कारकों में से एक विदेशियों का वर्चस्व और इस्लामी मूल्यों व सिद्धांतों से उनका संघर्ष है। ट्यूनीशिया से इस सम्मेलन में भाग लेने आई श्रीमती लतीफ़ा अलहवाशी का कहना है कि ट्यूनीशिया सदैव से साम्राज्यवादियों के नियंत्रण में रहा है और साम्राज्यवादी इस देश में इस्लामी जड़ों को सुखा देने के प्रयास में थे किन्तु ईरान की इस्लामी क्रांति, ट्यूनीशिया में इस्लाम के सुदृढ़ होने का कारण बनी है। उन्होंने समाज में ईरानी महिलाओं की मूल्यवान भूमिका के बारे में कहा कि मैंने बारम्बार ईरान की यात्रा की है और इस देश की महिलाओं को निकट से देखा है जो हर क्षेत्र में अग्रणी हैं और मैं इसे ईरान में इस्लामी सरकार का ऋणी मानती हूं। मेरा दिल चाहता है कि जो लोग ईरान के विरुद्ध बातें करते हैं उनसे कहूं कि वे ईरान आकर सभी चीज़ों को निकट से देखें। श्रीमती अलहवाशी इसी प्रकार कहती हैं कि इस प्रकार की बैठकें, इस्लामी जगत की महिलाओं के मध्य प्रेम, मित्रता और एकता उत्पन्न होने और उनके बीच सूचनाओं के आदान प्रदान का कारण बनती हैं।

महिलाओं की प्रभावी भूमिकाओं में से एक पत्नी और मां की भूमिका है। तेहरान सम्मेलन में इस्लामी चेतना में महिलाओं और माताओं की भूमिका के बारे में भी चर्चा हुई। माली की श्रीमती मरियम हाएगा ने पारिवारिक इकाई में महिलाओं की भूमिका और मातृत्व की भूमिका के संबंध में इमाम ख़ुमैनी के बयानों को स्पष्ट किया और कहा कि इस्लामी जागरूकता में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका, कल के समाज के लिए अच्छी पीढ़ी का प्रशिक्षण है। इस शोधकर्ता महिला ने इस्लाम धर्म को सहयोग और सहकारिता का धर्म बताया और कहा कि जब कोई महिला अपनी संतान का सही ढंग से और सही आधारों पर प्रशिक्षण करती है तो इस्लाम का दृष्टिगत लक्ष्य व्यवहारिक होता है। उन्होंने समाज की मुसलमान महिलाओं से मांग की कि वे हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के आचरण का अनुसरण करते हुए पवित्रता से सुसज्जित हों और मुसलमान महिलाओं के अध्यात्मिक स्थान की रक्षा करें।

तेहरान में महिला और इस्लामी जागरूकता सम्मेलन के दौरान भाग लेने वाली महिलाएं विभिन्न वैज्ञानिक व सांस्कृतिक क्षेत्रों में ईरानी महिलाओं की उपलब्धियों से परिचित हुईं । जार्डन की पत्रकार बादेआ ज़रीक़ात ने इस्लामी क्रांति के बाद ईरानी महिलाओं की उल्लेखनीय प्रगति के बारे में कहा कि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ईरानी, महिलाओं की भूमिका और उनके स्थान को इतना महत्त्व देते होंगे और ईरानी महिलाएं इतनी सीमा तक सभ्य होंगी। ईरानी महिलाएं समस्त सांस्कृतिक क्षेत्रों में उपस्थित हो सकती हैं और उनका हेजाब उनकी गतिविधियों में किसी भी प्रकार का बाधा व रुकावट उत्पन्न नहीं करता। उन्होंने कहा कि परिवार में महिलाओं की भूमिका मूल है। यदि कोई व्यक्ति अपने चारों ओर के वातावरण से भलीभांति अवगत होता है तो वह अपनी संतान का बड़े अच्छे ढंग से प्रशिक्षण कर सकता है और अपने जीवन साथी की सहायता भी कर सकता है।

तेहरान में आयोजित महिला और इस्लामी चेतना सम्मेलन 19 अनुच्छेदों वाला एक घोषणापत्र जारी करके समाप्त हो गया। इस घोषणापत्र में आया है कि इस्लामी चेतना, ईश्वर के सच्चे वादों और मूल्यवान वास्तविकताओं में से है कि संघर्ष व प्रतिरोध के क्षेत्र में महिलाओं और पुरुषों की व्यापक उपस्थित और उसे व्यवहारिक बनाना, इस्लाम से प्रेम, साम्राज्यवाद व अत्याचार का विरोध, ज़ायोनिज़्म को नकारना, न्यायप्रेम, स्वाधीनता प्रेम, मानवीय प्रतिष्ठा का सम्मान, स्वतंत्रता प्रेम और जातीय, धार्मिक व राष्ट्रीय मतभेदों को नकारना, इस आंदोलन की मुख्य व महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में है। इस सम्मेलन में भाग लेने वाली महिलाओं ने इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति की सफलता को इस्लामी जगत में चेतना की लहर के व्यापक होने में एक नये अध्याय का आरंभ बताया और कहा कि वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई के नेतृत्व में इस चेतना के जारी रहने ने सभी पर यह सिद्ध कर दिया कि धार्मिक शिक्षाओं की छत्रछाया में मानवीय प्रतिष्ठा और अतीत की संप्रभुता व सम्मान को इस्लामी समाज में पलटाया जा सकता है। यह घोषणापत्र हालिया परिवर्तनों को समाज में महिलाओं के स्थान और उनकी भूमिका के सुदृढ़ होने का कारण बताता है और कहता है कि यह स्थिति इस बात की मांग करती है कि विभिन्न क्षेत्रों विशेषकर वैज्ञानिक और इस्लामी देशों के प्रबंधन और निर्णयों में महिलाओं की क्षमताओं से भरपूर लाभ उठाया जाए। तेहरान सम्मेलन में भाग लेने वाली महिलाओं ने महिलाओं के संबंध में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया। घोषणापत्र में आया है कि महिलाओं के संबंध में इस्लाम का दृष्टिकोण, मर्यादा, गरिमा, प्रतिष्ठा, विकास और स्वतंत्रता प्रदान करने वाला है।

अंत में इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने वाली महिलाओं ने इस्लामी चेतना के मार्ग को जारी रखने के लिए इस प्रकार प्रतीज्ञा की “ सम्मेलन में भाग लेने वाली इस्लामी चेतना के शहीदों विशेषकर शहीद महिलाओं के नाम से यह प्रतीज्ञा करती हैं कि ईमान और अधिकार प्राप्ति पर भरोसा करते हुए, आशा और अत्याधिक साहस व निरंतर प्रयास द्वारा इस्लामी जगत की वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक स्वाधीनता और विकास के मार्ग में प्रयत्नशील रहेंगी।