Apr २६, २०१६ ०९:१६ Asia/Kolkata
  • अलमूत

अलमूत नगर, जो क़ज़वीन के उत्तर में एक पर्वतीय क्षेत्र है, इसी नाम के एक दुर्ग के कारण विख्यात है जो काफ़ी समय तक इस्माईली समुदाय के प्रमुख हसन सब्बाग़ और उनके उत्तराधिकारियों की सत्ता का मुख्यालय रहा है।

 यह दुर्ग, जो आशियानए उक़ाब या बाज़ के घोंसले के नाम से भी जाना जाता है, एक पहाड़ पर दो हज़ार एक सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। चारों ओर से दुर्ग खाइयों से घिरा हुआ है और इसमें प्रवेश का एकमात्र मार्ग उत्तर पूर्वी छोर पर है। इतिहास के विश्वस्त किताबों के अनुसार अलमूत दुर्ग का निर्माण वर्ष 246 हिजरी क़मरी में किया गया। पैग़म्बरे इस्लाम के वंशज हसन बिन ज़ैद अलवी के आदेश पर इस दुर्ग का निर्माण किया गया और वर्ष 483 हिजरी क़मरी में इस पर हसन सबाह का नियंत्रण हो गया और वर्ष 654 हिजरी क़मरी तक यह इस्माईली समुदाय के शासकों के नियंत्रण में रहा। इसी साल हलाकू ख़ान के आदेश पर इसे ध्वस्त कर दिया गया। मंगोलों ने इस्माईलियों द्वारा वर्षों तक अलमूत दुर्ग में एकत्रित की गई अत्यंत मूल्यवान पुस्तकों को भी प्राप्त कर लिया।

 

हलाकू ख़ान ने उस पुस्तकालय को जलाने का आदेश दिया किंतु ईरान के प्रख्यात इतिहासकार अता मलिक जुवैनी ने उस पुस्तकाल से अति मूल्यवान किताबों को अलग करने की अनुमति प्राप्त कर ली। इस प्रकार उन्होंने क़ुरआने मजीद की प्रतियों, प्राचीन किताबों और खगोल शास्त्र संबंधी यंत्रों को अलग कर लिया किंतु बाक़ी किताबें और पुस्तकालय के अन्य साधन आग में जल गए। इसके बाद अलमूत दुर्ग को निर्वासन क्षेत्र और कारावास के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। शाह तहमास्ब सफ़वी के शासन के आरंभिक काल तक दुर्ग का ढांचा सही सलामत था। बाद में इस पर गीलान व माज़न्दरान के शासकों का नियंत्रण हुआ और उन्होंने इसकी मरम्मत कराई। खेद के साथ कहना पड़ता है कि क़ाजार काल में ख़ज़ाने की तलाश में अलमूत दुर्ग में जो खुदाई हुई उसने इसे गंभीर क्षति पहुंचाई।

क्षेत्र में रहने वाले लोग अलमूत दुर्ग को क़िलए हसन भी कहते हैं कि जो दो भागों से मिल कर बना है। पश्चिमी भाग जो अधिक ऊंचा है बड़ा दुर्ग या ऊपरी दुर्ग कहलाता है। पूर्वी भाग को छोटा दुर्ग या निचला दुर्ग कहा जाता है। यह दुर्ग 120 मीटर ऊंचा जबकि इसकी चौड़ाई दस से पैंतीस मीटर के बीच है। चूंकि अतीत में इस दुर्ग में बहुत सारे लोग रह चुके हैं और उन्हें पानी की बहुत अधिक आवश्यकता रही है अतः क़िले का निर्माण करने वालों ने बड़े कलात्मक अंदाज़ में पानी के भंडार बनाए हैं और पहाड़ में बहने वाले नालों की सहायता से बहुत दूर से पानी को इन भंडारों तक पहुंचाया है। दुर्ग के पानी की मुख्य आपूर्ति, कलदर नामक सोते से होती थी जो इसके उत्तर में स्थित है।

