एक राष्ट्र की अमिट याद
21 सितंबर का दिन वर्ष 1980 में ईरान पर सद्दाम शासन द्वारा सैन्य अतिक्रमण आरंभ किए जाने की याद दिलाता है।
यह दिन एक बार फिर इस महाअतिक्रमण के मुक़ाबले में ईरानी जनता के पवित्र रक्षा के विभिन्न आयामों की समीक्षा का अवसर प्रदान करता है। इस्लामी गणतंत्र ईरान में एक सप्ताह को उन लोगों की याद में पवित्र रक्षा सप्ताह का नाम दिया गया है जिन्होंने पवित्र रक्षा के आठ वर्षों में देश की प्रतिष्ठा के लिए अपने जान व माल को क़ुर्बान कर दिया। इस एक सप्ताह में शहीदों, युद्ध में विकलांग होने वालों तथा युद्ध के मोर्चे से सुरक्षित लौटने वालों और उन लोगों का सम्मान किया जाता है जिनका किसी न किसी रूप में पवित्र रक्षा के वर्षों में योगदान रहा है। ईरान में इस्लामी क्रान्ति की फ़रवरी 1979 में सफलता और 1980 में ईरान पर थोपे गए युद्ध के बीच लगभग डेढ़ वर्ष का अंतर है जिससे ईरान पर सद्दाम शासन के आक्रमण के कारण को और अधिक समझा जा सकता है। ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता, मध्यपूर्व में अमरीका की क्षेत्रीय नीतियों की बहुत बड़ी विफलता थी। मोहम्मद रज़ा पहलवी का शाही शासन फ़ार्स की खाड़ी में अमरीका की भुजा समझा जाता था। उस समय ईरान और सउदी अरब की मध्यपूर्व में अमरीकी नीतियों को आगे बढ़ाने में बहुत बड़ी भूमिका थी। दोनों देश स्ट्रेटिजिक स्थिति के अतिरिक्त विश्व में तेल के सबसे बड़े भंडार के स्वामी एवं इसके निर्यातक देश हैं। यह स्ट्रेटिजिक स्थिति और तेल के विशाल भंडार अमरीका के लिए पूरेव मध्यपूर्व पर वर्चस्व जमाने के लिए अच्छा बहाना थे जिसके द्वारा वह विश्व में ऊर्जा की महत्वपूर्ण नाड़ी अर्थात तेल पर नियंत्रण कर सके। इसलिए इस्लामी क्रान्ति की सफलता क्षेत्र में अमरीकी हितों के लिए बहुत बड़ा आघात थी। अमरीका ने पहली बार वर्ष 1953 में डाक्टर मुसद्दिक़ की राष्ट्रीय सरकार के विरुद्ध विद्रोह करवाकर और मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता में लौटा कर ईरान में जनता की सरकार के क़दम को रोका था किन्तु चूंकि 1979 में एक धार्मिक, राजनिक, बुद्धिमान, दूरदर्शी व ईरानी राष्ट्र की लोकप्रिय हस्ती के रूप में इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में क्रान्ति की कमान थी इसलिए उनके दिशा-निर्देशन ने इस्लामी क्रान्ति को रोकने के अमरीकी षड्यंत्र को विफल बना दिया। अमरीका ऐसी स्थिति में ईरान में अत्याचार के विरुद्ध क्रान्ति के मार्ग में रुकावटें खड़ी कर रहा था कि तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर स्वयं को विश्व में प्रजातंत्र व मानवाधिकार का अग्रदूत कहते थे। यह ऐसी स्थिति में था कि ईरान में मौजूद शासन शाही, अत्याचारी व अप्रजातांत्रिक था। ईरानी राष्ट्र व ईरानी जनता के मत से अस्तित्व में आयी सरकार से अमरीका की शत्रुता, इस्लामी क्रान्ति की सफलता के पहले ही दिन से आरंभ हो गयी थी। ईरान के सीमावर्ती प्रांतों को अशांत करने के लिए पृथकतावादी गुटों को वित्तीय, राजनैतिक व शस्त्रों की सहायता, इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या, सैन्य विद्रोह के लिए मोहम्मद रज़ा पहलवी शासन के बचे हुए तत्वों की सहायता और आर्थिक प्रतिबंध, ईरान की नवस्थापित इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को गिराने के लिए अमरीकी कृत्यों के कुछ उदाहरण हैं। अमरीकी सरकार जब अपने इन कृत्यों से इस्लामी गणतंत्र के स्थिर होने की प्रक्रिया को न रोक सकी तो उसने सद्दाम को इस्लामी गणतंत्र पर व्यापक युद्ध थोपने के लिए उकसाया। वह भी ऐसी स्थिति में इस्लामी गणतंत्र ईरान की सशस्त्र सेनाएं तब तक मोहम्मद रज़ा पहलवी के पतन के पश्चात पुनर्निर्माण व मरम्मत की प्रक्रिया पूरा नहीं कर पायी थी।
