मशहद नगर
पवित्र नगर मशहद ईरान के ख़ुरासान रज़वी प्रांत का एक महत्वपूर्ण शहर है जो इस प्रांत की राजधानी है।
२८८ वर्ग किलोमीटर इस नगर का क्षेत्रफल है। यह ईरान के पूर्वोत्तर में बीनालूद एवं हज़ार मस्जिद पर्वत श्रंखलाओं के मध्य स्थित है। समुद्र की सतह से इस नगर की ऊंचाई लगभग १०५० मीटर है। राजधानी तेहरान से मशहद दूरी ९६६ किलोमीटर है। इस नगर की जनसंख्या तीस लाख से अधिक है। जनसंख्या की दृष्टि से मशहद राजधानी तेहरान के बाद ईरान का दूसरा सबसे बड़ा नगर है। इतिहासिक धरोहरों और पर्यटन आकर्षणों की दृष्टि से यह ईरान के समृद्ध नगरों में से एक है। विश्व के कोने कोने से श्रृद्धालु एवं पर्यटक हर वर्ष इस नगर की यात्रा पर आते हैं। हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का पावन मज़ार इसी नगर में स्थित है जिसके दर्शन के लिए देश विदेश से लाखों लोग प्रतिवर्ष यहां आते हैं। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार को इस नगर की सबसे मूल्यवान एतिहासिक धरोहर समझा जाता है।
कहते हैं कि दूसरी हिजरी क़मरी में सनाबाद नौग़ान नामक गांव में एक सुन्दर बाग़ था। इसमें सरकारी व्यक्तियों के स्वागत के लिए अच्छी अच्छी इमारतें एवं हाल बनाये गये थे। २०३ हिजरी क़मरी में जब अब्बासी ख़लीफ़ा मामून ने हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को शहीद कर दिया तो आम जनमत के ध्यान को भटकाने के लिए उसने नौग़ान के बाग़ में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को दफ्न कर दिया जिसके बाद से वह स्थान विश्व के समस्त लोगों विशेषकर शीयों के लिए पवित्र स्थल में परिवर्तित हो गया।
हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का पवित्र मज़ार इस्लामी जगत में पवित्रतम स्थलों में से एक है। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार के पास लगभग २५ महत्वपूर्ण एतिहासिक इमारतें हैं जो सैकड़ों वर्ष पुरानी हैं। उनमें से हर इमारत अपने समय की वास्तुकला की गाथा सुनाती है। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की पावन समाधि के पास शेख बहाई, शेख तबरसी और शेख हुर्रे आमेली जैसे इस्लामी जगत के प्रसिद्ध विद्वानों की क़ब्रें हैं।

तीसरी हिजरी क़मरी में हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार के निर्माण के बारे में कोई सूक्ष्म जानकारी नहीं है। इस संबंध में केवल इतनी जानकारी मोजूद है कि यहां पर तीसरी और चौथी हिजरी क़मरी में एक मज़बूत दीवार थी और वह स्थान मुसलमानों के लिए एक दर्शन स्थल था। ६ठीं हिजरी क़मरी में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की पावन समाधि के ऊपर एक नई इमारत बनाई गयी। अलबत्ता इतिहासिक पुस्तकों में इसका वर्णन नहीं मिलता। ५४८ हिजरी क़मरी में केन्द्रीय एशिया की एक जाति ग़ुज़्ज़ा ने ईरान पर आक्रमण किया था जिसके दौरान इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की पावन समाधि पर बनी इमारत को कोई विशेष क्षति नहीं पहुंची थी। उस समय यह स्थल पीड़ित लोगों का एकमात्र शरणस्थल था।
हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार में टाइलों का जो अतिसुन्दर काम हुआ है वह ख़ारेज़्मी शाही काल की कला और नवनिर्माण का सूचक है। बड़े सौभाग्य की बात की है कि जब मंगोलों ने ईरान पर हमला किया तो इस देश के दूसरे क्षेत्रों के विपरीत इस पवित्र मज़ार को कोई विशेष क्षति नहीं पहुंची। आठवीं हिजरी क़मरी के मध्य में हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार की इमारत को सुन्दर टाइलों से सुसज्जित किया गया और इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की पावन क़ब्र पर चांदी की जालीदार ज़रीह बनाई गयी और पवित्र मज़ार की छत को क़न्दीलों से सुसज्जित किया गया।
