Apr २६, २०१६ १०:१२ Asia/Kolkata

नीशापुर ख़ुरासाने रज़वी प्रांत का एक महत्वपूर्ण नगर है।

 पांच लाख इस नगर की जनसंख्या है और पवित्र नगर मशहद के बाद ख़ुरासाने रज़वी प्रांत का यह दूसरा सबसे बड़ा नगर है। इस नगर की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि ,मवेशी पालन और उद्योग है। गेहूं, जौ, मक्का, रूई, राजमा, मौसमी सब्जियां और नाना प्रकार के फल महत्वपूर्ण कृषि उत्पाद हैं। इस नगर में कृषि और औद्योगिक गतिविधियां पारंपरिक शैली में हो रही हैं। ख़ुरासाने रज़वी प्रांत में पैदा होने वाली ८३ प्रकार की चीज़ों में से ७६ चीज़ों की खेती नीशापुर में होती है और ४७ चीज़ैं ऐसी हैं कि जिनमें से कुछ के उत्पाद से पहले, तो कुछ के उत्पाद से इससे और कुछ के उत्पाद में तीसरे स्थान पर है। भूमिगत नहरें जलापूर्ति की महत्वपूर्ण स्रोत और नीशापुर की विशेषताए हैं जिन्होंने आज भी अपना महत्व सुरक्षित कर रखा है।

 

नीशापुर का मैदानी भाग उत्तर और पूरब से बीनालूद की ऊंचाइयों और दक्षिण से सुर्ख काश्मर पर्वत तथा चेहल तुर्बत हैदरिया की ऊंचाइयों एवं पश्चिम से सब्ज़वार के मरुस्थल से मिला हुआ है। नीशापुर की ज़मीन बहुत उपजाऊ है इस प्रकार से कि नीशापुर को लोग अच्छी जलवायु, हरे भरे बाग़ और विविध प्रकार के फलों के स्वामी के रूप जाने- जाते हैं। अधिकांश उपजाऊ और जनसंख्या वाले क्षेत्र नीशापुर के उत्तर में स्थित हैं इस प्रकार से कि सात शहरों में से ६ शहर इसी क्षेत्र में स्थित हैं और इस क्षेत्र में कई नदियां बहती हैं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण सब्ज़वार की कालशूर नदी है जिसका उद्गम इस नगर के ऊंचे पहाड़ हैं और सब्ज़वार से गुज़रने के बाद वह मरूस्थल में गिरती है। इस क्षेत्र की दूसरी नदियों के नाम इस प्रकार हैं दुरूद, ख़ूर, बूजान, बाग़रूद, मीराबाद, ताग़ान, बार, बक़ीअ और सरेवेलायत। नीशापुर के सबसे ऊंची चीटी यानी बीनालूद की ऊंचाई ३२११ मीटर है और वह ख़ुरासान की छत के नाम से प्रसिद्ध है और वह बूजान गांव के समीप स्थित है।

 

नीशापुर नगर ईरान के पूर्व में ख़ुरासाने रज़वी प्रांत का एक महत्वपूर्ण नगर है और यह बीनालूद पर्वत के दामन में स्थित है। संस्कृति, पर्यटन, उद्योग और इतिहास की दृष्टि से ईरान के उत्तर पूर्व का यह एक महत्वपूर्ण नगर है। नीशापुर ईरान का एक प्राचीन नगर है और वह सिल्क रोड के रास्ते में पड़ता है। नीशापुर में पुरातत्व वेत्ताओं के किये गये शोधों के आधार पर ईसा पूर्व तीसरी सहस्त्राब्दी में यह क्षेत्र पाकिस्तान के सिंध और मैसोपोटामिया के मध्य व्यापारिक संपर्क मार्ग था और यह ख़ुरासान प्रांत का सबसे प्राचीन क्षेत्र है।

तीसरी हिजरी क़मरी के आरंभ से लेकर ६ठी हिजरी क़मरी की शुरुआत तक नीशापुर ने बहुत सारे उतार- चढ़ाव देखे हैं। इस नगर को तीसरी ईसवी शताब्दी के मध्य में सासानी काल में शापूर प्रथम के आदेश से बसाया गया था। निशापुर को पहली बार ताहीरियों के काल में और दूसरी बार सलजूक़ियों के काल के आरंभ में ईरान की राजधानी के रूप में चुना गया और ११वीं ईसवी शताब्दी में विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या वाले नगरों में से एक था। इस नगर का विकास और उसकी प्रसिद्धि उस समय से अधिक हुई जब से ख़ुरासान क्षेत्र में इस्लाम आया और यह चीज़ मंगोलों के हमले तक जारी रही और नीशापुर इन शताब्दियों के दौरान ईरान की सांस्कृतिक राजधानी था। यह नगर उस समय सिल्क रोड के रास्ते में था और इसे पूर्व की दालान के नाम से जाना जाता था। ईरान से तुर्किस्तान का मुख्य व्यापारिक मार्ग था और यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण था।

