बाहूकलात नेश्नल पार्क
बलूची लोग आज़ाद, सच्चे, बहादुर, और कठिन परिश्रम करने वाले होते हैं।
ब्लूचिस्तान के लोग प्रतिरोधी और दूरदर्शिता वाले होते हैं और कम से कम सुविधाओं में भी ख़ुश रहते हैं। कठिनाईयों का सामना करने में ईरान का कोई भी क़बीला उनका मुक़ाबला नहीं कर सकता।
ऊंट की सवारी, निशानेबाज़ी, शिकार और भाग दौड़ में ब्लूची अद्वितीय होते हैं। वे दिखावा से दूर, साफ़ और सीधी बात करने वाले होते हैं, और अपनी बात पर अटल रहते हैं। वे धार्मिक मान्यताओं को बहुत महत्व देते हैं। मेज़बानी में उनके जैसा कोई नहीं होता।
पुरातत्व वेटाओं के अनुसार, ब्लूची आर्यन वंश से हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक़, प्राचीन समय में आर्यन मध्य एशिया में सिर दरिया और आमू दरिया के बीच जीवन व्यतीत करते थे। लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व कुछ कारणवश उन्होंने वहां से पलायन किया और अलग अलग समूहों में वे विभिन्न इलाक़ों की ओर कूच कर गए और वहीं बस गए। उन्हीं में से एक समूह बल्ख़ और उसके आसपास के इलाक़ों में पहुंचा और वर्तमान ईरान के पूर्वी एवं उत्तर पूर्वी इलाक़ों में बस गया, उसके बाद इनमें से कुछ लोग ईरान के पश्चिम की ओर चले गए और विभिन्न क़बीलों में विभाजित हो गए।
हख़ामनी शासकों ने अधिकांशत उन इलाक़ों को अपने निंयत्रण में ले लिया जहां यह क़बीले रहते थे। दारयुश के काल के शिलालेखों में उसके निंयत्रण वाले इलाक़ों में पार्त, ख़्वारेज़्म, बल्ख़ और सनद के नामों का उल्लेख है। निःसंदेह ब्लूची समुदाय आर्यन है और वह उत्तरी इलाक़ों से होता हुआ दक्षिण पहुंचा। ब्लूचियों के लहजे का पहलवी अश्कानी और पहलवी सासानी से निकट होना इस दृष्टिकोण की पुष्टि करता है।

विशेषज्ञों द्वारा अब तक जो शोध और किए गए हैं, उनसे पता चलता है कि ब्लूची क़बीले समेत समस्त क़बीलों की शारीरिक विशेषताएं आर्यनों की शारीरिक विशेषताओं की भांति हैं और ब्लूच समुदाय भी अन्य ईरानी जातियों की भांति आर्यन हैं। आक्रमणकारियों और भारतवर्ष से निकट होने के बावजूद, इस समुदाय ने अपनी सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय विशेषताओं को अच्छी तरह सुरक्षित रखा है।
ब्लूची भाषा फ़ारसी भाषा की समृद्ध शाखाओं में से है, और यह मौखिक साहित्य से माला माल है। ईरान के इस इलाक़े का साहित्य जनजातियों और ख़ानाबदोशों की संस्कृति से निकट होने के कारण सादा और समृद्ध है। ब्लूची ज़बान की शायरी बहुत प्राचीन है और जनजातियों के जीवन से प्रभावित है तथा इस समुदाय की संस्कृति एवं इतिहास के स्थानांतरण का साधन है। ब्लूची लोग, युद्ध, जन्म, मृत्यु और ऐसी ही अन्य घटनाओं के लिए शेर पढ़ते हैं, यह कविताएं या शेर एक सीने से दूसरे सीने में स्थानांतरित होकर एक वंश से दूसरे वंश तक पहुंचे हैं। ब्लूचियों की शायरी महाकाव्य के रूप में लोगों के बीच प्रचलित है, जिसमें क़बीलाई युद्धों का इतिहास और योद्धाओं की प्रशंसा होती है और वह जीवन के दुखों और ख़ुशियों में साथी बनती है। ईरानी ब्लूच अपने क्षेत्रीय साहित्य से प्रेम करते हैं। उनके समारोहों में वे धार्मिक हों या पारम्परिक शायरी का बहुत महत्व होता है।
अधिकांश संगीत विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के विभिन्न इलाक़ों का संगीत या लोक संगीत कि जो लोगों की भावनाओं का दर्पण होता है, विश्व के सुंदरतम एवं विविध संगीतों में से एक है। यह विविधता ईरानी रीति रिवाजों और संस्कृति की देन है। हर एक ईरानी जनजाती क़बीले का इलाक़े और वहां की जलवायु के मुताबिक़ विशेष संगीत है।
लोक संगीत, परिश्रमिक एवं सीधे सादे लोगों के जीवन का सारांश होता है कि जो अपने गांवों और इलाक़ों में बहुत ही सादा जीवन व्यतीत करते हैं। लोक संगीत का निर्माता वास्तव में पूरा समुदाय होता है। सबसे सुन्दर बिंदु यह है कि ईरान के विभिन्न इलाक़ों के संगीत में एक प्रकार का परस्पर संबंध पाया जाता है।
ब्लूचिस्तान का संगीत पूरब के जाने माने एवं प्राचीन संगीतों में से एक है। इस इलाक़े का संगीत यद्यपि अपनी विशेषता रखता है लेकिन इसके बावजूद भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और ख़ुरासान से काफ़ी निकट है।
ब्लूचिस्तान इलाक़े की विविध एवं ज़िद्दी सुन्दर प्रकृति ने ऐसे संगीत को जन्म दिया है कि जिसमें जोश और ख़रोश के साथ साथ बहुत गहराई भी है। इस संगीत से इंसान और सृष्टिकर्ता के बीच का रिश्ता बहुत मज़बूत होता है। ब्लूची संगीत के बारे में कहा जा सकता है कि यह जनता के जीवन का अभिन्न अंग है और यह जन्म से मृत्यु तक लोगों के जीवन में शामिल रहता है।
ब्लूची संगीत का एक भाग शायरी है। इस शायरी में महाकाव्य, भावनात्मक और ऐतिहासिक एवं सामाजिक विषयों का उल्लेख होता है, वास्तव में एक प्रकार से संगीत के साथ कहानी होती है। ब्लूचिस्तान में उस व्यक्ति को कवि कहा जाता है कि जो शेर को संगीत के साथ गाता है न कि केवल कविताएं लिखता है।

अतीत में ब्लूची शायर न केवल ऐतिहासिक एवं वीरता की घटनाओं को बयान करते थे बल्कि स्वयं भी घटना को प्रभावित करते थे।
यह जानना उचित होगा कि ब्लूची लोग विभिन्न अवसरों पर विभिन्न शेर गाते हैं जिनके विभिन्न नाम होते हैं। उदाहरण स्वरूप, जो शेर सगे संबंधियों की जुदाई और वतन से दूरी के ग़म में गाए जाते हैं उन्हें लीकू और ज़ोहीरुक कहते हैं।
ब्लूची शायरी क्योंकि काफ़ी विस्तृत है इसलिए ईरानी साहित्य का ख़ज़ाना मानी जाती है। अधिकतर ब्लूची गीत विवाह समारोहों और धार्मिक समारोहों में संगीत के साथ गाए जाते हैं।
बाहूकलात नदी जलग्रह, दक्षिण पूर्वी ब्लूचिस्तान के अंत में स्थित है। यह इलाक़ा पूर्व में पाकिस्तान, दक्षिण में ओमान सागर, पश्चिम और उत्तर में अन्य नदियों के जलग्रहों से घिरा हुआ है। बाहूकलात नदी इलाक़े के जंगलों से होते हुए गवातर खाड़ी में जाकर गिरती है। इस पूरे इलाक़े का क्षेत्रफल 30,000 वर्ग किलोमीटर है कि जिसमें से 7,000 हज़ार वर्ग किलोमीटर में जंगल और बाक़ी इलाक़ा पहाड़ी है।
बाहूकलात क्षेत्र वन्नीय जीवन के महत्व विशेषकर इस नदी में मगरमच्छों के होने के कारण इस क्षेत्र को नेश्नल पार्क के रूप में विकसित किया गया है। इस इलाक़े की नमी के स्रोतों के भिन्न होने के कारण, जो ओमान सागर और हिंद महासागर हैं, बाहूकलात में होने वाली वर्षा ईरान भर यहां तक कि उत्तरी ब्लूचिस्तान से भी भिन्न है। इस इलाक़े के वन्नीय जीवन की विशेषताओं में वहां मगरमच्छों का होना है कि जो इलाक़े में छोटे थूथन वाले मगरमच्छों के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार के मगरमच्छ या तो दुनिया भर में समाप्त हो गए हैं या उनकी संख्या बहुत ही कम संख्या बाक़ी रह गई है।
इसी के साथ इस इलाक़े के पर्यावरण की अपनी विशेषताएं हैं और वहां कई प्रकार के जानवर एवं वनस्पतियां पायी जाती हैं जो ईरान के दूसरे इलाक़ों में नहीं हैं। इसलिए यह इलाक़ा वन्नीय एवं पर्वतीय जानवरों के बारे में शोध करने के लिए एक उचित स्थान है। बाहूकलात नदी के इलाक़े में वनस्पतियों की मात्रा बहुत अधिक है।