Apr २६, २०१६ ११:०९ Asia/Kolkata

शूश ज़िले का क्षेत्रफल 3577 वर्ग किलोमीटर है।

 यह ज़िला ख़ूज़िस्तान प्रांत के उत्तर-पश्चिम में तेहरान-अहवाज़ ट्रान्ज़िट मार्ग पर स्थित है। शूश शहर किसी ज़मान में दुनिया की मशहूर राजधानियों में था। यह शहर कई हज़ार साल पुरानी सभ्यता के निशान और पुरातात्विक अवशेष से समृद्ध है। यह शहर अतिक्रमणकारियों के हमले में बहुत बार तबाह हुआ किन्तु हर बार और बेहतर ढंग से आबाद हुआ। इस प्राचीन इलाक़े और पुरातात्विक अवशेष दुनिया भर के ध्यान को अपनी ओर खींचते हैं।

 

शूश को सबसे पहले रौनक़ देने वाली जाति ईलामी थी जिसने लगभग 3 हज़ार साल ईसापूर्व में शूश को बसाया था। इस जाति के नियंत्रण के वक़्त शूश इतना मशहूर था कि इसे राजधानी बनाया गया। हख़ामनेशी शासन काल में शूश की शान बाक़ी रही और दारयूश हख़ामनेशी ने शूश शहर को सर्दी के मौसम की राजधानी बनाया और मुसलमानों की सफलता के बाद भी कुछ समय तक शूश में उसी तहर रौनक़ बाक़ी रही।

शूश शहर का नाम प्राचीन समय से अब तक कई बार बदल चुका है। पुराने भूगोल शास्त्रियों ने किताबों और लिखित दस्तावेज़ों में मध्ययुगीन शताब्दियों में शूश शहर की शान का उल्लेख किया है और कच्चे रेशम, नारंज और गन्ने की बहुतायत को शूश के मशहूर होने का कारण बताया है। इसके अलावा ईश्वरीय दूत हज़रत दानियाल के मक़बरे ने भी इस शहर को अध्यात्मिक नज़र से भी आकर्षक बना दिया है। हज़रत दानियाल का मक़बरा शाऊर नदी के किनारे स्थित है। इस मक़बरे की इमारत बहुत ही सुंदर बनी हुयी है। वर्षों से लोग शूश शहर को हज़रत दानियाल की वजह से जानते हैं।

 

 

हज़रत दानियाल बनी इस्राईल जाति के महान ईश्वरीय दूत हैं। यहूदियों की ईश्वरीय किताब तौरैत के 12 अध्याय हज़रत दानियाल के बारे में हैं। किताबों में हज़रत दानियाल के चमत्कारों का बहुत उल्लेख मिलता है। वह ईश्वरीय दूत हज़रत दाऊद के वंश से हैं। वह हख़ामनेशी शासक दारयूश और महान कोरोश के ज़माने में थे। 605 साल ईसापूर्व में बुख़्त नस्र शासक के हाथों बैतुल मुक़द्दस की तबाही के बाद हज़रत दानियाल को क़ैदी बनाकर उनकी जाति के लोगों के साथ बाबिल भेजा गया। बाबिल अर्थात मौजूदा इराक़ में उन्हें बुख़्त नुस्र की ओर से बहुत यातना दी गयी किन्तु हज़रत दानियाल अपने ज्ञान व समझदारी से सम्मान पाने में कामयाब हुए। बुख़्त नुस्र के मरने और कोरोश के हाथों बाबिल की फ़त्ह के बाद हज़रत दानियाल बैतुल मुक़द्दस लौटे। लेकिन कुछ मुद्दत बाद वह अहवाज़ चले गए और शूश में उनका स्वर्गवास हुआ। हज़रत दानियाल के स्वर्गवास के बाद ईरानियों ने अपनी रीति-रिवाज के अनुसार हज़रत दानियाल के पार्थिव शरीर को ममी बनाकर एक टीले के ऊपर एक कमरे में रख कर उस कमरे को बंद कर दिया।

ईरान में इस्लाम फैलने के बाद जब मुसलमान सिपाहियों को इस प्रकार के कमरे के बारे में पता चला तो उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के हुक्म से हज़रत दानियाल के पार्थिक शरीर को इस्लामी नियमानुसार दफ़्न किया। हज़रत दानियाल की क़ब्र पर लगे पत्थर पर हज़रत अली के हवाले से एक कथन लिखा है, “जिसने मेरे भाई दानियाल का दर्शन किया वह उस व्यक्ति की तरह है जिसने मेरे दर्शन किए।”

 

 