 

 

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नीशापुर ज्ञान- विज्ञान और इस्लामी सभ्यता का केन्द्र था विशेषकर अब्बासी शासकों के काल में। उस काल में बहुत से विद्वान, शायर और सूफी वहां से पैदा हुए। नीशापुर पर मंगोलों का पाश्विक हमला और उसके बाद के प्रभाव से नीशापुर के इतिहास और इस्लामी व ईरानी सभ्यता पर बुरा प्रभाव पड़ा परंतु मंगोलों का हमला और इस क्षेत्र में बारम्बार के भूकंप से नीशापुर नष्ट नहीं हो सका और आज जनसंख्या की दृष्टि से यह ख़ुरासाने रज़वी प्रांत का एक महत्वपूर्ण नगर है और औद्योगिक एवं आर्थिक गतिविधियों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण नगर है। प्राकृतिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आकर्षणों से समृद्ध होने के कारण लाखों लोग प्रतिवर्ष इस नगर को देखने के लिए आते हैं। अब भी लगभग तीन हज़ार वर्ष बीत जाने के बावजूद इस नगर का महत्व अपने स्थान पर बना हुआ है अतः वर्ष २०११ में यूनिस्को में नीशापुर का नाम आध्यात्मिक धरोहरों की राजधानी के रूप में पंजीकृत किया गया। मंगोलों ने नीशापुर पर हमला किया और कई बार इस नगर में भूकंप आया जिसकी वजह से इस नगर को नुक़सान पहुंचा। अतः नीशापुर के पश्चिमोत्तर में रहने वालों ने नये नगर का निर्माण किया और वहां रहने लगे। जो क्षेत्र प्राचीन नीशापुर का बाक़ी रह गया है उसे कोहनदेज के नाम से जाना जाता है और उसका क्षेत्रफल ३५०० हेक्टेयर है। नीशापुर में पहली बार शोधकार्य वर्ष १९३५ में आरंभ हुआ जो अब भी जारी है। उस समय के नीशापुर के खंडरों से जो चीज़ें प्राप्त हुई हैं वे इस बात की सूचक हैं कि प्राचीन समय में यह नगर काफी विस्तृत व बड़ा था।

         

तीसरी और चौथी हिजरी क़मरी में मिट्टी का काम नीशापुर में अपने चरम पर पहुंच चुका था। इस नगर को मिट्टी के उद्योग का केन्द्र समझा जाता था। वर्ष १९८८ में नीशापुर में होने वाले एक शोध से पता चला कि इस नगर में मिट्टी के कार्य का अतीत क्या है और यह कार्य कब से आरंभ हुआ। नीशापुर में मिट्टी के जो बर्तन मिले हैं उन्हें तेहरान के आबगीने और सोफालिने और न्यूयार्क के मेट्रोपोलिटन संग्रहालय में रखा गया है।

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निशापुर में इतना अच्छा फिरोज़ा निकलता है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है। सदियों से नीशापुर की खदानों से फिरोज़ा निकाला जा रहा है और विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में उसका निर्यात होता है। न्यू मैक्सिको, नेवाडा, क्लोराडो, तिब्बत, सीना प्रायद्वीप और चिली में फिरोज़ा की ख़दानों के होने के बावजूद नीशापुर का फिरोज़ा अधिक मूल्यवान एवं उत्तम है और खदान विशेषज्ञों के अनुसार नीशापुर का फिरोज़ा विश्व में सबसे अच्छा होता है।

 

फिरोज़ा एक मूल्यवान पत्थर होता है। कहा जाता है कि हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के जन्म से ३४०० वर्ष पूर्व मिस्र के फिरऔन, सीना मरुस्थल से फिरोज़ा निकालते और उसका प्रयोग आभूषण के लिए करते थे। फिरोज़ा निकालना एवं उसे तराशने का कार्य ईरान में सासानी काल में प्रचलित था और उसका प्रयोग शासकों के बर्तनों एवं अंगूठियों को सुसज्जित करने के लिए होता था। फिरोज़ा की खदान, माअदने नीशापुर गांव के निकट है और इसकी ऊंचाई ज़मीन की सतह से २०१२ मीटर है। इस खदान में जो खुदाई की गयी है और उसमें जो गुफाएं मौजूद हैं वह इस वास्तविकता की सूचक हैं कि इस ख़दान से फिरोज़ा निकाले जाने का इतिहास बहुत पुराना है। पुरातत्व वेत्ताओं को खुदाई में जो वस्तुएं प्राप्त हुई हैं वे इस बात की सूचक हैं कि दो हज़ार ईसा पूर्व फिरोज़े का प्रयोग साज- सज्जा के कार्यों में होता था। आज ईरान का फिरोज़ा विश्व के विभिन्न देशों में निर्यात किया जाता है। तुर्की, इटली और स्वीडन इसके मुख्य ख़रीदार हैं।