Apr १३, २०१६ ११:४५ Asia/Kolkata

जैसाकि आप जानते हैं कि आदिकाल से ही मानव जाति जिन बातों से भयभीत रही है उनमें से एक, युद्ध का भय है।

 ऐतिहासिक प्रमाण इस बात को सिद्ध करते हैं कि मनुष्य की उत्पत्ति से वर्तमान समय तक कोई भी एसा कालखण्ड नहीं गुज़रा जो युद्ध की विभीषिका से सुरक्षित रह सका हो। समय गुज़रने के साथ ही मानव समाज के लिए युद्ध के ख़तरे तो कम नहीं हुए किंतु इसकी शैलियों में परिवर्तन आता गया। हालिया दशकों में युद्ध की एक नई शैली सामने आई है जिसे नर्म युद्ध या साफ्टवार कहा जाता है। नर्मयुद्ध या साफ्टवार एसा युद्ध है जिसमें मनोवैज्ञानिक और प्रचारिक ढंग से किसी समाज या गुट को लक्ष्य बनाया जाता है। प्रचलित युद्ध शैली की भांति इसमें शस्त्रों का प्रयोग नहीं किया जाता। साफ़्टवार के अन्तर्गत शत्रु, एक सुनियोजित कार्यक्रम के अन्तर्गत अपनी संस्कृति, राजनीति, भावनाओं, व्यवहार, आस्था और अपनी सोच को दृष्टिगत समाज या राष्ट्र में प्रचलित करता है। नर्मयुद्ध को राष्ट्रों के मूल्यों और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे ख़तरनाक, जटिल और प्रभावी युद्ध माना जाता है। इसमें सैनिकों और शस्त्रों के प्रयोग के बिना ही युद्ध किया जाता है और सफलता अर्जित की जाती है।   



कहा जाता है कि ब्रिटेन के सैनिक मामलों के टीकाकार एंव इतिहासकार फ़ाउलर ही ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने नर्मयुद्ध या साफ्टवार के विषय को पेश किया था। सन 1920 में उन्होंने इसे मनोवैज्ञानिक युद्ध का नाम दिया था। हालांकि उस समय ब्रिटेन तथा अमरीका के सैनिक एवं वैज्ञानिक हल्क़ों में फ़ाउलर की ओर से प्रस्तुत किये जाने वाले मनोवैज्ञानिक युद्ध का कोई विशेष स्वागत नहीं किया गया। सन 1940 में अमरीकी कूटनीति में मनोवैज्ञानिक युद्ध जैसे शब्द का प्रचलन आरंभ हुआ था। उस समय लिखे गए एक लेख का यह शीर्षक था जिसके आधार पर मनोवैज्ञानिक युद्ध को इस प्रकार से परिभाषित किय गया था। मनोवैज्ञानिक युद्ध ऐसा युद्ध है जिसमें विशेष सेन्य लक्ष्य की प्राप्ति के अन्तर्गत सामने वाले पक्ष के मनोबल और व्यवहार को प्रभावित करने के लिए विभिन्न शैलियों को प्रयोग किया जाए।

सन 1950 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति दुमैन ने कोरिया में मनोवैज्ञानिक युद्ध आरंभ करने के उद्देश्य से “वास्वतिक युद्ध” नामक एक परियोजना शुरू की थी। इसके लिए 12 करोड़ 10 लाख अमरीकी डालर का बजट विशेष किया गया था। इस परियोजना के अन्तर्गत द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवों से लाभ उठाते हुए सैन्य टुकड़ियों के साथ ही साथ व्यापक स्तर पर मनोवैज्ञानिक युद्ध के लिए भी यूनिट बनाई गयी थीं।

हालांकि मनोवैज्ञानिक युद्ध जैसी शैली का प्रयोग अमरीका के एक विख्यात टीकाकार “जोज़फ़ नाए” द्वारा लिखे गए लेख के बाद अधिक प्रभावी ढंग से आरंभ हुआ। उन्होंने अपना लेख नर्मयुद्ध के शीर्षक के अन्तर्गत लिखा था। उनका यह लेख सन 1990 में अमरीकी पत्रिका फारेन पालिसी में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने अपने लेख में लिखा था कि संयुक्त राज्य अमरीका को बल प्रयोग करने के स्थान पर अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए दृष्टिगत देश या राष्ट्र के मेधावियों और उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों को प्रभावित करना चाहिए। इस लेख में जोज़फ़ ने लिखा था कि कूटनीति और नर्म युद्ध के माध्यम से हमें अपने दृष्टिगत क्षेत्र के मेधावियों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। इसके बाद उनके विचारों को स्मार्ट पॉवर का नाम देकर अमरीकी विदेश नीति में एक लाग्र किया गया।

सन 1991 में पूर्व सोवियत संघ के विघटन और शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही अमरीका के लिए नर्म युद्ध का महत्व अधिक स्पष्ट हुआ। अमरीकियों को पता चला कि विश्व के अन्य देशों में बिना हस्तक्षेप किये हुए बहुत कम ख़र्च से अपने सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद से अमरीकी, बहुत से दशों में नर्म युद्ध के माध्यम से अपने दृष्टिगत सत्ता परिवर्तित कर चुके हैं।