इस्लामी गणतंत्र ईरान की भूमि पर सद्दाम शासन के आक्रमण के आरंभिक महीनों में ईरान के पांच प्रांत सद्दाम शासन के नियंत्रण में चले गए थे। उस समय ईरान की इस्लामी क्रान्ति की उच्च परिषद में वरिष्ठ सदस्य के रूप में वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई ने युद्ध के लक्ष्य को समझते हुए कहा थाः यह युद्ध ईरान की इस्लामी क्रान्ति के विरुद्ध, ईरान की क्रान्तिकारी व्यवस्था को पलटने और इस्लामी क्रान्ति को समाप्त करने के लिए सुनियोजित है। इस्लामी गणतंत्र ईरान के बहुत से अधिकारियों का भी यह मानना है कि ईरान के विरुद्ध सद्दाम का युद्ध इसलिए था कि अन्य राष्ट्र एक स्वाधीन व इस्लामी क्रान्ति की ओर से निराश हो जाएं और अमरीका व पूर्व सोवियत संघ अपने समस्त मतभेदों के बावजूद इस संदर्भ में एकमत थे। फ़ार्स खाड़ी व मध्यपूर्व के मामलों के माहिर जेम्ज़ बेल ने भी एक किताब में ईरान के विरुद्ध युद्ध आरंह करने के वास्तविक कारण के संबंध में लिखा हैः युद्ध का वास्तविक कारण फ़ार्स खाड़ी पर वर्चस्व जमाने के लिए राजनैतिक द्वंद्व था। इस प्रक्रिया में इराक़ को लग रहा था कि वह ईरान की इस्लामी क्रान्ति का उसके सिर उठाने से पहले ही गला घोंट देगा और यह वह लक्ष्य था जिस पर सउदी और फ़ार्स की खाड़ी के देशों सहित क्षेत्रीय देशों को कोई आपत्ति भी न थी। तत्कालीन इराक़ी उपप्रधान मंत्री तारिक़ अज़ीज़ ने कहा थाः पांच ईरान का अस्तित्व अखंड ईरान से बेहतर रहेगा,,, हम ईरानी राष्ट्र के विद्रोह का समर्थन करेंगे और अपना पूरा प्रयास ईरान के विघटन पर केन्द्रित करेंगे। तत्कालीन इराक़ी उपप्रधान मंत्री ताहा यासीन रमज़ान ने भी इस देश की बास पार्टी का अंग समझे जाने वाले समाचार पत्र अस्सौरा से साक्षात्कार में बल देकर कहा थाः यह युद्ध 1975 के समझौते या कुछ सौ किलोमीटर भूमि या आधी अरवंद नदी के लिए नहीं है। यह युद्ध इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को गिराने के लिए है।
हालांकि सद्दाम ने युद्ध के लिए 1975 के अलजीरिया नामक समझौते को बहाना बताया था किन्तु इस्लामी गणतंत्र की नवस्थापित व्यवस्था को गिराना और विघटन उसका मुख्य लक्ष्य था किन्तु सद्दाम और उसके पूर्वी व पश्चिमी समर्थकों की योजनाओं व कल्पनाओं के विपरीत थोपा गया युद्ध ईरानी जनता के विभिन्न वर्गों के बीच राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ होने का बिन्दु बन गया। एक वर्ष के भीतर सशस्त्र सेनाओं ने स्वयं को संगठित किया। मोर्चे स्वेच्छा से भाग लेने वाले युवाओं से भर गए कि जिनके हृदय में ईमान भरा था। उन्होंने हल्के हथियारों से सद्दाम की आधुनिक हल्के व भारी शस्त्रों से लैस सेना के सामने वीरता, दृढ़ता और शौर्य का अभूतपूर्व उदाहरण पेश किया।
विश्व के प्रतिष्ठित सैन्य विश्वविद्यालयों के सबसे अनुभवी अधिकारियों ने भी सद्दाम की सेना के मुक़ाबले में ईरानी युवाओं के प्रतिरोध व रचनात्मकता को देख दांतों तले अंगुली दबा ली। ईरानी युवाओं की आश्चर्यचकित करने वाली एवं रात की कार्यवाहियों ने युद्ध को ईरान के हित में मोड़ दिया। यह इराक़ का सद्दाम शासन था जिसकी स्थिति कमज़ोर पड़ गयी थी और वह पतन के मुहाने पर था। पूरब और पश्चिम के दोनों ब्लाकों में सद्दाम के समर्थकों ने उसे बचाने के लिए न केवल यह कि उसे आधुनिकतम शस्त्र दिए बल्कि ईरान की सशस्त्र सेनाओं की स्थिति के बारे में सूचनाएं उपग्रह के माध्यम से बासी शासन को मुहैया कराते थे। इस बीच इस्लामी गणतंत्र ईरान पर बहुत ही कड़े