हज़रत दानियाल नबी के मक़बरे में दो आंगन हैं। एक छोटा और दूसरा बड़ा है। बड़े आंगन के तीन ओर श्रद्धालुओं के लिए कमरे बने हैं। हज़रत दानियाल के रौज़े की ज़रीह पीतल की बनी हुयी है और यह ज़रीह दूसरे इस्लामी दर्शन स्थलों में बनी हुयी ज़रीह की तरह है। हज़रत दानियाल की ज़रीह के ऊपरी भाग में चारो ओर फ़ारसी में शेर लिखे हुए हैं। हज़रत दानियाल की अस्ल क़ब्र भूमिगत कमरे में है। हज़रत दानियाल का मक़बरा बहुत ऊंचा और बेलनाकार है। गुंबद को चूने से बनाया गया है। गुंबद के सामने दोनों ओर हरी टाइल से सजे दो मिनारें हैं। 1316 हिजरी शम्सी में प्रसिद्ध धर्मगुरु शैख़ जाफ़र के हुक्म से हज़रत दानियाल के रौज़े की इमारत की मरम्मत की गयी।

आपको यह भी बताते चलें कि हज़रत दानियाल के रौज़े से सौ मीटर की दूरी पर शूश का म्यूज़ियम स्थित है। इस म्यूज़ियम की विशेषता यह है कि यह म्यूज़ियम आपादाना महल और ख़शायार महल जैसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारत के पास स्थित है। इस म्यूज़ियम की इमारत ईंट की है और इसे 1345 हिजरी शम्सी में बनाया गया। म्यूज़ियम की यह इमारत इस मार्ग के शुरु में स्थित है जो शूश के प्राचीन काम्पलेक्स की ओर जाता है। इस म्यूज़ियम में ईलाम, अश्कानी, हख़ामनेशी, सासानी और इस्लामी सभ्यता की चीज़ें रखी हुयी हैं जिन्हें देखने के लिए देशी विदेशी पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि सद्दाम शासन और उसके पीछे विश्व साम्राज्य की ओर से ईरान पर थोपी गयी आठ साल की जंग के दौरान, शूश के म्यूज़ियम और दानियाल नबी का रौज़ा ही दुश्मन के द्वेष से सुरक्षित नहीं रह सका और इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों को भारी नुक़सान पहुंचा।

 

 

शूश शहर में लगभग 4 किलोमीटर के क्षेत्रफल पर मौजूद टीले, इस इलाक़े में 5 हज़ार साल पुरानी मानव सभ्यता की निशानी हैं। शूश शहर को उसके अवशेषों की नज़र से 4 भाग आकरोपल, आपादाना, शहरशाही और शहरे सनअतग्रान में बांटा जा सकता है।

इन भागों के बारे में संक्षेप में आपको बताते चलें। आकरोपल यूनानी शब्द है जिसका अर्थ होता है शहर का सबसे ऊंचा बिन्दु। इस टीले पर पांचवी सहस्त्राब्दी ईसापूर्व के अंतिम वर्षों की सभ्यता के निशान हैं। इसी प्रकार ईलामी जाति के तस्वीर की शक्ल में चिन्ह पहली बार इसी टीले से बरामद हुए थे। इसी प्रकार मानव समाज का पहला लिखित नियम एक तख़्ती पर जिसे लौहे हमूराबी कहते हैं, और राजा अकिद की नाराम सीन नामक तख़्ती सहित दूसरे मूल्यवान अवशेष इसी स्थल से बरामद हुए हैं। इस टीले पर 1987 में फ़्रांसीसी पुरातनविद जाक डोमोर्गन की अगुवाई में एक क़िला बना दिया गया है। इस क़िले के निर्माण में शूश में खुदाई के दौरान मिलने वाली ईंटों से बनाया गया है। इस क़िले की वास्तुकला यूरोप में मध्ययुगीन शताब्दियों के दौरान बनने वाले क़िलों की तरह है। इस क़िले के निर्माण का उद्देश्य शूश में खुदाई के दौरन मिलने वाली चीज़ों को इस क़िले में सुरक्षित रखना है। शूश में विभिन्न पुरातात्विक टीम की ओर से की गयी खुदाई में मिलने वाली बहुत सी चीज़ें पश्चिमी देश भेज दी गयीं और इस वक़्त वे पेरिस के म्यूज़ियम सहित दुनिया के प्रसिद्ध म्यूज़ियमों की शोभा बढ़ा रही हैं।

 

 

आपादाना नाम के टीले पर इसी नाम से एक महल है जिसे हख़ामनेशी शासक दारयूश प्रथम ने 525 वर्ष ईसापूर्व में बनवाया था। इस महल के खंबों को पत्थर से और दीवारों को ईंट से बनाया गया है। इस महल में बार हाल है, मेहमान कक्ष और दूसरे भाग हैं। लगभग 461 साल ईसापूर्व में जिस वक़्त अर्दशीर प्रथम की हुकूमत थी, इस महल में आग लग गयी थी जिसकी अर्दशीर द्वितीय ने 404-359 ईसापूर्व के बीच मरम्मत करायी थीं। इस महल को सिकन्दर के हमले से नुक़सान पहुंचा और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बचे हुए खंबों को विदेशी अतिग्रहणकारियों ने तोड़ कर पुल और रास्ता बनाने में इस्तेमाल किया। (MAQ)

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