 

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दुर्ग का पूर्वी भाग, सिपाहियों और उनके परिजनों के रहने का स्थान था। पश्चिमी भाग में पानी एकत्रित करने के तीन छोटे भंडार और कई कमरे थे जो अब खंडहर बन चुके हैं। ऊपरी व निचले दुर्ग के बीच एक मैदान है जिसके चारों और बनाई गई एक दीवार ने दुर्ग को दो भागों में बांट दिया है। मैदान के बीच में कुछ खंडहर दिखाई देते हैं जो इस स्थान पर कभी बनी हुई इमारतों के अवशेष हैं। दुर्ग के बुर्जों में से उत्तरी, दक्षिणी व पूर्वी छोरों पर तीन बुर्ज अब भी बाक़ी हैं जबकि उत्तरी छोर का बुर्ज अधिक ठीक स्थिति में है।

 

 

बुर्ज के प्रवेश द्वार पर छः मीटर लम्बी, दो मीटर चौड़ी और दो मीटर ऊंची एक सुरंग, पहाड़ों के पत्थरों के बीच बनाई गई है। इस सुरंग से गुज़रने के बाद दुर्ग का दक्षिणी बुर्ज और उसकी दक्षिणी दीवार, जो पत्थर की एक ढलान पर बनाई गई है, प्रकट हो जाती है। इस दीवार से गाज़ुर ख़ान का मैदान दिखाई देता है जो दुर्ग के दक्षिण में है। दुर्ग व बुर्जों के चारों ओर की दीवारों के पीछे एक और दीवार है जिसकी ऊँचाई आठ मीटर है और यह मुख्य दीवार के समानांतर बनाई गई है तथा इसकी चौड़ाई दो मीटर है। दुर्ग के निर्माण में पत्थर, चूने, ईंट, टाइल और पक्की मिट्टी का प्रयोग किया गया है।

 

 

लम्बसर दुर्ग, अलमूत दुर्ग के बाद इस्माईलियों का सबसे महत्वपूर्ण दुर्ग है। यह दुर्ग भी एक पहाड़ की ढलान पर बना हुआ है जिसके तीन ओर ख़तरनाक घाटियां हैं और उस समय की संभावनाओं के साथ इन घाटियों से ऊपर आना संभव नहीं था। दुर्ग की स्थिति इस प्रकार की है कि किसी भी ओर से आने वाले आक्रमणकारी सैनिकों को पीछे ढकेल दिया जाता था। पत्थरों को काट कर बनाए गए जल भंडार, दुर्ग के चारों ओर बनाई गई ऊंची एवं मज़बूत दीवारें, दुर्ग के दक्षिणी ओर के सभी क्षेत्रों पर भरपूर दृष्टि रखने की संभावना और बचे हुए बुर्ज, ये सभी लम्बसर दुर्ग के वैभव का पता देते हैं। ख़ाजा रशीदुद्दीन फ़ज़्लुल्लाह हमदानी की किताब जवामेउत्तवारीख़ में वर्णित है कि जब मलिक शाह सलजूक़ी के पुत्र सुल्तान मुहम्मद ने इस्माईलियों के विरुद्ध लड़ाई आरंभ की तो ग्यारह बरस तक अलमूत और लम्बसर दुर्गों का परिवेष्टन किए रखा किंतु इन दुर्गों के भीतर मौजूद लोगों ने आत्म समर्पण नहीं किया। हलाकू ख़ान के आक्रमण में भी इन दुर्गों के लोगों ने कई महीनों तक प्रतिरोध किया किंतु अंततः बीमारी फैल जाने के कारण वे हथियार डालने पर विवश हो गए।

 