आर्थिक व सैन्य प्रतिबंध लगे हुए थे। यहां तक कि देश ईरान को कांटेदार तार भी नहीं बेचते थे। जबकि दूसरी ओर इराक़ की बासी सेना इन सभी सहायताओं से संपन्न होने के बावजूद ईरान की सशस्त्र सेनाओं के आश्चर्यचकित करने वाले हमलों का मुक़ाबला न कर सकी। स्थिति यहां तक पहुंची कि अमरीका, पूर्व सोवियत संघ और उनके घटक इस्लामी गणतंत्र ईरान पर जबरत शांति संधि स्वीकार करने के लिए दबाव डालने लगे। फ़ार्स खाड़ी में अमरीका की सशस्त्र सेनाएं ईरान के साथ सीधे युद्ध में कूद पड़ीं और उन्होंने ईरान की नौकाओं व तेलवाहक जहाज़ों को निशाना बनाया। यहां तक अमरीका ने ईरान को अन्यायपूर्ण शांति संधि को स्वीकार करने पर विवश करने के लिए फ़ार्स की खाड़ी के ऊपर ईरान के यात्री विमान को गिरा दिया। तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन ने फ़ार्स खाड़ी में अपने देश के युद्धपोत के कमांडर को इस महाअपराध के अंजाम देने पर पदक से सम्मानित किया। थोपा गया युद्ध आठ वर्षों के पश्चात इस स्थिति में समाप्त हुआ कि ईरान की भूमि का एक बालिश्त भूभाग उससे अलग न हो सका और न ही इस्लामी क्रान्ति के शत्रु, नवस्थापित इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को गिराने के लक्ष्य में सफल हो सके।
इस्लामी गणतंत्र ईरान से अमरीका की शत्रुता थोपे गए युद्ध के बाद भी जारी रही। अमरीका ने नाना प्रकार के आर्थिक व राजनैतिक प्रतिबंधों द्वारा इस्लामी गणतंत्र ईरान की विकास गति को रोकने का प्रयास किया किन्तु ईरान ने युद्ध के काल के अनुभव व ईमान व उच्च मनोबल से समृद्ध युवाओं के भरोसे आर्थिक विकास व प्रगति की लंबी छलांग लगायी। ईरान का सकल घरेलू उत्पाद युद्ध के समाप्त होने के वर्ष की तुलना में गई गुना हो गया। अर्थव्यवस्था, विज्ञान व तकनीक के कुछ क्षेत्रों में इस्लामी गणतंत्र ईरान विश्व के कुछ देशों की पंक्ति में शामिल हो गया। इसी प्रकार इस्लामी गणतंत्र ईरान विश्व के उन गिने चुने देशों में है जो परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण प्रयोग के क्षेत्र में युरेनियम के निकालने के चरण से लेकर उसके संवर्धन तक की तकनीक से संपन्न हैं। इस्लामी गणतंत्र ईरान इस समय अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में भी उपग्रह भेज कर बहुत बड़ी सफलता अर्जित कर चुका है। नैनो टेकनालॉजी, चिकित्सा विज्ञान और महंगी व कम मिलने वाली दवाओं के उत्पादन में भी विश्व के कुछ अग्रणी देशों में शामिल है। यह सभी महाउपलब्धियां ईरान ने प्रतिबंध की स्थिति में बुद्धिमान ईरानी युवा बल की योग्यता से अर्जित की हैं। इस समय इस्लामी गणतंत्र ईरान विश्व के स्वतंत्रताप्रेमी राष्ट्रों के लिए आदर्श बन गया है। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने यह सिद्ध कर दिया कि अमरीका की अगुवाई में वर्चस्ववादी व्यवस्था के दबावों के सामने डट कर व कठिनाइयां सहन कर वैज्ञानिक व आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में बड़े क़दम उठाए जा सकते हैं। वर्चस्ववादी व्यवस्था को भी जैसे जैसे समय बीत रहा है अपनी वर्चस्ववादी नीतियां थोपने के मार्ग में अधिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि राष्ट्र जागरुक हो गए हैं और धौंस व धमकी का काल अपने अंत को पहुंच गया है। वर्चस्ववादी शत्रुओं को पीछे ढकेलने का एकमात्र मार्ग प्रतिरोध है और यह वह पाठ है जिसे इस्लामी गणतंत्र ईरान ने अपने 34 वर्षीय उपलब्धि भरे जीवन के अनुभव के रूप में विश्व के राष्ट्रों के सामने पेश किया है। ऐसा पाठ जिसका फ़िलिस्तीन और लेबनान में ज़ायोनी शासन से मुक़ाबले में उज्जवल परिणाम निकला है।