इस्लामी मानवाधिकार दिवस
सर्वसमर्थ ईश्वर ने सृष्टि की रचना बहुत ही अच्छे ढंग से की है ताकि मनुष्य की शारीरिक और अध्यात्मिक आवश्यकताओं को बेहतरीन ढंग से पूरा करे।
इसीलिए धरती और आकाश में जितनी भी चीज़ें हैं उसने मनुष्यों के हवाले की है और अपनी विभूतियों से सही ढंग से लाभ उठाने के लिए मनुष्यों के हाथ खुले रखे हैं किन्तु सृष्टि और अपने अस्तित्व की वास्तविकता की व्याख्या में मनुष्य विरोधाभास और असमंजस का शिकार हो गया और सृष्टि के मार्ग तथा जीवन के बौद्धिक सिद्धांतों से निकलकर वह लोभ और सत्तालोलुप्ता में ग्रस्त हो गया और अपनी अनियंत्रित आंतरिक इच्छाओं का अनुसरण करके दूसरों के अधिकारों से खिलवाड़ करने लगा।
धमकी, भेदभाव, अशांति, निर्धनता, भूख और युद्ध आदि जैसी बातें मानव समाज के इतिहास के अंधकारमयी बिन्दु हैं जिनका दुष्प्रभाव आज भी समाजों और राष्ट्रों पर यथावत पड़ रहा है।
ब्रिटेन के दार्शनिक जान लाक के अनुसार, मानवाधिकार जो प्रकृति की मूल्यवान देन है उस पर प्राचीन यूनानी समाज के विशेष वर्ग का एकाधिकार था। ईसाई धर्म का अनुसरण करने वालों के साथ प्राचीन रोम के शासकों का अत्याचारपूर्ण व्यवहार, मानवीय समाज के विरुद्ध अतिक्रमण और क्रूरता का स्पष्ट नमूना है। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में मानवाधिकारों की अनदेखी का जारी रहना, धीरे धीरे एक साधारण सी बात में परिवर्तित हो गयी है। रक्तपात और युद्ध के लंबे काल के बाद घोषणापत्र और मसौदे तैयार किए गये जिनके बनाने वालों ने मानव समाज के दुखों को कम करने लिए मानवाधिकारों की बात कही और कहा कि मानव जीवन को ऐसे सिद्धांतों से जोड़ दिया जाए जिनसे उसके व्यक्तिगत और सामाजिक अधिकार सुनिश्चित रहें।
अपने अधिकारों की प्राप्ति की दिशा में मनुष्यों द्वारा उठाए गये क़दमों में से एक वर्ष 1948 में मानवाधिकारों के वैश्विक घोषणापत्र का जारी करना है। इस घोषणापत्र में जो अपने पहले वाले घोषणापत्रों की तुलना में परिपूर्ण समझा जाता है, मनुष्य के बहुत से मूल अधिकार और उसकी व्यक्तिगत व सामाजिक स्वतंत्रताएं शामिल हैं और इसने राष्ट्रों में आशा की यह किरण जगाई कि मानवाधिकारों के वैश्विक घोषणापत्र के अनुच्छेदों के क्रियान्वयन से उसकी समस्त स्वतंत्रताएं और अधिकार सुनिश्चित हो जाएंगे।
मानवाधिकार का वैश्विक घोषणापत्र उन सरकारों की वैचारिक देन है जिनपर पश्चिमी लिब्रिलिज़्म की छाया स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। यद्यपि यह घोषणापत्र बहुत से अधिकारों के परिवर्तन का कारण तो बना किन्तु इसके भीतर पायी जाने वाली कमियों ने, मनुष्यों और उसकी आवश्यकताओं साथ ही घोषणापत्र के क्रियान्वयन के मार्गों के संबंध में विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोणों को जन्म दिया और इसी विषय ने बहुत से लोगो को अपने मूल अधिकारों की प्राप्ति में समस्याओं में डाल दिया।