तैमूरियों के काल में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार में बहुत निर्माण कार्य हुआ। उस समय शाहरुख़ तैमूरी की पत्नी के आदेश से इस्लामी जगत की सुन्दर मस्जिद, मस्जिदे गौहरशाद का निर्माण किया गया। इस मस्जिद का निर्माण इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार के दक्षिणी प्रांगण में हुआ है। बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि मस्जिदे गौहरशाद, निर्माण और वास्तुकला की दृष्टि से इस्लामी जगत में अद्वतीय है। इस मस्जिद के द्वार पर जो शिलालेख लगे हैं इस्लामी दुनिया में उनका कहीं भी उदाहरण नहीं है। इस मस्जिद का हाल बहुत बड़ा व ऊंचा है और यह ईरान की सुन्दरतम मस्जिदों में एक है। क़ेवामुद्दीन शीराज़ी ने इसका निर्माण किया है। बाद में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार के पास मदरसये परीज़ाद, मदरसये दो दर और मदरसये बालासर की इमारतों का भी निर्माण कर दिया गया। नादिर शाह अफशार के शासन काल में तैमूरी प्रांगण को बहुत ही अच्छी शैली में सुसज्जित किया गया और मज़ार की दीवारों पर फिर से चित्रकारी की गयी।
सफवी काल में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार पर विशेष ध्यान दिया गया और सफवी शासकों में से हर एक ने कुछ न कुछ निर्माण कार्य अंजाम दिये। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की पावन क़ब्र के ऊपर शाह अब्बास के आदेश से सुनहरे रंग का एक सुन्दर ताबूत रखा गया। इसी तरह शाह अब्बास के काल के सुन्दर लीपिकार अली रज़ा अब्बासी के हाथ का लिखा हुआ एक शिलालेख भी है। उसी काल में अतीक़ नामक प्रांगण में भी विस्तार किया गया। प्रांगण के उत्तर में पुख्य हाल के समक्ष एक अन्य बड़ा हाल बनाया गया जिसे “अय्वाने अब्बासी” के नाम से जाना जाता है। इस हाल के पीछे उस स्थान का निर्माण किया गया जहां से अज़ान दी जाती है और उसे सुन्दर टाइलों से सुसज्जित किया गया।

क़ाजारी काल में भी इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार पर विशेष ध्यान दिया गया। सहने आज़ादी अर्थात आज़ादी के प्रांगण के निर्माण का संबंध क़ाजारी काल से है। उस काल में सहने आज़ादी को सुसज्जित किया गया और वह एइवाने नासिरी के नाम से विख्यात हो गया। उसी काल में आज़ादी प्रांगण को सुन्दर टाइलों से सुसज्जित किया गया। उसी काल में तौहीद ख़ाना, दारुल हुफ्फाज़ और दारुस्सय्यारा नामक स्थानों व इमारतों का निर्माण किया गया परंतु इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार में बड़ा विस्तार ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद किया गया। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार में कई प्रांगणों की वृद्धि की गयी, बेहतरीन पुस्तकालय, संग्रहालय और तीर्थ यात्रियों के आराम के लिए कई दूसरी चीज़ों का निर्माण किया गया। इस समय इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार में ७० हज़ार वर्ग मीटर ऐसा क्षेत्र है जिस पर इमारतें बनी हुई हैं जबकि दो लाख वर्गमीटर खुला हुआ क्षेत्र है।
७० हज़ार वर्गमीटर पर इमारतें बनी हैं उनमें से ६० हज़ार ५०० वर्गमीटर पर इमारतों का निर्माण ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद किया गया। इसी तरह दो लाख वर्गमीटर खुले क्षेत्र में से १ लाख ८६ हज़ार वर्गमीटर की वृद्धि क्रांति की सफलता के बाद किया गया।
इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का पवित्र मज़ार इस्लामी जगत में वास्तुकला का एक सुन्दरतम नमूना है। इस पवित्र मज़ार में मुनब्बत कारी अर्थात तक्षण कला, टाइल्स का कार्य, पेरिस आफ प्लास्टर का कार्य, आईनाकारी, सुन्दर लिपी, ख़ातमकारी अर्थात जड़ाऊ का काम मोअर्रक़ारी अर्थात लकड़ी पर की जाने वाली चित्रकारी और पत्थरों को तराश कर किये जाने वाले कार्यों से लाभ उठाया गया है। इसी प्रकार पवित्र मज़ार में पानी पीने की सबील और मीनारों का भी निर्माण किया गया है। इन चीज़ों को पवित्र मज़ार का महत्वपूर्ण भाग समझा जाता है। पानी पीने की सबील “इंकेलाब” प्रांगण में है। इसका निर्माण नादिर शाह अफशार के काल में सन् ११४४ से ११४५ हिजरी क़मरी के मध्य हुआ है और इसे संगमरमर के पत्थरों से बनाया गया है और इसके ऊपर एक ८ कोणीय छत भी है। वर्ष १३४७ हिजरी कमरी में इसका पुनरनिर्माण किया गया।
हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार के अंदर जो मीनार बने हैं उसके प्रकाश से भी लाभ उठाया जाता है। वास्तुकला में उस स्थान को मनार कहते हैं जो मस्जिदों, दर्शन स्थलों और धार्मिक शिक्षा केन्द्रों के ऊपर बनाये जाते हैं और उसके ऊपर से अज़ान दी जाती है। इसी प्रकार यह मीनार यात्रियों का मार्गदर्शन करता है। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार में जो इमारतें हैं उनमें १२ मीनार हैं जिनमें से एक गुंबद के निकट है और उसका निर्माण उसी समय हुआ था जब गुंबद का निर्माण हुआ था जबकि दूसरे का निर्माण नादिर शाह के काल में हुआ था। इस मीनार के निर्माण में ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि दोनों मीनारें एक दूसरे से काफी दूरी पर हैं पर जब कोई यात्री मज़ार के दक्षिण से और इमाम रज़ा रोड से रौज़े की ओर आता है तो उसे ऐसा दिखाई पड़ता है कि गुंबद दोनों मीनारों के बीच में है।
इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार में बड़े- बड़े कई हाल हैं जो ईरानी और इस्लामी वास्तुकला के नमूने हैं।
पूर्वी हाल या नक्कारख़ाना दो अलग- अलग हालों से मिलकर बना है। इस हाल की ऊंचाई २६ मीटर है। नक्कारख़ाने से नगाड़ा बजाया जाता है। यह उस समय बजाया जाता है जब नमाज़ का समय समाप्त होने वाला होता है। मोहर्रम, सफर और शोक के दूसरे दिनों के अतिरिक्त यह पूरे साल में हर रोज़ बजाया जाता है। यह दिन में दो बार बजाया जाता है। पहली बार सूरज निकलने से १० मिनट पहले और दूसरी बार शाम को सूरज डूबने से १० मिनट पहले बजाया जाता है। इसके अतिरिक्त इसे ईद की रातों को शाम की नमाज़ के बाद, नया वर्ष आरंभ होने के समय, ईदे फित्र की घोषणा के लिए और रमज़ान के पवित्र महीने में भोर का समय हो जाने पर बजाया जाता है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार में नक्कारा बजाने का कार्य नवीं शताब्दी के मध्य में आरंभ हुआ।
इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार के किनारे एक सुन्दर व मूल्यवान संग्रहालय और पुस्तकालय भी है। इस संग्रहाल में विभिन्न कालों की मूल्यवान एवं दुर्लभ वस्तुएं रखी हुई हैं। इस संग्रहालय में १३७८ हिजरी शम्सी में अंतिम परिवर्तन के बाद नये संग्रहालयों की भी वृद्धि की गयी और इस समय विभिन्न विषयों के ११ संग्रहालय हैं।
इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र मज़ार के बगल में एक बहुत बड़ा पुस्तकालय भी है। यह ईरान और मध्यपूर्व का सबसे बड़ा पुस्तकालय है। इस पुस्तकालय से पवित्र नगर मशहद और ईरान के दूसरे नगरों के ५० से अधिक पुस्तकालय और एक भारतीय पुस्तकालय जुड़ा हुआ है। MM