Apr २६, २०१६ ११:०४ Asia/Kolkata

दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत के पश्चिमोत्तर में फ़िरदौस क़स्बा स्थित है।

 इसका क्षेत्रफल 4103 वर्ग किलोमीटर है। यह क़स्बा दो केन्द्रीय मरुस्थलों के नज़दीक स्थित है इसलिए इस क़स्बे में बहुत कम बारिश होती है। इस क़स्बे में सालाना 155 मिलीमीटर बारिश होती है। फ़िरदौस क़स्बे का क्षेत्रफल बहुत ज़्यादा है इसलिए यह जलवायु की दृष्टि से दो अलग अलग क्षेत्रों में बंटा हुआ है।

 

 

फ़िरदौस क़स्बे के पर्वतांचल में स्थित क्षेत्रों में जाड़े मौसम में बहुत ठंडक पड़ती है जबकि गर्मी का मौसम संतुलित रहता है। इस क़स्बे के दक्षिण और दक्षिण-पश्चिमी भाग में गर्मी के मौसम में तापमान बहुत ज़्यादा रहता है और शुष्क होता है।

फ़िरदौस क़स्बे की सबसे ऊंची चोटी उत्तर से पूर्वोत्तर तक फैली हुयी है। इस क़स्बे की सबसे ऊंची चोटी का नाम सियाह कूह है जो 2813 मीटर ऊंची है। फ़िरदौस क़स्बे के दक्षिण-पश्चिम में कम ऊंचाई वाले पहाड़ हैं। ये पहाड़ बीरजन्द के पहाड़ों से जुड़े हुए हैं। और इस्माइली शासन काल के ऐतिहासिक अवेशेष, क़ूह क़िले और कूह क़िले हसनाबाद नामक चोटियों पर मौजूद हैं।

 

फ़िरदौस शहर का इतिहास पुराना है। 1929 ईसवी का तक इस क़स्बे का नाम ‘तून’ था। इस इलाक़े के अवशेष और टीले इतिहासपूर्व के हैं। तून का ऐतिहासिक शहर उस काल के बचे हुए अवशेष की तरह है। फ़िरदौस ख़ुरासान रज़वी और दक्षिणी ख़ुरासान प्रांतों और ईरान के ऐतिहासिक प्रांतों के बीच संपर्क बिन्दु है। फ़िरदौस शहर में 190 ऐतिहासिक अवशेषों की पहचान की गयी है जिसमें 90 अवशेष ईरान के राष्ट्रीय अवशेष धरोहरों में पंजीकृत किए गए हैं।

फ़िरदौस जामा मस्जिद, कूशक मस्जिद, उलया मदरसा, तून का ऐतिहासिक शहर, एंथ्रोपोलोजी म्यूज़ियम, इमामज़ादे सुलतान मोहम्मद और इब्राहीम के मक़बरे फ़िरदौस शहर के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एंव धार्मिक आकर्षण हैं।

 

                 