इसी बीच इस्लाम का व्यापक और सर्वव्यापी दृष्टिकोण, मानवाधिकारों के बारे में बहुआयामी और परिपूर्ण आदर्श व मानक है। कुल मिलाकर मानवाधिकारों के अंतर्राष्ट्रीय मानकों में निर्धारित मानवाधिकारों तथा इस्लामी मानवाधिकारों में कुछ समानताएं पायी जाती हैं। उदाहरण स्वरूप जीवन का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार, आस्थाओं की स्वतंत्रता, शिक्षा का अधिकार, घर और भेदभाव से रोकना इत्यादि, किन्तु स्पष्ट है कि मानवाधिकारों का ध्यान रखने के संबंध में प्रस्तुत सिद्धांतों को वास्तव में उसी समय वैश्विक समर्थन प्राप्त होगा कि जब सभी संस्कृति और सभ्याताएं सैद्धांति और व्यवहारिक रूप में उसमें भाग लें। मानवाधिकारों के वैश्विक घोषणापत्र के तैयार करने वालों के पश्चिमी विचारधारा के अनुसरण के कारण इस घोषणापत्र में धर्म की उच्च व अध्यात्मिक शिक्षाओं की अनदेखी कर दी गयी और धर्म को, जाति, रंग और भाषा के साथ साथ भेदभाव के कारक के रूप में पेश किया गया। इसी लिए इस्लामी देश, मज़बूत घोषणापत्र की परिधि में मानवाधिकारों के संबंध में इस्लामी दृष्टिकोण को बयान करने पर विवश हुए। इस्लामी मानवाधिकार में वर्णित बहुत से अनुच्छेद, मानवाधिकारों के वैश्विक घोषणापत्र की विषय वस्तु में तो समान हैं किन्तु मनुष्य के संबंध में उसके दृष्टिकोणों में बहुत अंतर पाया जाता है।
इस्लाम धर्म में मानवाधिकार, एकेश्वरवाद की विचारधारा पर आधारित है और इसी बात ने इस्लामी मानवाधिकारों को पश्चिमी मानवाधिकारों से अलग कर दिया है। इस्लाम धर्म, मानवाधिकार को मानवीय प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक बताता है क्योंकि धार्मिक विचारधारा में मनुष्य को धरती पर ईश्वर का उतराधिकारी बताया गया है और इस प्रकार से वह सम्मान योग्य है। ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरए इसरा की आयत क्रमांक 70 में कहता है कि और हमने आदम की संतान को प्रतिष्ठा प्रदान की और उन्हें जल और थल में सवारियों पर बिठाया और उन्हें पवित्र आजीविका प्रदान की और अपनी रचनाओं में से बहुतों पर वरीयता दी।
वास्तव में नस्लभेद और भेदभाव को दूर करना, मानवाधिकार के घोषणापत्र की कोई ताज़ा उपलब्धियां नहीं हैं बल्कि पश्चिमी मानवाधिकार के स्तंभ समझे जाने वाले आज कल के सिद्धांत इस्लाम के मूल सिद्धांतों से लिये गये हैं। विश्व से वर्चस्व और भेदभाव को नकारने के लिए इस्लाम धर्म प्रकट हुआ और ईश्वरीय दूतों का प्रयास, समाजों में मानवाधिकारों की पूर्ति और सुरक्षा और न्याय की स्थापना करना था। इस्लाम का तर्क यह है कि राष्ट्रीयता, जाति और रंग में विविधता के बावजूद सभी मनुष्य, रचना की दृष्टि से एक समान हैं और इस्लाम मनुष्य को स्वतंत्र समझता है और उसके अपमान का विरोधी है।
इस्लाम की दृष्टि में जब तक मनुष्य के अध्यात्मिक जीवन में सुधार नहीं होगा तब तक उसकी सामाजिक शांति और सुरक्षा में भौतिक तत्वों की कोई अधिक भूमिका नहीं होगी। यह इस प्रकार से है कि इस्लामी विचारधारा, मनुष्य की सामाजिक पहचान को उसकी आस्था और शिष्टाचार में देखती है और उसे मनुष्य के जीवन का संयुक्त आधार बताती है। उदाहरण स्वरूप मनुष्यों की बराबरी के बारे में इस्लाम कहता है कि मनुष्य एक दूसरे के भाई हैं।
दूसरा महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि मानवाधिकारों के रूप में वैश्विक घोषणापत्र में जो बातें वर्णित हैं, वे पूर्ण रूप से मनुष्य के जीवन के भौतिक आयामों से संबंधित हैं और इनमें मनुष्यों के नैतिक और अध्यात्मिक अधिकारों की चर्चा तक नहीं हुई है। आज यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दूसरों पर अतिक्रमण, समाज में नैतिक मूल्यों के न होने के कारण है। इसी परिप्रेक्ष्य में हम इस बात साक्षी हैं कि पश्चिमी देशों की मनमानी कार्यवाहियों ने मानवाधिकारों के विषय को प्रभावित किया है और मानवाधिकारों की वास्तविकता पश्चिमी सरकारों की नीतियों में रौंदी जा रही है।
