करज नगर
करज नगर, तेहरान के पश्चिमोत्तर में 48 किलोमीटर की दूरी पर तथा की सतह से 1297 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
यह नगर अलबुर्ज़ पर्वत श्रंखला के केन्द्र में स्थित है। वर्ष 1312 हिजरी शम्सी अर्थात 1933 में कैस्पियन सागर के तट पर तेहरान-करज हाईवे और इसी प्रकार पश्चिमी क्षेत्र में क़ज़वीन, हमदान, तबरीज़ और ज़ंजान के मध्य हाईवे के निर्माण से करज नगर संपर्क के एक महत्त्वपूर्ण साधन में परिवर्तित हो गया। करज के तेहरान से निकट होने के कारण, इस नगर में और तेहरान-क़ज़वीन राजमार्ग में औद्योगिक प्रतिष्ठानों और कारख़ानों के निर्माण की भूमिका समतल हुई है और इसी कारण करज की ख्याति दिन प्रतिदिन बढ़ती जा जा रही है।
इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद, इस नगर ने बहुत तेज़ी से प्रगति की और इस प्रकार से कि आज करज़ औद्योगिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक, चिकित्सा संबंधी और मनोरंजन के क्षेत्र में प्रसिद्ध और जाना पहचाना नाम समझा जाता है और आज के समय में करज ने इतनी ख्याति प्राप्त कर ली है कि पिछले कई दशक की तुलना, आज के करज से नहीं की जा सकती। तेहरान के बाद करज ईरान का दूसरा सबसे बड़ा नगर है जहां पलायनकर्ताओं की संख्या अधिक है और ईरान के अन्य नगरों की तुलना में इस नगर की जनसंख्या के युवा होने के दृष्टिगत, इसे ईरान के नये बड़े नगरों में गिना जाता है। वर्तमान समय में तेहरान, मशहद, इस्फ़हान और तबरेज़ के बाद करज जनसंख्या की दृष्टि से ईरान का पांचवा नगर समझा जाता है। करज और उसके आस पास के क्षेत्रों की जलवायु बहुत संतुलित है जिसके कारण तेहरान के बहुत से नागारिक छुट्टियां बिताने करज जाते हैं। करज की मनोरम और ठंडी जलवायु तथा सुन्दर प्राकृतिक स्थलों के पाये जाने की वजह से पर्यटकों के लिए बहुत ही बेहतरीन स्थान समझा जाता है। इन सब के अतिरिक्त इस नगर के प्राकृतिक आकर्षणों व मूल्यवान धरोहरों ने इसकी सुन्दरता में चार चांद लगा दिए है। आइये कार्यक्रम के इस भाग में इस नगर की प्राकृतिक धरोहरों के बारे में जानते हैं।

शाह अब्बास के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक पुल की जिसे कई स्थानों पर पुले दुख़तर भी कहा जाता है, लंबाई लगभग साठ और चौड़ाई आठ मीटर है और इसका निर्माण नगर के प्रवेश द्वार पर तथा करज नदी पर किया गया है। इस पुल के दो प्रवेश द्वार हैं जो एन्जेलीका ईंट और गारे व चूने से मिलकर बना है। इन दोनों प्रवेश द्वार के बीच में काज़ारी शासन काल के दौर का एक दो मंज़िला कमरा है जिसे प्रकाशन केन्द्र या मनोरंजन स्थल के रूप में प्रयोग किया जाता है। विभिन्न यात्रा वृतांतों और ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि यह पुल इतिहास के विभिन्न कालों में मौजूद था किन्तु सफ़वी शासन काल में संपर्क को विस्तृत करने के उद्देश्य से मौजूद रूप में अस्तित्व में आया अलबत्ता बाद के कालों में भी इस इमारत में विभिन्न परिवर्तन और निर्माण कार्य हुए। इस इमारत को वर्ष 2001 में ईरान की राष्ट्रीय धरोहर की सूची में पंजीकृत कर लिया गया और वर्ष 1330 हिजरी शम्सी के बाद इस ऐतिहासिक पुल से आने जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उसके साथ ही ईरानी इन्जीनियरों ने पत्थर का एक अन्य पुल बना दिया अलबत्ता इस दूसरे पत्थर के पुल को भी जो बहुत मज़बूत और प्राचीन है, ईरान की सांस्कृतिक धरोहर में पंजीकृत कर लिया गया।
