Apr २६, २०१६ १०:५७ Asia/Kolkata

काश्मर ख़ुरासान रज़वी प्रांत का शहर है।

इसका क्षेत्रफल लगभग 3390 वर्गकिलोमीटर है। यह केन्द्रीय एवं कोहे सुर्ख़ नामक दो भाग में बटा हुआ है। काश्मर के उत्तर में नीशापूर और सब्ज़वार शहर, पूरब में तुर्बते हैदरिये शहर, दक्षिण में गुनाबाद और फ़िरदोस शहर और पश्चिम में मरुस्थल है। यह शहर मश्हद से लगभग 240 किलोमीटर दूर स्थित है।

 

 

काश्मर शहर में दो पहाड़ी क्षेत्र हैं एक उत्तर में जो कूहे सुर्ख़ कहलाता है और दूसरा दक्षिण में फ़ोग़ान बजिस्तान पर्वत श्रंख्ला का हिस्सा है। इस शहर का पश्चिमी और दक्षिणी भाग सूखा व मरुस्थलीय है जबकि शहर के उपनगरीय इलाक़े और गांव हरे भरे हैं। काश्मर की जलवायु शुष्क और अर्ध शुष्क है। काश्मर शहर ऐसे क्षेत्र में स्थित है इसकी जलवायु एक ओर पहाड़ के निकट होने और दूसरी ओर मरुस्थल से क़रीब होने के कारण गर्म और शुष्क तथा ठंडी रहती है।

काश्मर कृषि प्रधान इलाक़ा है और किसी समय यह ख़ुरासान के अनाज भंडारण का केन्द्र समझा जाता था। काश्मर में नाना प्रकार के कृषि उत्पादों की खेती होती है। जिसमें जौ, गेहूं, शकरक़न्द, रूई, सूरजमुखी, ज़ीरा, अंगूर, चारे, खट्टे फल, दालें और जाफ़रान उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार काश्मर में पुश औ पक्षी पालन पारंपरिक एवं औद्योगिक तरीक़े से होता है। इस इलाक़े के लोग भेड़, बकरी, गाय और ऊंट पालते हैं। काश्मर की अर्थव्यवस्था कृषि के साथ साथ उद्योग पर भी निर्भर है। काश्मर में उद्योग हस्तकला और कारख़ाने में बनने वाले उत्पाद पर निर्भर है।

 

 

क़ालीन की बुनाई, बुने हुए जूते, महिलाओं के विशेष कमर में बांधने के लिए रेशम का बुना हुआ कपड़ा, काश्मर के हस्तकला उद्योग हैं। काश्मर के क़ालीन अपनी गणुवत्ता के लिए मशहूर हैं। इस शहर के क़ालीन और गलीचे ज़्यादातर ऊन के बुने होते हैं और इनकी डिज़ाइन भी स्थानीय होती है। ख़ुरासाने रज़वी प्रांत में यूं तो कई शहरों में क़ालीन की बुनाई होती है लेकिन काश्मर के क़ालीन अच्छी बुनायी, नक़्शे और रंग की दृष्टि से बहुत मशहूर हैं।

काश्मर में अंगूर के बाग़ बहुत ज़्यादा हैं, इसलिए काशमर से उपहार के लिए किशमिश सबसे ज़्यादा लोग ख़रीदते हैं। यहां के किशमिश गुणवत्ता की नज़र से इतनी अच्छी होती है कि निर्यात की जाती है।

 

{{IMAGE CAPTION}}

 

काश्मर में बहुत से दर्शनीय स्थल और ऐतिहासिक अवशेष हैं। इस शहर में इमामज़ादों के मक़बरे, ऐतिहासिक इमारतों में गिने जाते हैं। इस शहर में 16 इमामज़ादों के मक़बरे हैं जिनमें इमामज़ादा सय्यद मुर्तज़ा और सय्यद हमज़ा के मक़बरे सबसे ज़्यादा मशहूर हैं। इसी प्रकार जामा मस्जिद, शहीद हसन मुदर्रिस का मक़बरा, आतिशगाह क़िला, अलीआबाद और फ़िरोज़ाबाद मीनार सहित और भी इमारतें हैं जो सलजूक़ी दौर की हैं।

काशमर जामा मस्जिद, शहर के केन्द्र में स्थित है। इसके शिलालेख से पता चलता है कि इस जामा मस्जिद को वर्ष1213 हिजरी क़मरी में फ़त्ह अली शाह क़ाजार के शासन काल में बनाया गया है। मस्जिद की इमारत सादा है। इसमें प्रांगण और बरामदा हैं। प्रांगण के साथ साथ कमरे बने हुए हैं। मस्जिद के चारों ओर ईंट के कई कमरे बने हुए हैं। मस्जिद के दक्षिणी छोर पर एक बरामदा है जिसे मुक़र्नस डीज़ाईन से सजाया गया है जबकि मस्जिद की मेहराब और हाल को मोअर्रक़ टाइलों से सजाया गया है।

 

 

पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के बेटे हमज़ा बिन मूसा का मक़बरा भी काश्मर के दर्शनीय स्थलों में है। यह मक़बरा काश्मर शहर के केन्द्र में फलों के बाग़ में स्थित है। इसकी इमारत 2000 वर्गमीटर पर फैली हुयी है। मक़बरे की इमारत में एक गुंबद है जिस पर हरे रंग की टाइल का काम है और हाल में आईनाकारी की गयी है। दस्तावेज़ के अनुसार मक़बरे की यह इमारत सफ़वी काल में बनायी गयी है जिसकी बाद में विभिन्न कालों में इसकी मरम्मत की गयी है।

काश्मर के पांच किलोमीटर उत्तर में पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के भाई सय्यद मुर्तज़ा का मक़बरा है। दस्तावेज़ों के अनुसार उन्हें दूसरी शताब्दी हिजरी में उमवी शासक के कारिन्दों ने शहीद करके इसी स्थान पर दफ़्न कर दिया था। उनका मक़बरा लगभग 1800 वर्गमीटर पर बना है। मुख्य इमारत में एक हाल है जिसमें टाइल का काम किया गया है। मक़बरे का गुंबद फ़ीरोज़ी रंग का है। मौजूदा इमारत वर्ष 1399 हिजरी क़मरी में बनायी गयी है। इस मक़बरे का दर्शन करने के लिए हर दिन श्रद्धालुओं का तांता बंधा रहता है।

 

 

शहीद आयतुल्लाह सय्यद हसन मुदर्रिस ईरान में संविधान क्रान्ति के समय की धार्मिक व राजनैतिक हस्ती थे। वे 1249 हिजरी शम्सी में इस्फ़हान प्रांत के एक गांव में पैदा हुए। 16 साल की उम्र में वे धार्मिक शिक्षा के लिए इस्फ़हान गए और फिर वहां से इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ चले गए और फिर वहां से सात साल बाद इस्फ़हान लौटे। उसके बाद वह राजनीति में सक्रिय हुए फिर ईरान की तत्काली संसद राष्ट्रीय परिषद के लिए चुने गए। वे ईरानी संसद के दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवे और छठे कार्यकाल के लिए सदस्य चुने गए और जब भी मौक़ा मिलता रज़ा ख़ान की तत्कालीन अत्याचारी सरकार का तार्किक ढंग से विरोध करते। वे राजनीति को धर्म से अलग नहीं मानते थे। उन्होंने ब्रितानी साम्राज्य और ख़ास तौर से ब्रितानी साम्राज्य के पिट्ठू रज़ा ख़ान पहलवी के ख़िलाफ़ संघर्ष किया। उनकी रज़ा ख़ान के राष्ट्र विरोधी क्रियाकलापों से पर्दा उठाने की नीति ने उसे परेशान कर दिया था इसलिए उसने शहीद मुदर्रिस को मार्ग से हटाने और उन्हें जान से मारने की धमकी दी किन्तु धमकी के ज़रिए भी वह अपने ब्रितानी आक़ाओं को ख़ुश नहीं कर पासा इसलिए उसने इस वीर व साहसी धर्मगुरु को अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से मिले ईरान के एक सुदूर गांव की ओर भेज कर दिया। बाद में रज़ा ख़ान ने शहीद मुदर्रिस को काश्मर भेजा और फिर जेल में डाल दिया। किन्तु शहीद मुदर्रिस उन लोगों में नहीं थे जो कठिनाइयों के सामने अपने उद्देश्य को छोड़ दे। वे अपने साम्राज्य विरोधी एवं इस्लामी विचारों पर डटे रहे। अंततः रज़ा ख़ान ने 1316 हिजरी शम्सी को शहीद मुदर्रिस के क़त्ल का आदेश दिया और उसके कारिंदों ने शहीद मोदर्रिस को पवित्र रमज़ान के महीने में काश्मर की जेल में शहीद कर दिया।

शहीद मुदर्रिस के छोटे से मक़बरे की जगह पर वर्ष 1363 हिजरी शम्सी में एक विशाल बाग़ में बड़ा मक़बरा बनाया गया। उनके मक़बरे की इमारत सफ़वी काल की वास्तुकला का नमूना है। मक़बरे की इमारत का गुंबद फ़िरोज़ी रंग का है। मक़बरे में चार हाल हैं। उनके दर्शन के लिए श्रद्धालु जाते हैं।

 

{{IMAGE CAPTION}}

 

काश्मर शहर अनुकूल जलवायु से समृद्ध है इसलिए वहां के प्राकृतिक दृष्य बहुत ही सुदंर हैं। कूहे सुर्ख़ पर्यटन स्थल इस शहर का अच्छी जलवायु वाले इलाक़ों में हैं।

कूहे सुर्ख़ चूंकि ऊंचाई पर स्थित क्षेत्र है और विविधतापूर्ण जलवायु से संपन्न है इसलिए वहां विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां और औषधियां उगती हैं। कूहे सुर्ख़ के आकर्षण का एक कारण प्राचीन संरचना पर आधारित तलहटी में बसा सुंदर गांव है। इस गांव के घर सीढ़ी की भांति दिखाई देते हैं जो हर पर्यटक का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं।