ख़ुरासाने रज़वी
पवित्र मशहद एक ऐसी सरज़मीन है कि जहां पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अहले-बैत (अ) के एक सदस्य हज़रत इमाम अली रज़ा (अ) का रौज़ा ईरान में किसी हीरे की भांति चरमक रहा है।
ख़ुरासाने रज़वी प्रांत, ईरान के पूर्वोत्तर में स्थित है। 1383 हिजरी शम्सी में ख़ुराना प्रांत तीन भागों में विभाजित हो गया, जिसके परिणाम स्वरूप ख़ुरासाने रज़वी का निर्माण हुआ। इस प्रांत का कुल क्षेत्रफल 127432 वर्ग किलोमीटर है। उत्तर में इसकी सीमा तुर्कमेनिस्तान गणराज्य, उत्तर पश्चिम में ख़ुरासाने शुमाली, पूरब में अफ़ग़ानिस्तान, दक्षिण में ख़ुरासाने जुनूबी और पश्चिम में यज़्द और सेमनान प्रांतों से मिलती है। इस प्रांत का केन्द्रीय शहर मशहद समुद्री सतह से 970 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस प्रांत के महत्वपूर्ण शहरों में नीशापूर, सब्ज़वार, काश्मर, तुर्बत जाम और सरख़्स का नाम लिया जा सकता है।
ख़ुरासाने रज़वी प्रांत भोगौलिक दृष्टि से दो भागों उत्तर और दक्षिण में बटा हुआ है। उत्तरी भाग में उपजाऊ ज़मीनें हैं, जबकि दक्षिणी भाग रेगिस्तानी इलाक़ा है, और वहां छोटे छोटे टीले हैं। इस इलाक़े में अनेक पर्वतीय श्रंखलाएं हैं। हज़ार मस्जिद और बीनादलूद पर्वतीय श्रंखलाएं अन्य पहाड़ों से ऊंचे और लम्बे हैं।
जलवायु की दृष्टि से यह प्रांत उत्तर के संतुलित इलाक़े में स्थित है। यहां आम तौर पर तापमान में बदलाव होता रहता है और उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ने पर तापमान में वृद्धि होती है, लेकिन बारिश में कमी होती है। ख़ुरासाने रज़वी के विभिन्न इलाक़ों की जलवायु में विविधता पायी जाती है। पर्वतीय आंचलीय इलाक़ों में मौसम नर्म, दक्षिणी इलाक़ों में गर्म और ख़ुश्क और क़ूचान, दक्षिणी बीनालूद के आसपास के इलाक़ों, हज़ार मस्जिद के ऊंचे इलाक़ों और मशहद ज़िले के कुछ भाग में मौसम संतुलित रहता है। प्रांत की सबसे ऊंचा स्थान बीनालूद चोटी है कि जिसकी ऊंचाई 3615 मीटर है। प्रांत का सबसे नीचा स्थान सरख़्स में है कि जो समुद्र की सतह से 299 मीटर ऊंचा है।
तूस, नीशापूर और सब्ज़वार ख़ुरासाने रज़वी के पुराने एवं ऐतिहासिक इलाक़े हैं। इन इलाक़ों ने इस्लाम से पहले और उसके बाद ईरानी इतिहास और संस्कृति में अहम भूमिका निभाई है। वहां के लोग फ़ार्सी, तर्की और कुर्दी भाषाएं बोलते हैं। मशहद और कुछ दक्षिणी शहरों में बहुत कम संख्या में अरब भाषी भी रहते हैं।

ईरान के पूरबी भाग में ख़ुरासाने रज़वी एक महत्वपूर्ण इलाक़ा है। इस क्षेत्र में ख़ुरासाने रज़वी को सामाजिक, आर्थिक और देश के महत्वपूर्ण सांस्कृति केन्द्रों में से एक माना जाता है। इमाम अली रज़ा (अ) के रौज़े के कारण इस प्रांत का एक विशेष महत्व है। इसके अलावा तुर्कमेनिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान का पड़ोसी होने के कारण यहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। प्राचीन काल में ख़ुरासान में कृषि एवं हैंडीक्राफ़्ट का बड़ी मात्रा में उत्पादन किया जाता था। राष्ट्रीय स्तर पर ख़ुरासान प्रांत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में कृषि उत्पाद, केसर, किशमिश और जानवरों की खालें थीं। इस प्रांत में ऊपजाऊ ज़मीनों और पानी की उपलब्धि के कारण अर्ध ग्रीष्म इलाक़ों और गर्म इलाक़ों में पैदा होने वाली वस्तुओं जैसे कि अख़रोट, बादाम, नाशपाती, पिस्ता और खजूर इत्यादि का उत्पादन होता है।
इसी प्रकार, ख़ुरासान में पशुपालन का भी काफ़ी रिवाज है। हैंडीक्राफ़्ट के लिए भी ख़ुरासाने रज़वी को पहचाना जाता है। हैंडीक्राफ़्ट उत्पादों में से फ़िरोज़ा और जानवरों की खालों एवं क़ालीन की बुनाई का नाम लिया जा सकता है। कोयला, तांबा, लोहा, मैंगनीज़, फ़ायरकिले, मेनिनजाइटिस, सफ़ैद मिट्टी, संगे मरमर और चूना इत्यादि भी इस प्रांत में पाए जाते हैं।
अपने पुराने इतिहास के कारण इस प्रांत में अनेक ऐतिहासिक धरोहर मौजूद हैं। सांस्कृतिक धरोहर संस्था के अनुसार, ख़ुरासाने रज़वी में 903 सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर पाए जाते हैं। इन धरोहरों को ईरान के राष्ट्रीय धरोहरों की सूची में पंजीकृत कर लिया गया है।
