इस्लामी जागरूकता और वहाबियत-२
सलफ़ी नामक भ्रष्ट विचारधारा बहुत से अवसरों पर इस्लाम के विभिन्न पंथों के बीच शत्रुता का कारण बनी है।
वर्तमान राजनैतिक परिवेश में सलफ़ी शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन गुटों के लिए किया जाता है जो इस्लामी नियमों को अति रूढ़िवादी दृष्टि से देखते हैं। कट्टरपंथी सलफ़ी या वहाबी, नए एवं आधुनिक विषयों से संबन्धित नियमों को समझने के लिए बुद्धि के प्रयोग के मुखर विरोधी हैं। उदाहरण स्वरूप कुछ समय पूर्व सऊदी अरब में किसी ने एक वहाबी धर्मगुरू से यह पूछा था कि जो व्यक्ति अस्पताल में भर्ती है उससे भेंट करते समय फूल ले जाना धर्म की दृष्टि से कैसा कार्य है? इसके उत्तर में वहाबी धर्मगुरू का कहना था कि हमकों पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथनों और उनकी परंपरा में एसी कोई बात नहीं मिलती अतः बीमार के लिए अस्पताल में फूल ले जाना हराम है। वर्तमान समय में एसे बहुत से अच्छे कार्य किये जाते हैं जिनका उल्लेख स्पष्ट शब्दों में क़ुरआन या पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथनों में नहीं मिलता किंतु पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों की परंपराओं और क़ुरआन की आयतों तथा हदीसों में थोड़ा सा चिंतन-मनन करने से इन कार्यों का सही होना सिद्ध हो जाता है। सलफ़ी या वहाबी अपने इस संकीर्ण दृष्टिकोण से न केवल ग़ैर मुसलमानों को बल्कि बहुत से इस्लामी पंथों को भी काफ़िर घोषित करते हैं।
पवित्र क़ुरआन तथा पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके परिजनों के कथनों में चिंतन-मनन पर बहुत बल दिया गया है। सलफ़ी विचारधारा विभिन्न गुटों में बंटी हुई है। सलफ़ी विचारधारा के गुटों में विभाजित होने का कारण वे मतभेद हैं जो उनकी मौलिक विचारधारा में पाए जाते हैं। उदाहरण स्वरूप कुछ वहाबी, पैग़म्बरे इस्लाम (स) के उन कथनों को ही मानदंड के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिनमें से अधिकांश के बारे में यही पता नहीं है कि वे उनके कथन हैं या नहीं जबकि वहाबियों का एक अन्य गुट पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथनों पर कोई विशेष ध्यान न देकर केवल पवित्र क़ुरआन की कुछ आयतों को ही मानदंड बनाता है। एक अन्य उदाहरण यह है कि वहाबी, सूफ़ीवाद के प्रखर विरोधी हैं जबकि भारतीय उपमहाद्वीप की देवबंदी विचारधारा वाले सलफ़ी इसके प्रति कटिबद्ध है। एक अन्य मतभेद यह है कि वहाबियों की नई पीढ़ी, जिसे नवीन वहाबियत के नाम से जाना जाता है हत्याओं और दूसरों को काफ़िर घोषित करने की बात को पसंद नहीं करती अतः वह बौद्धिक पद्धति को अपनाने पर विवश है।
कभी-कभी एसा भी देखने में आता है कि सलफ़ी विचारधारा के अनुयायी गुट, आपस में आस्था संबन्धी दृष्टिकोण तथा राजनीतिक दृष्टिकोण में तो समानता रखते हैं किंतु उनकी व्यवहारिक शैलियां एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। उदाहरण स्वरूप पाकिस्तान में सलफ़ियों की जमीअते ओलमाए इस्लाम नामक शाखा, जो देवबंद विचारधारा का अनुसरण करती है, अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए कूटनैतिक शैली का प्रयोग करती है। उसका