मशहद की ऐतिहासिक धरोहर
मशहद शहर में चूंकि इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का रौज़ा है, इसलिए बहुत से विद्वान व प्रतिष्ठित हस्तियां इमाम रज़ा के रौज़े के प्रांगण तथा इसके आस-पास के क्षेत्र में दफ़्न हैं।
इन प्रसिद्ध विद्वानों में प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान बहाउद्दीन मोहम्मद आमुली उर्फ़ शैख़ बहाई की क़ब्र इमाम रज़ा के रौज़े में बने म्यूज़ियम के प्रांगण में है जबकि प्रसिद्ध मोहद्दिस व वसाएलुश्शीया किताब के लेखक शैख़ हुर्रे आमेली की क़ब्र रौज़े के अतीक़ नामक प्रांगण में है। मजमउल बयान नामक पवित्र क़ुरआन की व्याख्या पर आधारित किताब के लेखक शैख़ तबरसी की क़ब्र तबरसी सड़क के आरंभ में स्थित क़ब्रिस्तान में है।
पवित्र नगर मशहद में बहुत सी मस्जिदें और दर्शन स्थल हैं जिसके दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रहती है। हफ़्तादो दो तन मस्जिद, करामत मस्जिद व इमामबाड़ा, इमामज़ादे नासिर व यासिर का मक़बरा, अबासल्त का मक़बरा, ख़्वाजा मुराद का मक़बरा, शैख़ नुख़ूदकी का मक़बरा, ईंट का गुंबद जहां इमामज़ादे मोहम्मद की क़ब्र है और हरा गुंबद जहां शैख़ मोहम्मद मोमिन और ख़्वाजा रबीअ की क़ब्र है, ये सब मशहद के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं। इनके अलावा तूस शहर में फ़िरदौसी का मक़बरा, नादिर शाह अफ़शार का मक़बरा, हारूनिये नामक गुंबद, तथा मशहद के आस-पास गर्मी के मौसम में ठंडे रहने वाले स्थल, इस शहर के पर्यटन एंव इतिहास की नज़र से बहुत महत्वपूर्ण आकर्षण हैं। आज की कड़ी में इनमें से कुछ अवशेषों से आपको परिचित कराएंगे।
रबीअ बिन ख़ुसैम जो ख़्वाजा रबीअ के नाम से मशहूर हैं, प्रतिष्ठि इस्लामी हस्ती हैं। वे साधारण जीवन बिताने के लिए मशहूर हैं। उनका मक़बरा एक बाग़ के बीच में है जिसपर बहुत ऊंचा गुंबद बना हुआ है। शैख़ बहाई की अनुशंसा पर शाह अब्बास सफ़वी ने ग्यारहवीं शताब्दी के पहले अर्ध में ख़्वाजा रबीअ का मक़बरा बनवाया था। ख़्वाजा रबीअ का देहान्त सन 63 हिजरी क़मरी में हुआ था। उनका मक़बरा बाहर से अष्टकोणीय दिखता है। उनके मक़बरे में 4 प्रांगण हैं। मक़बरे की इमारत के ऊपर फ़ीरोज़ी रंग का एक गुंबद बना है। ज़मीन से इस गुंबद की ऊंचाई 18 मीटर है। मक़बरे के चार मुख्य बरामदों में बने दरवाज़ों से शाहनशीनों अर्थात कुंज की ओर रास्ते जाते हैं। कुंज के मुख्य प्रवेश द्वार पर एक बड़ा बरामदा बना है। मक़बरे की इमारत का बाह्य रूप भी बहुत अच्छी तरह सजा हुआ है। बरामदे के भीतरी भाग को विशेष प्रकार की टाइल से सजाया गया है। मक़बरे के मुख्य भाग में प्रसिद्ध ईरानी लीपिकार अली रज़ा अब्बासी के हाथों लिखे हुए दो शिलालेख मौजूद है। इस मक़बरे को ईरान के राष्ट्रीय धरोहरों में शामिल किया गया है।