करज में शाह अब्बासी के करावांसरा की इमारत पत्थर और ईंट से बनी हुई है जिसका क्षेत्रफल तीन हज़ार वर्गमीटर है। यह कारवांसरा सफ़वी शासन काल से संबंधित है और इसका निर्माण 1078 से 1109 हिजरी क़मरी के मध्य के वर्षों में शाह सुलैमान सफ़वी के काल में हुआ। यह इमारत अलबुर्ज़ प्रांत में करज के केन्द्रीय भाग में स्थित है। आरंभ में इस इमारत का निर्माण, कारवां के रुकने और उसमें शामिल लोगों के विश्राम के लिए किया गया था और काजारी शासन काल के आरंभिक वर्षों में इसे सैन्य छावनी में परिवर्तित कर दिया गया और काजारी शासन काल के अंतिम वर्षों में इसे फ़लाहत शिक्षा केन्द्र में परिवर्तित कर दिया गया।
कारवांसरा का प्रवेश द्वार उत्तरी भाग में स्थित है और इसके प्रांगड़ का क्षेत्रफल नौ सौ वर्ग मीटर है। इसमें यात्रियों के विश्राम के लिए 21 कमरे बने हुए हैं तथा कारवां के सामानों को रखने और कारवां की रक्षा पर तैनात सैनिकों के विश्राम के लिए पांच कमरे बने हुए हैं। इस इमारत के निर्माण में पत्थर, ईंट, लकड़ी और भूसा मिश्रित मिट्टी का प्रयोग किया गया है। वर्ष 1977 में शाह अब्बासी कारवांसरा को ईरान की राष्ट्रीय धरोहर की सूची में पंजीकृत कर लिया गया।
करज कृषि संकाय, कृषि विज्ञान और इस विषय के बारे में सबसे समृद्ध केन्द्र समझा जाता है जिसे करज के प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहर के रूप में राष्ट्रीय धरोहर की सूची में पंजीकृत किया गया। ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि वर्ष 1302 हिजरी शम्सी में तेहरान विश्व विदयालय के कृषि संकाय और करज में ग्रामीण उद्योग और फ़लाहत हाई स्कूल का गठन किया गया, यह स्कूल वर्ष 1328 हिजरी शम्सी में तेहरान विश्वविद्यालय के एक संकाय में परिवर्तित हो गया।
करज कृषि संकाय के कई विभाग हैं और इसमें मरुस्थल के संबंध में शोध के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय शोध केन्द्र है। सुलैमानिया महल, जानवरों की पहचान के बारे में एक संग्राहलय और ईरान में पहले वन संरक्षण विभाग के गठनकर्ता उस्ताद करीम साई के मक़बरे जैसे बहुत से एतिहासहिक और पर्यटन स्थल इस इमारत में मौजूद हैं।
करज का सुलैमानिया महल ईंट से बना हुआ है जिसकी छत ढलुआ और इसे पूर्ण काजारी वास्तुकला की शैली से बनाया गया है जिसे अपने काल की सबसे सुन्दर, सबसे साधारण और सबसे अच्छी इमारत कहा जा सकता है। इस इमारत के निर्माण में ईंट, गीली मिट्टी तथा लकड़ी की बल्लियों का प्रयोग किया गया है। इमारत का भीतरी भाग और इसके हाल की दीवारों पर बहुत ही सुन्दर ढंग से रंग किए गये हैं तथा दीवारों और छत पर विभिन्न प्रकार के रंग और आईनाकारी के साथ सुन्दर प्लास्टर आफ़ पैरिस का बहुत ही सुन्दर ढंग से इस्तेमाल किया गया है।