प्रयास रहता है कि वह राजनैतिक मंच पर अपनी सक्रिय उपस्थिति बनाए रखे और इस प्रकार से अपने लक्ष्यों की पूर्ति कर सके। किंतु इसके विपरीत सलफ़ी विचारधारा की ही एक अन्य शाखा सिपाहे सहाबा, आस्था की दृष्टि से तो सलफ़ियों के समान है किंतु अपने लक्ष्यों को साधने के लिए उसने हिंसा तथा रक्तपात का मार्ग अपना रखा है। वहाबियों की कुछ नवीन प्रक्रियाएं अपने लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए प्रचारिक हथकण्डों का प्रयोग करती हैं जबकि उसी के अतिवादी गुटों ने हिंसक व्यवहार करने और आतंकवादी संगठनों को सहायता की नीति अपना रखी है। सलफ़ियों के बीच पाई जाने वाली वैचारिक भिन्नता के कारण उसके हर गुट ने अलग-अलग नीतियां अपना रखी हैं। राजनीतिक दृष्टि से सलफ़ियों को दो भागों में बांटा जा सकता है। सत्ता के पक्षधर सलफ़ी तथा मुसलमानों को काफ़िर कहने वाले सलफ़ी। इस मतभेद का मुख्य कारण यह है कि भ्रष्ट सरकार को गिराने के लिए क्रांति करने या न करने के बारे में उनके दृष्टिकोण एक-दूसरे से भिन्न हैं। सत्ता के पक्षधर सलफ़ियों का मानना है कि शासक चाहे किसी भी ढंग से सत्ता तक पहुंचा हो जबतक वह खुलकर अपने कुफ़्र की घोषणा नहीं करता उस समय तक वह इस्लामी समाज का शासक है और धर्म की दृष्टि से उसका अनुसरण करना अनिवार्य है। इस विचारधारा के अनुसार यदि किसी शासक ने कोई ग़ैर इस्लामी कार्य किया तो एसी स्थिति में जनता और धर्मगुरूओं का दायित्व यह बनता है कि वे केवल मौखिक ढंग से उसका मार्गदर्शन करें और इस शासक के विरूद्ध न तो कोई आन्दोलन चलाया जा सकता है और न ही कोई क्रांति लाई जा सकती है। फ़ार्स की खाड़ी के दक्षिण में पाई जाने वाली राजशाही सरकारें, इस प्रकार की विचारधारा का समर्थन करती हैं ताकि उनकी अपनी राजशाही सरकारें सुरक्षित रह सकें।
सत्ता की पक्षधर सलफ़ी विचारधारा के भीतर “सलफ़ियत एहयाई” नामक एक रूझान सामने आया है जिसके प्रतिनिधि और प्रवक्ता, शैख़ मुहम्मद नासिरूद्दीन अलबानी हैं। तानाशाही व अत्याचारी सरकारों ने इस विचारधारा को रूढ़ीवादी विचारधारा में परिवर्तित कर दिया है और मुसलमानों को काफ़िर कहने वाले सलफ़ियों तथा सरकार का विरोध करने वाले सलफ़ियों के बीच टकराव की स्थिति में वे इसको प्रयोग करती हैं। अन्य सलफ़ियों की ही भांति सलफ़ियते एहयाई अर्थात सलफ़ियत के पुनर्जागरण का निमंत्रण, प्राचीन तथा आधुनिक रीतियों को अपनाए बिना इस्लाम की ओर वापसी है किंतु महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यह रुझान, सामूहिक एवं संगठित रूप से राजनीतिक एवं जेहादी गतिविधियों को अवैध समझता है। इस विचारधारा का मानना है कि समाज का प्रशिक्षण और उसकी पवित्रता, सत्ताधारी सरकार से टकराव या उसकी वैधता में संदेह के बिना ही इस्लामी सरकार के गठन का कारण बनेगी। उनका प्रसिद्ध वाक्य यह है कि “राजनीति, राजनीति का त्याग है”।