फ़िरदौस पवित्र नगर मशहद से 345 किलोमीटर दक्षिण में और बीरजन्द से 195 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। फ़िरदौस क़स्बा यज़्द, किरमान, इस्फ़हान, बूशहर, हुर्मज़गान और फ़ार्स प्रांतों को मश्हद से जोड़ने वाले मुख्य संपर्क मार्ग पर स्थित है। फ़िरदौस के कृषि उत्पादों में जाफ़रान है और बाग़ के उत्पाद में अनार और पिस्ते की पैदावार है। दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत में क़ालीन की बुनाई के सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र में फ़िरदौस क़स्बा भी है और ईरान में जाफ़रान के उत्पादन के महत्वपूर्ण केन्द्रों में गिना जाता है। फ़िरदौस कस्बे का जाफ़रान ख़ुशबू और रंग की नज़र से सबसे अच्छा ज़ाफ़रान माना जाता है। इसके इलावा ईरान के अनार के मुख्य उत्पादक केन्द्रों में गिने जाने वाले फ़िरदौस क़स्बे में सालाना लगभग 30 हज़ार टन अनार का उत्पादन होता है। पूरे दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत के बाग़ के कुल उत्पादों की आपूर्ति का 40 प्रतिशत भाग अकेले फ़िरदौस क़स्बा आपूर्ति करता है। फ़िरदौस क़स्बे में उत्पादित 80 प्रतिशत अनार फ़ार्स खाड़ी के तटवर्ती देशों, दक्षिण कोरिया सहित दूसरे देशों में निर्यात किए जाते हैं। अनार के उत्पादन की नज़र से फ़िरदौस शहर सावे और नयरीज़ क़स्बों के ईरान में अनार के उत्पादन की नज़र से तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक क़स्बा है। फ़िरदौस क़स्बे में अनार के अत्यधिक उत्पादन के मद्देनज़र अनार से जुड़े उद्योग भी इस क़स्बे में स्थापित किए गए हैं। जैसे 5 हज़ार टन की क्षमता वाले कोल्ड स्टोरेज, अनारीन कंपनी, अनार के कनस्नट्रेट उत्पादित करने वाले कारख़ाने और अनार के उत्पादन की पैकिंग करने वाले कारख़ाने इत्यादि।

 

 

फ़िरदौस क़स्बे में कई प्रकार के अनार उत्पादित होते हैं। ज़्यादा दिनों तक सही रहने की विशेषता के ही कारण इस क़स्बे के अनार दुनिया के सुदूर इलाक़ों तक निर्यात किए जाते हैं। फ़िरदौस के बाग़ के मालिक कोल्ड स्टोरेज के बिना पारंपरिक ढंग से अनार को चार महीने तक सुरक्षित रखते हैं।

दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत में मूल्यवान ऐतिहासिक अवशेष भी हैं। इस प्रांत के पर्यटन की दृष्टि से आकर्षक एवं पंजीकृत चीज़ काल जन्गाल नामक संग निगारे है। काल जन्गाल ख़ूसेफ़ शहर के 5 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यह संग निगारे अश्कानी शासन काल के हैं। नए शोध व अध्ययन के दौरान ख़ूसेफ़ शहर के आस-पास ऐसे १४ पत्थर मिले हैं जिन पर उकेर कर चित्र बनाए गए हैं।

काल जंगाल, रीच पहाड़ की गहरायी में स्थित एक घाटी का नाम है। इस घाटी की अपेक्षाकृत कम ऊंचाई वाली चोटियों पर पत्थरों पर अश्कानी पहलवी लीपि के शिलालेख और प्रतिमाएं पूर्वजों की महान ज़िन्दगी का पता देती हैं। इन शिलालेखों के बीच एक तस्वीर है जिसमें पार्त जाति का एक व्यक्ति शेर से लड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। इस तस्वीर में आदमी अपने दाहिने हाथ को कमर पर रखे हुए और बाएं हाथ से शेर से लड़ता हुआ दिखाई दे रहा है।

 

 

बीरजन्द के कूच गांव के लाख़ मज़ार शिलालेख भी दक्षिणी ख़ुरासान के सबसे प्रतिष्ठित ऐतिहासिक अवशेष में गिने जाते हैं। यह शिलालेख पांच मीटर लंबे और पांच मीटर चौड़ी गहरे हरे रंग की चट्टान पर बनाए गए हैं। इनमें से कुछ शिलालेख इतिहासपूर्व और कुछ इस्लामी दौर के अंतिम दिनों के हैं। इन शिलालेखों की संख्या 307 है। इन पर इंसान, जानवर और वनस्पति के चित्र बने हुए हैं। ये शिलालेख पहलवी, अश्कानी और सासानी काल के हैं। इनमें कुछ अरबी और कुछ फ़ारसी भाषा में हैं।

