तेहरान-11
इस्लामी शिक्षाओं में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों और महान धार्मिक हस्तियों को ईश्वर अपनी प्राथनाओं से माध्यम क़रार देने पर बहुत बल दिया गया है और मुसलमानों के विभिन्न पंथो में इस विषय को महत्व दिया जाता है।
प्राचीन समय से ही इन हस्तियों की क़ब्रों पर मुसलमान मक़बरे और मज़ार बनाते रहे हैं और उनकी ज़ियारत के लिए जाते रहे हैं, ताकि उन्हें माध्यम बनाकर ईश्वर से अपने पापों की माफ़ी मांग सकें। ईरान में मौजूद मज़ारों और मक़बरों की संख्या से ईरानी समाज में धर्म की गहरी जड़ों का पता चलता है। निःसंदेह इन मक़बरों व मज़ारों का ईरानी समाज पर काफ़ी प्रभाव पड़ा है। तेहरान और उसके आसपास के इलाक़ों में 330 से अधिक मज़ार हैं, लेकिन तजरीश चौक पर इमामज़ादे सालेह और तेहरान के उपनगर में इमामज़ादे दाऊद के मज़ार उल्लेखनीय हैं।

इमामज़ादे सालेह का मज़ार उत्तरी तेहरान के तजरीश इलाक़े में स्थित है, यह तेहरान का एक मुख्य मज़ार है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दुआयें मांगने और आध्यात्मिकता प्राप्त करने के लिए इस मज़ार की ज़ियारत के लिए जाते हैं। इतिहास के अनुसार, इमामज़ादे सालेह शिया मुसलमानों के सातवें इमाम मूसा काज़िम (अ) के पुत्र और आठवें इमाम अली रज़ा (अ) के भाई हैं। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, वे अपने भाई से मुलाक़ात के लिए तूस वर्तमान में मशहद की यात्रा कर रहे थे, लेकिन अब्बासी शासन के तत्वों ने तजरीश के स्थान पर उन्हें शहीद कर दिया। उनकी शहादत के बाद, पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से श्रद्धा रखने वाले उनके मक़बरे पर जाने लगे। पहली बार 12 और 13 ईसवी शताब्दी में उनकी क़ब्र पर एक गुंबद और मज़ार का निर्माण किया गया। क़ब्र के ऊपर बनी इमारत चार बड़े कोणों और चौड़ी दीवारों पर आधारित है। इसका भीतरी भाग, 6.5 मीटर बाइ 6.5 मीटर है। ताक़ों की बनावट और उसके डिज़ाइन से पता चलता है कि इसका निर्माण 7वीं या 8वीं हिजरी क़मरी में किया गया था। मज़ार में प्रयोग किए गए पत्थरों से भी जो पहले हरम की अहाते में थे और अब प्रांगण में लगे हुए हैं, इसकी पुष्टि होती है।
श्रद्धालु जब मज़ार में प्रवेश करते हैं, तो मज़ार की दीवारों पर हुए आईने के सुन्दर काम से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते, मज़ार के केन्द्र में क़ब्र के ऊपर लगी हुई ज़रीह पर चांदी और लकड़ी का काम हुआ है। इस ज़रीह के अंदर एक और ज़रीह है, जिसके केन्द्र में लकड़ी का एक संदूक़ रखा हुआ है। कहा जाता है कि ईरान पर मंगोलों के हमले में इमामज़ादे सालेह के मज़ार की इमारत पूर्ण रूप से नष्ट हो गई थी, जिसका पुनर्निमाण किया गया।

फ़तह अली शाह क़ाजार के पुत्र हलाकू मिर्ज़ा के काल में मक़बरे का निर्माण किया गया और मज़ार के भीतर सजावटी काम और टाइलों का काम किया गया और गुंबद का निर्माण किया गया। उसके बाद भी अनेक बार मरम्मत का काम किया गया है। श्रद्धालुओं की अधिक संख्या को देखते हुए 1995 में मज़ार के विस्तार का कार्य शुरू किया गया जो अभी भई जारी है। इस योजना के अनुसार, तीन चरणों में 16 हज़ार वर्ग मीटर के इलाक़े को इसमें शामिल किया जाएगा।
यह मज़ार वर्मान समय में 5300 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में बना हुआ है। गुंबद के बाहरी भाग पर नीली टाइलों से इस्लामी चित्रकारी हुई है। गुबंद की ऊंचाई लगभग 13 मीटर है और चौड़ाई 14 मीटर है। इमारत के दोनों ओर दो मीनारें बनी हुई हैं, इन्हें भी नीली टाइलों से सजाया गया है। मीनारों की ऊंचाई लगभग 40 मीटर है।
मज़ार के भीतर चार द्वारमण्डप हैं, जिनमें से दो पुरुषों के लिए और अन्य महिलाओं के लिए हैं। द्वारमण्डप के द्वार लकड़ी के काम से सजाए गए हैं। मज़ार की वर्तमान ज़रीह, इस्फ़हान में बनाई गई थी। 1976 में इस ज़रीह को पुरानी ज़रीह के स्थान पर लगाया गया था।
मज़ार की इमारत हालों, प्रांगणों, मीनार, कमरों और गुंबद पर आधारित है। इमारत के मध्य में गुंबदख़ाना है जो उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी हालों को एक दूसरे से जोड़ता है। प्रांगण में एक आयताकार हौज़ है। मज़ार के पश्चिमोत्तरी भाग में शहीदों का क़ब्रिस्तान है।

चारों दिशा में मज़ार के चार द्वारा हैं। उत्तरी द्वार सीधे बाज़ार में खुलता है, पश्चिमी और पूर्वी द्वारों का भी एक प्रकार से बाज़ार से संबंध है। दक्षिणी द्वार सामान्य रूप से बंद रहता है और केवल विशेष समारोह के समय खोला जाता है।
पुराने ज़माने में इस मज़ार में एक चिनार का वृक्ष था, एक अनुमान के मुताबिक़, इस वृक्ष की आयु 800 वर्ष से ज़्यादा थी। चिनार का यह पेड़ इस मज़ार के नीचे कृत्रिम भूमिगत नहर के सूखने के साथ ही सूख गया। मज़ार की इमारत को 1350 हिजरी शम्सी में राष्ट्रीय धरोहर के रूप में दर्ज किया गया है।
सैद्धांतिक रूप से इमामज़ादे अन्य लोगों की तुलना में अपने पूर्वजों अर्थात इमामों की सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर के वारिस होते हैं और ज्ञान एवं अन्य गुणों से सुसज्जित एक विशिष्ट हस्ती होते हैं। उन्होंने लोगों के मार्गदर्शन के लिए प्रयास किए और सत्य के मार्ग में शहीद हो गए। यही कारण है कि इनके मज़ार ज्ञान और इस्लामी संस्कृति के प्रसार का केन्द्र रहे हैं। प्राचीन समय से ही अधिकांश मज़ारों में पुस्तकालय भी रहे हैं। इस मज़ार के दक्षिणी भाग में पुस्तकालय की 4 मंज़िला इमारत है। इस पुस्तकालय में 20000 से अधिक किताबे हैं। इस पुस्तकालय की व्यवस्था विशेष पुस्तकालयों की भांति है। इस्लामी विषयों में शोध करने वाले इससे अधिक लाभ उठाते हैं।
इमामज़ादे सालेह के मज़ार में भी अन्य मज़ारों की भांति ईद, मोहर्रम और अन्य अवसरों पर समारोहों और शोक सभाओं का आयोजन किया जाता है। अन्य शहरों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए इस मज़ार में मुसाफ़िरख़ाना भी मौजूद है।
तेहरान के उत्तर पश्चिम में रंदान और तूचाल पहाड़ों के बीच फ़रहज़ाद इलाक़े में लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर एक मज़ार है। यह मज़ार इमामज़ादे दाऊद का है। बल खाते हुए रास्तों और हरे भरे सुन्दर पहाड़ों के बीच से गुज़र कर श्रद्धालु इस मज़ार तक पहुंचते हैं। इमामज़ादे दाऊद का नाम शरफ़ुद्दीन दाऊद बिन इमादुद्दीन याहया है, इतिहासकारों और विद्वानों के अनुसार, इमामज़ादे दाऊद पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हैं।

तेहरान और ईरान के लोग इनके प्रति ख़ास श्रद्धा रखते हैं। कहा जाता है कि उनका जन्म 1049 ईसवी में हुआ था।
वे अलवी सादात के प्रतिरोधी युवा थे। उन्होंने अत्याचारी अब्बासी शासकों के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू किया और उत्तरी तेहरान में रहने वाले अलवी सादात से जुड़ने के लिए पहाड़ी रास्ते का चयन किया और जिस स्थान पर उनका मज़ार है वहीं उन्हें शहीद किया गया था।
पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों से ईरानियों की विशेष श्रद्धा के कारण, इस मज़ार पर भी श्रद्धालुओं का तांता बंधा रहता है। प्रति वर्ष विशेष रूप से वसंत और गर्मियों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मन्नतें मांगने इस मज़ार पर पहुंचते हैं।
मज़ार के आस पास कीगा, रंदान, संगान और दहस्तान सूल्क़ान गांव कन नदी के किनारे स्थित हैं। सर्दियों के मौसम में बर्फ़ इलाक़े को ढांप लेती है और गर्मियों के मौसम में यहां मौसम हल्का ठंडा और ख़ुशनुमा रहता है।

इस इलाक़े के लोग पशुपालन और बाग़बानी करते हैं। इस इलाक़े के उत्पादों में चेरी और अख़रोट उल्लेखनीय है। मज़ार के आसपास के गांवों के निवासी यहां आने वाले श्रद्धालुओं का स्वागत करते हैं और यह उनकी आय का भी स्रोत है। मज़ार से सबसे निकट कीगा गांव है, जिसके निवासी श्रद्धालुओं को घर किराए पर देकर और ज़रूरत का सामान बेचकर अपना गुज़ारा करते हैं।
इमामज़ादे दाऊद के मज़ार का क्षेत्रफल लगभग 2000 वर्ग मीटर है और मज़ार की इमारत का क्षेत्रफल 1200 वर्ग मीटर है। मज़ार के प्रांगण के नीचे से एक नदी बहती है। यह मक़बरा सफ़वी शासनकाल में बनाया गया था और फ़तह अलीशाह के काल में इसका विस्तार किया गया। हालिया वर्षों में भी मज़ार की होने वाली आय से यहां निर्माण कार्य किया गया है। मज़ार के आसपास के इलाक़े में दुकानें, रेस्टोरेंट, स्वीमिंग पूल, चिड़ियाघर और पार्क हैं। इस मज़ार में श्रद्धालुओं के लिए पुस्तकालय भी है। तेहरान के उपनगर और पहाड़ी इलाक़े में स्थित होने के कारण पर्यटकों के लिए भी यह आकर्षण का केन्द्र है। धार्मिक आयाम के अलावा, सुन्दर इलाक़े में स्थित होने के कारण लोग सैर के लिए भी एक या दो दिन के लिए यहां जाते हैं। पहाड़ी इलाक़े में ऊंचाई पर स्थित होने के कारण, यहां पहाड़ पर चढ़ने का भी आनंद लिया जा सकता है।