अब्दुस्सलाम बिन सालेह हेरवी उर्फ़ ख़्वाजा अबासल्त का मक़बरा भी मशहद के ऐतिहासिक अवशेषों में है। अबा सल्त शीया समुदाय के बड़े मोहद्दिस व लेखक हैं। वे इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के वफ़ादार साथियों में थे। उन्होंने ही वफ़ातुर्रेज़ा नामक किताब लिखी है। 17 शव्वाल सन 207 हिजरी क़मरी में उनका ख़ुरासान में स्वर्गवास हुआ और उनका मक़बरा मशहद शहर से 14 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। उनके मक़बरे की इमारत चार कोणीय है। इसके चारों ओर प्रवेश द्वार है। इसके आयताकार बरामदों को सात रंगों वाली टाइल और आइनाकारी से सजाया गया है। जो देखने योग्य है।

मशहद के आसपास स्थित प्रसिद्ध इमारतों में फ़िरदौसी का मक़बरा भी है। यह मक़बरा मशहद से लगभग 24 किलोमीटर पश्चिमोत्तर में तूस शहर में स्थित है। हकीम अबुल क़ासिम फ़िरदोसी ईरान के महाकाव्य कहने वाले सबसे बड़े कवि माने जाते हैं। इसी प्रकार फ़िरदोसी काव्य जगत के महा कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने प्राचीन समय में प्रचलित काव्य शैली शहानामे की तीस साल में रचना की। फ़िरदोसी के शाहनामे में 60 हज़ार शेर हैं। योरोप के महाकाव्य कहने वाले प्रसिद्ध कवियों होमर के दो महाकाव्यों जिनमें कुल 15 हज़ार शेर हैं, और वर्जील के महाकाव्य से कि जिनमें 10 हज़ार शेर हैं, फ़िरदोसी के शाहनामे की तुलना करने से फ़िरदोसी की महानता का पता चलता है। फ़िरदोसी सन 411 हिजरी क़मरी में इस संसार से चल बसे। ईरानी कला व साहित्य के क्षेत्र में मूल्यवान सेवा के कारण उनका मक़बरा कला वा सहित्य प्रेमियों से भरा रहता है।
फ़िरदोसी का मक़बरा बहुत ही सुंदर बाग़ में स्थित है जिसका क्षेत्रफल छह हेक्टर है। मक़बरे के फ़र्श पर एक प्रकार का संग मरमर बिछा है। इसी प्रकार मक़बरे की दीवारों पर भी संगे मरमर लगा हुआ है। मक़बरे की मुख्य इमारत के चारों ओर 20 खंबे हैं जिनमें से हर एक की परिधि 70 सेंटीमीटर है। मक़बरे के भीतर कई शिलालेख हैं और दीवारों पर बहुत से चित्र उकेरे हुए हैं। इसी प्रकार मक़बरे की दीवारों पर शाहनामे के शेर लिखे हुए हैं। मक़बरे के क़रीब में फ़िरदोसी का म्यूज़ियम भी है। इस म्यूज़ियम के कई भाग हैं जैसे पुरातात्विक शोध विभाग, मिट्टी की चीज़ों, धातु और शीशे से बनी वस्तुओं, सोने-चांदी के सिक्को, तत्कालीन वास्तुकला की मूल वस्तुओं तथा म्यूज़ियम को दी गयी वस्तुओं के विभाग।
तूस शहर की एक और ऐतिहासिक इमारत का नाम हारूनिए है। यह इमारत फ़िरदोसी के मक़बरे से लगभग 600 मीटर की दूरी पर स्थित है। यह इमारत छठी हिजरी क़मरी में प्राचीन बुनियाद शहर के खंडहरों के ऊपर बनी हुयी है। इसके बारे में कुछ लोगों का मानना है कि यह मक़बरा है जबकि कुछ लोगों का मानना है कि यह ख़ानक़ाह है। इस इमारत के पास एक काले रंग का पत्थर लगा हुआ है जिसे पांचवी और छठी हिजरी के आत्मज्ञानी इमाम ग़ज़ाली की याद में लगाया गया है।
मशहद शहर का एक और ऐतिहासिक अवशेष मील अख़नगान की ईंट से बनी हुयी इमारत है। यह इमारत इसी नाम के एक गांव के क़रीब में मशहद से 22 किलोमीटर उत्तर में तूस से पाज जाने वाले मार्ग पर स्थित है। पाज़ फ़िरदौसी का जन्म स्थल है।