मानवाधिकारों के वैश्विक घोषणापत्र के 21वें अनुच्छेद की तीसरी धारा यह बताती है कि सरकार और सत्ता का आधार, जनता का संकल्प है और समस्त वस्तुओं का मुख्य बिन्दु मनुष्य है। इस्लाम धर्म में भी जनमत को सरकार को सुदृढ़ बनाने के महत्त्वपूर्ण तत्वों में बताया गया है और मनुष्य, उच्च स्थान व परिपूर्णता तक पहुंचने के लिए विशेष प्रकार के क़ानूनों का पालन करके सृष्टि को अपने नियंत्रण में ले सकता है। इस आधार पर समस्त सृष्टि का मुख्य बिन्दु महान ईश्वर है जो मनुष्यों सहित समस्त चीज़ों का रचयिता है।
पश्चिमी मानवाधिकारों पर इस्लामी मानवाधिकारों की विशिष्टता के दृष्टिगत इस्लामी गणतंत्र ईरान ने वर्ष 2008 में यूगांडा की राजधानी कम्पाला में इस्लामी सहकारिता संगठन ओआइसी के विदेशमंत्रियों की बैठक में इस्लामी मानवाधिकार और मानवीय प्रतिष्ठा शीर्षक के अंतर्गत एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया जो इस्लामी देशों की सर्वसम्मति से पारित हो गया और इसके आधार पर पांच अगस्त को इस्लामी मानवाधिकारों और मानवीय प्रतिष्ठा दिवस घोषित किया गया। इस प्रकार से इस्लामी मानवाधिकारों के क्षेत्र में इस्लामी सहकारिता संगठन का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ पंजीकृत हुआ। इस दिन के पंजीकरण का उद्देश्य यह है कि मुसलमान और इस्लामी देश, मानवाधिकारों के संबंध में विश्ववासियों को इस्लामी दृष्टिकोण बताएं और वर्तमान विश्व के समाने मानवाधिकार के संबंध में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करें और उनकी समीक्षा करें।
इस्लामी मानवाधिकार के घोषणापत्र में 25 अनुच्छेद शामिल हैं जिसमें ईश्वर की सबसे बेहतरीन रचना के रूप में मानव के लिए मानवीय प्रतिष्ठा व सज्जनता और मानव जीवन को जारी रखने और मानवीय गरिमा की रक्षा की आवश्यकता की बातें वर्णित हैं।
मानवाधिकार दिवस का निर्धारण और मानवीय प्रतिष्ठा नामक प्रस्ताव स्पष्ट करता है कि इस्लाम धर्म के आधार पर, मानवाधिकार, मनुष्य के व्यक्तिगत मूल्यों व प्रतिष्ठा से निकले हैं और इस्लामी समाज वैश्विक संदेश रखता है। इस प्रस्ताव में इसी प्रकार वर्णित किया गया है कि यद्यपि मानवता ने भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में बहुत प्रगति की है किन्तु उसे अपनी सभ्यता और अधिकारों के समर्थन के लिए स्पष्ट ईमान और अध्यात्म की आवश्यकता है।
इस्लामी मानवाधिकारों के प्रस्ताव के एक अन्य भाग में आया है कि विश्व स्तर पर पायी जाने वाली स्थिति के दृष्टिगत, ओआइसी के सदस्य देशों के बीच सहयोग और सहाकारित को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से प्रकाशन के साधनों और मार्गों तक पहुंच, मानवाधिकारों के क्षेत्र में इस्लामी मूल्यों और शिक्षाओं की सुरक्षा तथा उनकी प्रगति, इस्लाम की वास्तविक छवि का समर्थन, इस्लाम के अनादर से संघर्ष और धर्मों के मध्य संवाद को प्रेरित करने के लिए यह आवश्यक है कि वर्ष के किसी दिन को इस्लामी मानवाधिकार और मानवीय प्रतिष्ठा दिवस घोषित किया जाए।