पूर्वी ब्लाक के कुछ देशों में आने वाली रंगीन क्रांतियां वास्तव में नर्म युद्ध का ही उदाहरण हैं। अमरीका ने नर्मयुद्ध का सहारा लेते हुए पोलैण्ड, जार्जिया, चेकस्लोवाकिया, क़िरक़ीज़िस्तान, यूक्रेन और ताजिकिसतान आदि देशों में सत्ता परिवर्तित की है। इन सभी देशों में बल प्रयोग के स्थान पर नर्मयुद्ध का ही प्रयोग किया गया जिसके माध्यम से वहां की सरकारें बदल दल गईं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद से विश्व की कूटनीति में नर्मयुद्ध या साफ़्टवार शब्द का प्रयोग अधिक होने लगा जिसके बाद उनको कई प्रकार से परिभाषित किया गया।

अमरीका के एक जानेमाने टीकाकार जान कॉलिन्ज़ ने इसको परिभाषित करते हुए लिखा है कि नर्मयुद्ध वह है जिसमें किसी सुनियोजित कार्यक्रम के अन्तर्गत बहुत ही प्रभावी ढंग से शत्रु के वैचारिक केन्द्रों को लक्ष्य बनाया जाता है। अमरीकी सेना के घोषणापत्र के अनुसार नर्म युद्ध का मुख्य उद्देश्य, शत्रु की आस्था, उसके मनोबल और और उसकी भावनाओं को प्रभावित करना है। या फिर किसी देश में मौजूद अपने मित्र और समर्थक गुटों तथा वहां के तटस्थ लोगों को इस प्रकार से तैयार करना कि समय पड़ने पर वे हमारा साथ दें। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि नर्मयुद्ध का मुख्य उद्देश्य यह है कि गुप्तचर, कूटनीतिक एवं सांस्कृतिक कार्यवाहियों पर आधारित गोपनीय एवं जटिल योजना के अन्तर्गत अपने दृष्टिगत देश में परिवर्तन कराया जाए। इस आधार पर नर्म युद्ध को मनोवैज्ञानिक युद्ध, सफेद युद्ध, संचार माध्यमों का युद्ध, नर्म क्रांति, नर्म सत्ता परिवर्त, मख़मली क्रांति या रंगीन क्रांति आदि कुछ भी कहा जा सकता है।

नर्म युद्ध में यह प्रयास किया जाता है कि किसी देश के महत्वपूर्ण केन्द्र जैसे वहां की शासन व्यवस्था की वैधता पर ही प्रश्न उठाया जाए और इस प्रकार उस देश की एकता, अखण्डता और सुरक्षा को ख़तरे में डाल दिया जाए। इसका अर्थ है उस देश की जनता में वहां की सरकार के प्रति अविश्वास उत्पन्न करना। जब किसी देश की जनता की दृष्टि में उस देश की सरकार की उपयोगिता को महत्वहीन सिद्ध कर दिया जाएगा तो फिर सरकार के प्रति जन समर्थन कम हो जाएगा और उसको गिराना सरल हो जाएगा।

नर्मयुद्ध या साफ्टवार के अन्तर्गत वास्तव में दो चीज़ों को लक्ष्य बनाया जाता है। एक मन और दूसरा हृदय। इसका उद्देश्य हृदयों को अपनी ओर मोड़ना है। नर्म युद्ध में यह प्रयास किया जाता है कि संबोधक को इस प्रकार से प्रभावित किय जाए कि वह अपनी प्राथमिकताओं को उसी रूप में ढाल ले जैसा सामने वाला पक्ष उससे चाहता है अर्थात सामने वाले की प्राथमिकताओं को वह अपनी प्राथमिकता समझने लगे। इस प्रकार नर्म युद्ध के माध्यम से बिना किसी हिंसक कार्यवाही के समाजों के मूल्यों पर हमला करके अपने आदर्शों को लोगों पर थोपा जाता है। नर्म युद्ध का मुख्य लक्ष्य, किसी देश की जनता के मन में यह भावना उत्पन्न करनी होती है कि वह अपनी व्यवस्था से असंतुष्ट हो जाए जिसके बाद वे स्वयं सरकार विरोधी कार्यवाहियों में सक्रिय हो सके।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने अपने एक भाषण में नर्म युद्ध की वास्तविकता की ओर संकेत करते हुए कहा था कि नर्म युद्ध का मुख्य लक्ष्य उसकी रणनीति में छिपा हुआ है। उन्होंने कहा कि लोगों के दिल व दिमाग़ में शक पैदा करना, आध्यात्म को मिटाना, अवसरों को धमकियों में बदलना, शासन के स्तंभों को कमज़ोर करना, लोगों के भीतर भ्रांतियां उत्पन्न करना, उनमें एक दूसरे के प्रति अविश्वास उत्पन्न करना और समाज में मतभेद पैदा करने जैसे काम नर्म युद्ध का लक्ष्य हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि वर्चस्ववादी शक्तियां, नर्म युद्ध के माध्यम से यह प्रयास करती हैं कि सामने वाले पक्ष को अपनी सोच जैसा बना लिया जाए ताकि शासन व्यव्सथा को बदलने के लिए न तो युद्ध की आवश्यकता हो और न ही सीधे हस्तक्षेप की, बल्कि यह लक्ष्य स्वयं वहां की जनता पूरा कर देगी जो उनके दृष्टिगत है।