Apr २६, २०१६ ११:०० Asia/Kolkata

दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत ईरान का सुदूर पूर्वी प्रांत है।

 1 लाख 51 हज़ार 193 वर्गकिलोमीटर इस का क्षेत्रफल है। दक्षिणी ख़ुरासान की सीमा पूरब से अफ़ग़ानिस्तान, उत्तर से ख़ुरासाने रज़वी प्रांत, पश्चिम से यज़्द और किरमान प्रांत तथा दक्षिण से सीस्तान व बलोचिस्तान से मिलती है। दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत पवित्र नगर मशहद को दक्षिणी ईरान के प्रांतों से जोड़ने वाले मार्ग पर स्थित है। मशहद ईरान का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।

 

 

दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत को भौगोलिक दृष्टि से शुष्क और मरुस्थलीय इलाक़े में गिना जाता है। इस प्रांत में सालाना सामान्यत 150 मिलीमीटर वर्षा होती है।

दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत, 2004 में ईरानी संसद में पारित प्रस्ताव के अनुसार , ख़ुरासान को तीन भाग में बांटने के बाद अस्तित्व में आया।

दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत का केन्द्र बीरजन्द है और इस प्रांत में ग्यारह नगर हैं। यह प्रांत ओनाब और दारुहल्दी जैसे बाग़ के उत्पाद में पहले नंबर पर और ज़ाफ़रान तथा रुई के उत्पादन में पूरे ईरान में दूसरे नंबर पर है। इसी प्रकार पिस्ता, अनार, बादाम, सेब, नाश्पाती, बेह (क्विन्स) चेरी, आड़ू, पीच, खजूर, शहतूत, अख़रोट और अंजीर भी इस प्रांत में पैदा होते हैं। चुक़न्दर के उत्पादन में दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत आठवें नंबर पर है। इसी प्रकार इस प्रांत में गेहूं, जौ, दालें और चारे की भी पैदावार होती है।

दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत खानों से भी संपन्न है। मेनीज़ीत का भंडार सिर्फ़ बीरजंद और सीबीशे में पाया जाता है। इसके इलावा ईरान में आज़बेस्ट का एकमात्र सबसे बड़ा भंडार भी दक्षिणी ख़ुरासान में मौजूद है। इसी प्रकार बेतोनीत, ग्रेनाइट, सफ़ेद मिट्टी और बसाल्ट भी इस प्रांत में मौजूद है। दक्षिणी ख़ुरासान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में तांबे की बहुत मशहूर खान है।

 

 

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क़ालीन की बुनाई, मिट्टी के बर्तन, रंगरेज़ी, लोहारी, तांबे का काम, चटाई की बुनाई, टोकरी की बुनाई, कपड़े की बुनायी, नमद माली, ज़ीलू बाफ़ी, गेलीम बाफ़ी, जाजीम बाफ़ी, सुनारी, दब्बाग़ी और कुरेशिये का काम, आदि इस प्रांत के हस्तकला उद्योग हैं।

दक्षिणी ख़ुरासान का केन्द्र बीरजन्द शहर समुद्र तल से 1480 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। तेहरान से इसकी दूरी 1320 किलोमीटर पूरब में है। प्राचीन काल से ही बीरजन्द का नाम यही है। किन्तु कुछ दस्तावेज़ों में इस शहर को बर्जन, बर्कन्द और बीरगन्द के नाम से भी याद किया गया है। सबसे पहले इस शहर का उल्लेख सातवीं हिजरी क़मरी में संकलित किताब मोजमुल बुलदान में किया गया है। इसी प्रकार मार्कोपोलो, याक़ूत हमवी, मुक़द्देसी और हमदुल्लाह मुस्तौफ़ी ने भी अपनी किताबों में इस शहर का किसी न किसी परिप्रेक्ष्य में उल्लेख किया है।

 

बीरजन्द दक्षिणी ख़ुरासान का सबसे अहम क्षेत्र समझा जाता है। बीनजन्द का एक छोटा सा पहाड़ी इलाक़ा है जिसका नाम क़हिस्तान है।

 

यह इलाक़ा एक तरफ़ से पहाड़ी होने के कारण इस्माइलियों के आंदोलन में शामिल लोगों का शरणस्थल था। दूसरी ओर सूखे और मरुस्थलीय होने के कारण सऊदी अरब से बहुत मिलता जुलता है। इसी प्रकार क़हिस्तान उन अरबों की शरणस्थली था जो अब्बासी शासकों के अत्याचार से डर का यहां आए थे। बीरजन्द की जलवायु में दो तत्व बहुत प्रभावी हैं। एक ऊंचे पर्वतांचल और दूसरा विशाल मैदानी इलाक़ा। केन्द्रीय ईरान के मरुस्थलीय क्षेत्र के क़रीब स्थित तथा विशाल मैदानी इलाक़े से संपन्न होने के कारण यहा पर रेगिस्तानी हवा बहती है जिससे गर्मी के मौसम में तापमान ज़्यादा रहता है। दूसरी ओर इस क्षेत्र के पहाड़ पश्चिमी और पूर्वी छोर की ओर ज़्यादा हैं, इसलिए इस इलाक़े में गर्मी असर टूट जाता है और यहां की जलवायु आस-पास की इलाक़े के तुलना में अधिक संतुलित होती है। इस वक़्त बीरजन्द दक्षिणी ख़ुरासान के अहम शहरों में है और व्यापारिक व आर्थिक दृष्टि से महानपूर्ण केन्द्रों में शामिल है।

 

 

बीरजन्द में ख़ूबसूरत इमारतें, प्राचीन बाग़ और क़ाजारी तथा ज़न्दिया शासन श्रंख्ला के दौर के ऐतिहासिक हम्माम भी हैं। बीरजन्द की ऐतिहासिक इमारतों में कुलाह फ़िरन्गी नामक क़िला उल्लेखनीय है जो शहर के केन्द्र में स्थित है। यह इमारत छह मन्ज़िता बनी हुयी है जिसमें केवल दो मन्ज़िला ही उपयोगी हैं और बाक़ी ...