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इस क्षेत्र में बहुत अधिक वर्षा और हिमपात के कारण कई कल-कल करती नदियां, शीतल जल के सोते, फलों के सुंदर बाग़, हरी-भरी घाटियां और लहलहाते खेत हैं। इस क्षेत्र का एक आकर्षण एवान झील है जो पर्वतों के बीच फ़ीरोज़ी रंग के नगीने के भांति दिखाई पड़ती है। एवान झील का पानी मीठा है और यह साढ़े पाँच हेक्टेयर के क्षेत्रफल पर फैली हुई है। इसकी अधिकतम लम्बाई 275 मीटर और चौड़ाई 225 मीटर है जबकि गहराई एक से ले कर बीस मीटर के बीच है। इस झील के पानी की आपूर्ति, उसके तल में मौजूद सोतों और वर्षा से होती है। इसके तल में जो सोते मौजूद हैं उनसे पानी के निरंतर निकलते रहने के कारण झील का पानी साफ़ होता रहता है।

 

झील का पानी इतना स्वच्छ है कि बड़ी सरलता से उसके तल को और तल में सोतों से उबलते पानी को देखा सकता है। झील को हर ओर से ऊँचे-2 जंगली पेड़, सुंदर मैदान और चैरी, हेज़लनट और अख़रोट जैसे फलों के पेड़ों ने घेर रखा है। इसी कारण इस झील में सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण है। इसके अतिरिक्त इस झील से एक छोटी एवं सुंदर सी नदी भी अस्तित्व में गई है जिससे निकट के गांवों में किसान लाभ उठाते हैं। इस झील के दक्षिण पश्चिम में स्थित एवान झरना भी प्रकृति का एक सुंदर उपहार है। जहां से झरना गिरना शुरू होता है और घाटी में जहां जा कर उसका पानी गिरता है, दोनों बिंदुओं को दृष्टिगत रखा जाए तो इसकी ऊँचाई तीन सौ मीटर से भी अधिक है। जब तेज़ धूप निकलती है और अलमूत में हवाएं चलने लगती हैं तो उस झरने पर अत्यंत सुंदर इंद्रधनुष देखने में आता है।

 

एवान झील, शीत ऋतु में भी बड़ी सुंदर लगती है और जब तापमान बहुत अधिक गिर जाता है तो इसके पानी पर बर्फ़ जम जाती है और फिर उस पर चहल क़दमी की जा सकती है बल्कि स्कीइंग भी की जा सकती है।

 

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क़ज़वीन प्रांत, प्राचीन समय से ही सुलेखन के बड़े-2 गुरुओं की जन्म स्थली रहा है। नस्तालीक़ लीपि के महान उस्ताद मीर एमाद हसनी, मीर मुहम्मद हुसैन एमादुल कुत्ताब क़ज़वीनी, मीरज़ा मुहम्मद अली ख़ियारजी क़ज़वीनी, अब्दुल मजीद तालेक़ानी और मलिक मुहम्मद क़ज़वीनी इत्यादि इस कला के बड़े नाम हैं। यही कारण है कि ईरान के इस्लामी संस्कृति व शिक्षा मंत्रालय एवं उच्च सांस्कृतिक परिषद ने क़ज़वीन को, ईरानी सुलेखन की राजधानी का नाम दिया है। क़ज़वीन में प्रतिवर्ष सुलेखन की कई प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं जिनमें इस कला में काम करने वाले पूरी दुनिया के प्रतिष्ठित लोग भाग लेते हैं। इसके अतिरिक्त क़ज़वीनी कलाकार, चित्रकला और हस्तकला में भी बहुत प्रख्यात हैं। क़ज़वीन की चित्रकारिता और मीनिएचर की कल, भौगोलिक सीमाओं को लांघ कर विश्व विख्यात हो चुकी है। क़ज़वीन में इसी प्रकार लकड़ी के काम, शीशे के काम, चूने के काम, और क़ालीन व दरी इत्यादि की बुनाई जैसी हस्तकलाएं बहुत पहले से प्रचलित हैं और इस क्षेत्र की यात्रा करने वाले सैलानियों के लिए अत्यंत रोचक हैं।