सुलैमानिया महल दो मंज़िला है। पहले मंज़िले के कुछ भाग को महल के सेवा कार्यों से विशेष कर दिया गया है जबकि दूसरे मंज़िल पर पहुंचने के लिए अलग अलग दिशाओं में दो सीढ़ियां बनी हुई हैं। दूसरे मंज़िले पर एक केन्द्रीय बड़ा हाल और दोनों ओर कमरे बने हुए हैं जिसे विश्राम के उद्देश्य से बनाया गया है। इस इमारत की सबसे रोचक बात इसका बाहरी वातावरण है, इस प्रकार से कि इमारत में लगी बड़ी और कम चौड़ी खिड़कियों के कारण अंदर से बाहर और बाहर से अंदर के मनोरम और सुन्दर दृश्यों को बड़ी सरलता से देखा जा सकता है, इन्हीं खिड़कियों के कारण हाल में पूरे दिन प्रकाश रहता है और इसके कारण इमारत का भीतरी वातावरण प्रकाशमयी रहता है।

इस इमारत की बनावट बहुत साधारण है और साथ ही इमारत में मौजूद समस्त प्रतीक, वातावरण, गुंबद और सीढ़ियां, इमारत के केन्द्रीय भाग के बहुत अनुरूप है। सुलैमानिया महल की इमारत, काजारी शासन काल की मूल्यवान धरोहर है और राजधानी तेहरान के दृष्टिगत करज पर सबसे अधिक ध्यान दिया गया और यही इस क्षेत्र के विकास और प्रगति का कारक बनी। इस प्रकार से कि काजार शासन काल के अंतिम वर्षों में करज में फ़लाहत स्कूल का निर्माण हुआ और उसके कुछ अंतराल के बाद सुलैमानिया महल के निकट कृषि संकाय की पहली इमारत बनी जो वर्तमान समय में चर्मपूरण संग्रहालय की इमारत के नाम से प्रसिद्ध है। चर्मपूरण या टैक्सीडर्मी अर्थात मृत प्राणियों को सुरक्षित रखने तथा उन्हें जीवित सदृश व्यवस्थित कर के प्रदर्शित करने की एक विधि है।
करज और उसके उपनगरीय क्षेत्रों में बहुत से धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं जिनके दर्शन करने के लिए प्रतिदिन हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होते हैं। इन धार्मिक स्थलों में से एक इमाम ज़ादे हसन का मक़बरा है जो करज कृषि संकाय के निकट नगर के केन्द्र में स्थित है। इस मक़बरे के प्रवेश द्वार पर जो शिलालेख लगा हुआ है उसके अनुसार इस इमारत का निर्माण 1500 ईसवी में शाह तहमास्ब सफ़वी के आदेशानुसार किया गया था।
इमाम ज़ादे हसन की इमारत भीतर से चौकोर है जिसके हर छोर पर एक ताक़ बना हुआ है। इमारत के भीतरी भाग में कोई विशेष सजावट नहीं है और केवल ईंट और कुछ स्थानों पर चूने की पुताई देखी जा सकती है। इमारत का बाहरी भाग भी गोल चौकोर और बहुत ही साधारण ढंग से बना हुआ है। कुल मिलाकर इस इमारत के विस्तृत भीतरी वातावरण के दृष्टिगत छत बिठाने की शैली बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इमाम ज़ादे हसन के मक़बरे की इमारत के बाहरी भाग में भूसा मिट्टी का प्रयोग किया गया है किन्तु इसमें बने लुभावने और आकर्षक ताक़ों को भलिभांति देखा जा सकता है।

इमाम ज़ादे ताहिर करज का मक़बरा जो ईरान के बहुत से प्रसिद्ध समकालीन कलाकारों और शायरों के दफ़न होने का स्थान है, एक अन्य पर्यटन व ऐतिहासिक स्थल है।
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