ग्राउंड फ़्लोर पर विभिन्न प्रकार के डेकोरेटिव आर्ट्स के नमूने देखने को मिलते हैं। इसी प्रकार इस फ़्लोर पर बने कमरे और गुबंद बरामदे के ज़रिए एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

इस इमारत के केन्द्र में एक हौज़ है। यह हौज़ भी वास्तुकला के कौशल का एक अच्छा नमूना पेश करता है। विभिन्न प्रवेश मार्ग इसी हौज़ पर आकर ख़त्म होते हैं। इस हौज़ को मुख्य इमारत से एक मीटर नीचे अष्टकोणीय रूप में बनाया गया है। इस हौज़ के आस-पास सुंदर ताक़ बने हुए हैं जिन पर सुंदर मुक़र्नस टाइल लगायी गयी है। हौज़ में रौशनी कुलाह फ़ेरंगी नामक गुंबद और रौशनदान से पहुंचती है। कुलाह फ़ेरंगी क़िला ईरान के राष्ट्रीय धरोहरों की सूचि में शामिल है।

 

बीरजन्द की प्राचीन संरचना में शौकतिये नाम का एक मदरसा है जो इस शहर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है। इस मदरसे की इमारत में एक हाल, दहलीज़, प्रांगण, आंगन के चारों ओर कमरे, शहनशीन और हम्माम बने हुए हैं। शौकतिये मदरसे के दरवाज़े पर एक ताक़ बना हुआ है। मोहर्रम की शोक सभाओं के आयोजन के लिए शौकतिये मदरसे का निर्माण 1312 हिजरी क़मरी में हुआ था। 1326 हिजरी क़मरी में इसमें बीरजन्द के पहले मदरसे की स्थापना की गयी।

 

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श्रोताओ! आपके लिए यह जानना भी फ़ायदेमंद होगा कि बीरजन्द के ऐतिहासिक आकर्षणों में एक चहार दरख़्त नाम मोहल्ला है। चहार दरख़्त की सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण धरोहर शौकतिये मदरसे और जामे आशूरा मस्जिद के बीच में स्थित हैं। इन दोनों के बीच में 20 से ज़्यादा ऐतिहासिक अवशेष मौजूद हैं जो ईरान की राष्ट्रीय धरोहरों की सूचि में शामिल हैं। इनमें से हर एक वास्तुकला की दृष्टि से अलग अलग विशेषता रखते हैं। इन बीस ऐतिहासिक धरोहरों में कुछ मदरसे, घर, इमामबाड़े, मस्जिद और पानी के भंडारण का प्राचीन शैली का हौज़ शामिल है। चहार दरख़्त मोहल्ले को 1371 में ईरान की राष्ट्रीय धरोहरों की सूचि में शामिल किया गया।

 

अकबरिये इमारत और बाग़ ही बीरजन्द शहर की ऐतिहासिक धरोहर में शामिल हैं। क़ाजारी शासन काल में शौकतुल मुल्क ने इस दो मन्ज़िला इमारत को बनवाया था। 2011 में युनेस्को ने अकबरिये इमारत और बाग़ को विश्व धरोहर की सूचि में शामिल किया है। इस इमारत का निर्माण क़ाजारी शासन काल के आरंभिक दिनों में शुरु हुआ और इस शासन श्रंख्ला के अंतिम दिनों तक कई चरणों में संपन्न हुआ। अकबरिये काम्पलेक्स लगभग 45 हज़ार वर्ग मीटर पर फैला हुआ है। इस काम्पलेक्स में कई इमारतें हैं। अकबरिये काम्पलेक्स की सबसे पुरानी इमारत हशमतुल मुल्क के दौर में बनी थी। यह दो मन्ज़िला इमारत इस काम्पलेक्स में मौजूद बाग़ के पूरी छोर पर बनी हुयी है। ग्राउंड फ़्लोर पर दो दालान और एक लंबा गलियारा है। मुख्य इमारत मेहमानों के स्वागत के लिए है। यह इमारत डेकोरेटिव आर्ट्स से सजी हुयी है। सड़क के किनारे दोनों ओर और मुख्य इमारत पर जाकर ख़त्म होने वाली सड़क के दोनों ओर चीड़ के ऊंचे ऊंचे पेड़ों ने इमारत और बाग़ के आकर्षण में चार चांद लगा दिए हैं। इस वक़्त दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत के सांस्कृतिक एवं पर्यटन विभाग इस बाग़ और इसकी इमारत की देखभाल कर रहा है। क़ाजारी शासन के शुरु में इस काम्पलेक्स का जो भाग बना था, वह अब इस वक़्त लाइब्रेरी के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है। केन्द्रीय भाग को मानव शास्त्र व पुरातन शास्त्र के म्यूज़ियम के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है। इसी प्रकार इस काम्पलेक्स के जानवरों से विशेष म्यूज़ियम में दक्षिणी ख़ुरासान में जानवरों की खाल से पहनने व ओढ़ने योग्य चीजों को रखा गया है। इसी प्रकार इस भाग में दक्षिणी ख़ुरासान के दुर्लभ पक्षी भी रखे गए हैं। इसी प्रकार अकबरिये बाग़ के मानव एंव पुरातन विज्ञान के म्यूज़ियम के एक भाग में दक्षिणी ख़ुरासान के लोगों के रहन-सहन और व्यवसाय को प्रदर्शित किया गया है।(MAQ)

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