इस इमारत को तैमूरी काल और नवीं हिजरी क़मरी में प्रचलित वास्तुकला के आधार पर बनाया गया है। पुरानी किताबों व स्रोतों के अनुसार मील अख़नगान के नज़दीक कार्दे घाटी के प्रवेश द्वार पर चौथी हिजरी में ख़ुरासान के शासक और महमूद ग़ज़नवी के बीच लड़ाई हुयी थी। गुंबद रूपी इस मक़बरे की इमारत 17 मीटर ऊंची है। गुंबद के ऊपरी भाग को फ़ीरोज़ी रंग की टाइल से सजाया गया है। इस इमारत को देखने से तैमूरी काल की मीनारों की याद ताज़ा हो जाती है। चूंकि इस मक़बरे में दफ़्न व्यक्ति की सही पहचान अभी तक नहीं हो सकी है, इसलिए कुछ लोगों का यह मानना है कि गुंबद रूपी यह मक़बरा शाहरुख़ तैमूरी की बीवी गौहर शाद का है। जबकि कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इस इमारत के फ़र्श पर मीनाकारी के बने हुए महिलाओं के चित्र यह दर्शाते हैं कि यह इमारत आहंगान नामक महिला के लिए बनायी गयी थी।

ख़ुरासान रज़वी प्रांत का एक और पर्यटन आकर्षण मशहद के पूर्वोत्तर में स्थित कलाते नादेरी शहर में स्थित काख़े ख़ुर्शीद अर्थात ख़ुर्शीद महल है। कलाते नादेरी शहर में एक बाग़ में काख़े ख़ुर्शीद अर्थात ख़ुर्शीद महल बना हुआ है। यह बाग़ ख़ुरासान रज़वी प्रांत में दो पर्वत श्रंख्ला के बीच में पहाड़ी में स्थित है। ख़ुर्शीद महल को विशेष वास्तुकला से बनाया गया है। इस इमारत का रूप बेलनाकार है। इस इमारत का 20 मीटर भाग ज़मीन के नीचे और 11 मीटर ज़मीन के ऊपर है।
नादिरशाह का मक़बरा भी मशहद शहर के भीतर एक ऐतिहासिक पर्यटन आकर्षण है। यह इमारत 14400 वर्ग मीटर क्षेत्रफल वाले बाग़ में बनी है। इस मक़बरे में 12 सीढ़ियों वाला एक चबूतरा, क़ब्र, तथा क़ब्र के ऊपर तंबू जैसा छतदार ढांचा बना हुआ है। इसी प्रकार क़ब्र के बग़ल में एक ऊंचा चबूतरा है जिस पर नादिरशाह की घोड़े पर सवार प्रतिमा लगी हुयी है। उसके हाथ में कुल्हाड़ी है। यह प्रतिमा 5 मीटर ऊंची है। इस मक़बरे के भीतर एक म्यूज़ियम भी है। नादिरशाह के मक़बरे के पीछे ईरान में पुलिस बल के संस्थापक कर्नल मोहम्मद तक़ी ख़ान पिस्यान का मक़बरा है जो ईरान के बलिदानी कमान्डरों में गिने जाते हैं।
पवित्र नगर मशहद में ईरान के अन्य शहरों की तरह प्राचीन वास्तुकला पर आधारित घर भी मौजूद हैं। मशहद में इमाम ख़ुमैनी स्ट्रीट पर ख़नई मलिक इमारत, क़ाजारी काल के अंतिम वर्षों में वास्तुकला में आने वाले परिवर्तन का स्पष्ट नमूना है। विगत में यह इमारत बहुत ही व्यापक थी किन्तु अब उसका केवल बाहरी भाग ही बचा है जो दो मंज़िला है। ऊपरी मंज़िले पर जालीदार छत, तक्षण कला और चूने के पत्थर से बनी चिमनी है।
ऐतिहासिक अवशेषों, कोहसंगी मनोरंजन व सांस्कृतिक काप्लकेक्स और ठंडे मौसम वाला शहर शान्दीज़ के अतिरिक्त मिल्लत पार्क और वकीलाबाद पार्क भी मशहद के ठंडे इलाक़ों में गिने जाते हैं जहां पूरे साल पर्यटकों का तांता बंधा रहता है।