दक्षिणी ख़ुरासान में मूल्यवान ऐतिहासिक अवशेष के इलावा आश्चर्यजनक प्राकृतिक अवशेष भी हैं। दक्षिणी ख़ुरासान को ईरान में मरुस्थल में घूमने का केन्द्र कहा जा सकता है। इस प्रांत में तीन मरुस्थलीय पर्यटन स्थल हैं जो सेह-क़िले के नाम से जाने जाते हैं। इसके इलावा फ़िरदौस नामक गर्म पानी का उपचारिक विशेषताओं वाला चश्मा फ़िरदौस क़स्बे से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। हर साल बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक इस चश्मे के पानी से नहाते हैं। खनिज विशेषताओं वाले गर्म पानी के चश्मे में नहाने से खाल और जोड़ों की बीमारियां ठीक हो जाती हैं। बहुत से डाक्टर भी इस प्रकार के चश्मे में नहाने का सुझाव देते हैं।

     

दक्षिणी ख़ुरासान का एक और महत्वपूर्ण क़स्बा क़ाएनात है। यह क़स्बा दक्षिणी ख़ुरासान प्रांत के उत्तर में स्थित है। इसका क्षेत्रफल 17722 वर्ग किलोमीटर है। क़ाएनात ज़िले की पूर्वी भाग की लगभग 130 किलोमीटर लंबी सीमा अफ़ग़ानिस्तान से मिलती है।

इतिहासकारों के अनुसार, क़ाएनात क्षेत्र का इतिहास 30 हज़ार साल पुराना है और यह स्थलों में शामिल है जहां ख़ुरासान सभ्यता ने जन्म लिया है। सासानी शासन काल में क़ाएन, ईरान के स्ट्रेटिजिक नज़र से अहम केन्द्रों में गिना जाता था। बहुत से इतिहासकारों ने अपनी किताबों में क़ाएनात का ज़िक्र किया है। इस्तख़री ने इतिहास की अपनी किताब में वर्ष 340 हिजरी शम्सी में क़हिस्तान के केन्द्र के रूप में क़ाएन का उल्लेख किया है और इस क्षेत्र के लोगों का मत शीया बताया है। नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी 440 हिजरी शम्सी में क़ाएन में पहुंचा था और उसने क़ाएन को बड़ा शहर बताया था। वेनिस के मार्कोपोलो ने भी क़ाएन की जलवायु को संतुलित कहा था। याक़ूत हेमवी और अब्दुल्लाह मोहम्मद बिन अहमद मुक़द्देसी ने क़ाएन को ख़ुरासान की बंदरगाह और किरमान के ख़ज़ाने से उपमा दी है। इतिहास में आने वाले उलटफेर से क़ाएन को बहुत ज़्यादा नुक़सान नहीं पहुंचा। इतिहास में मिलता है कि 773 हिजरी शम्सी में तैमूर लंग ने क़ाएन की घेराव कर लिया था लेकिन शहर के शासक की बुद्धिमत्ता से यह शहर रक्तपात से बच गया। सफ़वी काल में 1002 हिजरी शम्सी में शाह अब्बास सफ़वी ने क़ाएन का दौरा किया और वर्षों बाद ज़न्दिया शासन काल में जब लुत्फ़अली ख़ान ज़न्द से किरमान भागा था तो उसने क़ाएन में पनाह ली थी। क़ाएन वासियों ने लुत्फ़अली ख़ान को क़ाएन से वापस जाते वक़्त कुछ घुड़सवार सिपाही ताकि वह आग़ा मोहम्मद ख़ान क़ाजार से जंग करे।

 

 

क़ाएन क़स्बे में ख़ास तौर पर शासकूह संरक्षित शिकारगाह में लगभग 59 प्रकार के परिन्दे, 25 प्रकार के स्तधारी जीव और 17 प्रकार रेंगने वाले प्राणी रहते हैं। इस क्षेत्र में कई नदियां भी बहती हैं। जैसे रूदशूर, रूद बीहूद, अफ़ीन और आहंगरान। गेहूं, जौ, चुक़न्दर, पिस्ता, जाफ़रान, और ख़ूबानी इस क़स्बे के कृषि उत्पाद हैं।

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