ख़ुरासाने रज़वी प्रांत में अधिकांश ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण इमारतें और मक़बरे हैं। मक़बरा उस इमारत को कहते हैं कि जिसे किसी धार्मिक हस्ती की क़ब्र पर बनाया जाता है। इस इमारत में सामान्य रूप से क़ब्र के ऊपर इमारत बनाई जाती है। इसके अलावा मस्जिद, मदरसा, पुस्तकलाय, मुसाफ़िरख़ाना जैसी इमारतें भी मक़बरे की इमारत समूह में शामिल होती हैं। इस प्रकार की इमारतों के विस्तार का धर्म और धार्मिक हस्ती के सम्मान से सीधा संबंध होता है। इमाम रज़ा (अ) के रौज़े जैसी इमारतों ने शहरों के निर्माण और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह इमारतें धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप में भी प्रयोग होती हैं। इमाम रज़ा (अ) का हरम अर्थात रौज़ा इस्लामी जगत की एक विशाल एवं सुन्दर इमारतों में से एक है। इसके कारण ख़ुरासाने रज़वी धार्मिक पर्यटन के एक मुख्य इलाक़े में परिवर्तित हो गया है।
इमाम रज़ा (अ) का रौज़ा वास्तुकला का एक अद्वितीय नमूना है। इस इमारत और अन्य धार्मिक इमारतों के कारण ख़ुरासाने रज़वी प्रांत वास्तुकला के आकर्षण का केन्द्र बन गया है।

सन् 202 हिजरी क़मरी में तूस के सनाबाद नामक इलाक़े में इमाम अली रज़ा (अ) के दफ़्न होने के बाद मशहद शहर की बुनियाद पड़ी। सातवीं हिजरी क़मरी में जब तूस मंगोलो के हाथों नष्ट हो गया, तो वहां के नागरिकों ने मशहद का रुख़ किया और इस प्रकार धीरे धीरे इस शहर की जनसंख्या में वृद्धि होती गई।
मशहद और तूस के संयुक्त इतिहास के मद्देनज़र पहले हम तूस शहर के इतिहास पर एक नज़र डाल रहे हैं। ईरान की राष्ट्रीय कहानियों में उल्लेख है कि तूस शहर की बुनियाद काल्पनिक राजा जमशेद ने रखी थी। यह शहर सासानियों के काल में मौजूद था। सुन्नी मुसलमानों के तीसरे ख़लीफ़ा उस्मान ने तूस को फ़तह कर लिया और इसे इस्लामी सीमाओं में शामिल कर लिया। 421 हिजरी से सल्जूक़ियान ने धीरे धीरे ख़ुरासान के महत्वपूर्ण शहरों में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया, यहां तक कि 465 हिजरी में मलिक शाह तूसी ने तूस को अपने वज़ीर ख़्वाजा निज़ामुल मुल्क तूसी के अधिकार में दे दिया। 548 हिजरी में सुल्तान संजर सल्जूक़ी पर वियज प्राप्त करने के बाद ग़ुज़ क़बीले ने तूस समेत प्रांत के बड़े शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया।
इलख़ानान और तैमूरियान के दौर में अपनी संवेदनशीलता एवं विशेष स्थिति के कारण तूस पर विभिन्न शासकों का क़ब्ज़ा होता रहा। 791 हिजरी में इस शहर के लोगों के विद्रोह के बाद उनका नरसंहार किया गया और उस ज़माने की रिवायत के अनुसार, शहर के दरवाज़ों पर मरने वालों के सिरों की मीनार बनाई गई। 807 हिजरी में अमीर तैमूर का बेटा शाहरुख़ मिर्ज़ा तख़्त पर बैठा। उसके शासनकाल में तूस शहर का ख़ूब विकास हुआ। शाहरूख़ के शासनकाल के बाद मशहद शहर को जो महत्व प्राप्त हुआ और इमाम रज़ा (अ) से तैमूरी शासकों के प्रेम के कारण तूस नाम की प्रसिद्धि कम होती गई। यहां तक कि नवीं हिजरी के दूसरे अर्ध काल के बाद से इतिहास की किताबों में तूस का नाम नहीं मिलता है और अगर कभी उसका उल्लेख भी हुआ है तो उसे मशहद के उपनगर के रूप में पेश किया गया है। नवीं हिजरी के बाद से क्योंकि तूस का कोई विकास नहीं हुआ और उसके नागरिक मशहद की ओर पलायन कर गए। पुराने तूस शहर में खंडरों के अलावा कुछ नहीं बचा है। लेकिन ईरान के प्रसिद्ध कवि फ़िदौसी के मक़बरे कारण नया तूस एक महत्वपूर्ण इलाक़ा माना जाता है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वर्तमान मशहद शहर का इतिहास, पुराने तूस शहर के इतिहास से जुड़ा हुआ है। इमाम रज़ा (अ) के पवित्र रौज़े के कारण इसके ऐतिहासिक महत्व में आसामान्य वृद्धि हुई है। इसी कारण यह शहर दुनिया भर के शियों यहां तक कि सुन्नी मुसलमानों की ज़ियारत का केन्द्र बन गया है। मशहद ईरान का एक बड़ा एवं प्रसिद्ध शहर है। इस शहर में इमाम रज़ा (अ) के अलावा अन्य चीज़ें भी देखने योग्य हैं।