सलफ़ियों में पाए जाने वाले एक अन्य महत्वपूर्ण धड़े का नाम तकफ़ीरी है जिनकी आस्था, स्त्ता के पक्षधर सलफ़ियों से अलग है। यह वह गुट है जो अपने विरोधियों को अनेकेश्वरवादी और काफ़िर बताते हैं। उनकी विचारधारा के अनुसार आस्था तथा व्यवहार के बीच अटूट संबन्ध पाया जाता है अर्थात यदि कोई ईश्वर और इस्लाम पर विश्वास रखता है किंतु उनके विचारों के अनुसार उसने यदि कोई महापाप कर लिया तो वह इस्लाम से निकल जाता है और उसे काफ़िर समझा जाएगा। इतिहास में इस प्रकार के एकमात्र गुट को ख़वारिज के नाम से जाना जाता है। इसी विचारधारा के दृष्टिगत वहाबी, मुसलमानों के उन धार्मिक कार्यों का जो उनके दृष्टिकोणों के विपरीत हैं, उन्हें पाप और अनेकेश्वरवाद मानते हैं अतः उनकी दृष्टि में एसे लोगों की हत्या करना जो एसे कार्य करें वैध है। सलफ़ियों का यह गुट/उन मुसलमानों को, जो उनकी इच्छानुसार धर्म को नहीं मानता और उनके दिगभ्रमित विचारों का अनुसरण नहीं करता, काफ़िर समझता है। वहाबियों का इतिहास एसे मुसलमानों के जनसंहार से भरा पड़ा है जो वहाबियों की रूढ़िवादी विचारधारा को नहीं मानते थे। एक वहाबी लेखक सलाहुद्दीन मुख़्तार लिखता है कि वर्ष १२१६ हिजरी क़मरी में “अमीर सऊद” ने सऊदी अरब के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों पर आधारित एक सेना का गठन करके इराक़ पर चढ़ाई की। यह लोग ज़ीक़ादा महीने में इराक़ के पवित्र नगर करबला पहुंचे और उन्होंने इस नगर का परिवेष्टन कर लिया। वहाबियों की सेना नगर के प्रवेष द्वार और दीवारों को तोड़ती हुई बल पूर्वक करबला नगर में घुस गई। इसके पश्चात उन्होंने इन नगर के लोगों का बड़ी निर्दयता के साथ जनसंहार किया। उसके पश्चात दोपहर के समय वे लूटपाट का बहुत सा माल लेकर करबला से बाहर निकले। इन वहाबियों ने न केवल पैग़म्बरे इस्लाम (स) के नाती इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मज़ार पर मौजूद लोगों के गले काट दिये और उनकी निर्मम हत्याएं कीं बल्कि नजद, हेजाज़ और सीरिया में भी भारी रक्तपात किया जहां पर अधिक्तर सुन्नी मुसलमान रहते हैं। रूढ़िवादी वहाबियों का मानना है कि वर्ष २००३ में अमरीका द्वारा इराक़ के अतिग्रहण से यह देश चार गुटों के चुंगल में फंस गया है। पहला गुट सलीबी अर्थात अतिग्रहणकारी अमरीकी और पश्चिमी हैं, दूसरे राफ़ेज़ी अर्थात इराक़ के शीया, तीसरा सफ़वी अर्थात ईरान के शीया जिनका वहाबियों के विचार में इराक़ पर वर्चस्व है और चौथे मुरतदीन अर्थात इराक़ के सुन्नी जो शीयों की सरकार के साथ सहकारिता कर रहे हैं। इसी आधार पर वहाबी धर्मगुरूओं ने इन चारों गुटों के विरूद्ध जेहाद का फ़त्वा दिया है और इस मार्ग में मरने या मारने को वे मोक्ष एवं कल्याण मानते हैं। रूढ़िवादी वहाबियों के अनुसार अतिग्रहणकारी अमरीकियों और इराक़ में रहने वाले शीया और सुन्नियों के बीच कोई अन्तर नहीं है और उनके अनुसार इन सबकी हत्या अनिवार्य है। वहाबियों ने इसी प्रकार शीयों और सुन्नी मुसलमानों के काफ़िर होने का फ़त्वा दिया है। वहाबियों का एक धर्मगुरू अब्दुर्रहमान नासिर अलबराक शीयों और अधिकांश सुन्नियों को काफ़िर मानता है। सलफ़ियों के समस्त अतिवादी एवं चरमपंथी गुट चाहे वह सिपाहे सहाबा हो, चाहे लश्करे झंगवी, चाहे जैशे मुहम्मद या लश्करे तैबा, सभी शीया मुसलमानों को काफ़िर मानतें हैं और इसीलिए समय-समय पर वे शीयों की हत्याएं करते रहते हैं विशेषकर मुहर्रम के आयोजनों पर आक्रमण करके इनमें भाग लेने वालों की बहुत ही हिंसक रूप में हत्याएं करते हैं।