इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम
सन 260 हिजरी क़मरी में इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को 28 वर्ष की आयु में शहीद कर दिया गया।
पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के परिजनों व इमामों का जीवन, समाज व लोगों के प्रशिक्षण के लिए शिक्षाओं व सिद्धांतों का संग्रह है। इन महापुरुषों ने अत्याचारी व्यवस्था के अत्याचारों और बहुत अधिक सीमित्ता के करण इस्लाम धर्म की शिक्षाओं के प्रचार व प्रसार में बहुत अधिक कठिनाइयां सहन कीं। यह प्रतिबंध हज़रत इमाम मुहम्मद तक़ी और इमाम अली नक़ी अलैहमस्सलाम विशेषकर इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के काल में अपने चरम को पहुंच गये थे। इस प्रकार से कि अब्बासी शासक ने इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम और उनके चार वर्षीय सुपुत्र हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को पवित्र नगर मदीना छोड़ने पर विवश किया और अपनी राजधानी बुला लिया। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने जनता के मार्गदर्शन का ईश्वरीय दायित्व संभाला और छह साल तक बहुत ही कठिन परिस्थियों में वे विभिन्न राजनैतिक व सामाजिक क्षेत्रों में अपने कुछ दृष्टिकोणों को अपने साथियों से बयान कर सके। अब्बासी शासकों की ओर से लगाये गये प्रतिबंधों और कठिनाइयों के बावजूद लोगों के मध्य उनकी लोकप्रियता में वृद्धि होती गयी। यह इसलिए थी कि वह दीप जो पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों ने जलाया था, सत्य का दीप था जो कदापि बुझ नहीं सकता।
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की इमामत का काल अब्बासी शासकों के काल का सबसे अशांत काल था। शासकों की अयोग्यताएं, दरबारियों में तनाव, लोगों की अप्रसन्नता, एक के बाद एक विद्रोह और भ्रष्ट विचारों का प्रसार, उस समय की सामाजिक व राजनैतिक उलथ पुथल के मुख्य कारण थे। शासक लोगों का शोषण करते थे और लोगों के माल व धन से भव्य महल व इमारत बनवाते थे और जनता की परेशानियों पर तनिक भी ध्यान नहीं देते थे। लोगों तक यह समाचार पहुंच चुका था कि जो विश्व को अत्याचारों और अन्याय से छुटकारा दिलाएगा वह इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का सुपुत्र होगा। वह संसार के मुक्तिदाता हैं जो अपने आंदोलन से विश्व से अत्याचार का सर्वनाश कर देंगे। इस समाचार के फैलते ही अब्बासी शासकों की ओर से प्रतिबंध बढ़ा दिए गये और यह प्रतिबंध इस सीमा तक बढ़ गये थे कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को सप्ताह में दो दिन अब्बासी शासक के दरबार में उपस्थित होना पड़ता था। अब्बासी शासकों के व्यापक प्रयासों के बावजूद, ईश्वरीय वाणी व्यवहारिक हुई और इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के सुपुत्र हज़रत इमाम मेहदी ने संसार में क़दम रखा। हज़रत इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम के जन्म के बाद इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने समाज को आने वाली कठिइनायों के लिए तैयार करने की नीति अपनाई। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने विभिन्न अवसरों पर इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम के लोगों की नज़रों से ओझल होने और उस काल में अपने सुपुत्र इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम की प्रभावी भूमिका को बयान किया है। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम बल देते थे कि उनके पुत्र के हाथों ही पूरी दुनिया में न्याय की स्थापना होगी।
उस काल में जब विचार भ्रष्ट हो गये थे और धर्म में नयी नयी बातें शामिल की जा रही थी, इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने पूरी पारदर्शिता और सच्चाई से वास्तविक धर्म को लोगों के सामने पेश किया। वे ज्ञान के प्यासों को वास्तविक ज्ञान से तृप्त करते थे। ज्ञान की चर्चाओं में इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के ठोस तर्क, इतने प्रभावी थे कि प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री याक़ूब बिन इस्हाक़ किन्दी इमाम से शास्त्रार्थ करने के बाद सच्चाई समझ गया और उसने वह किताब जो उसने पवित्र क़ुरआन के विरुद्ध लिखी थी, जला दी।
अब्बासी शासन की इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सला से शत्रुता के बावजूद, इस शासन के एक मंत्री अहमद बिन ख़ाक़ान ने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के गुणों और विशेषताओं को स्वीकार किया और इस प्रकार कहा कि सामर्रा में मैंने हसन इब्ने अली जैसा कोई नहीं देखा। प्रतिष्ठा, पवित्रता और बड़प्पन में लोगों में उन जैसा कोई नहीं है, बावजूद इसके कि वह युवा हैं बनी हाशिम अपने बुज़र्गों पर उन्हें प्राथमिकता देते हैं। वह इतने उच्च स्थान के स्वामी हैं कि मित्र और शत्रु सभी उनकी प्रशंसा करते हैं।
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का यह सम्मान व प्रतिष्ठा, ईश्वर के समक्ष उनके नतमस्तक होने और सत्य के समक्ष समर्पण होने के कारण था। वह इस संबंध में स्वयं कहते हैं कि कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति सत्य से दूर नहीं हुआ मगर यह कि वह लज्जित हुआ और कोई छोटा व्यक्ति सत्य से नहीं जुड़ा मगर यह कि उसने सम्मान पाया।
जिस वस्तु ने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम सहित पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के परिजनों को कठिन मार्गों को सहन करने में सहायता की और उनको ईश्वरीय आदेशों के क्रियान्वयन में अडिग रखा, ईश्वर से प्रेम, स्नेह और उस पर उनका भरोसा था। उपासना और ईश्वर से प्रेम, मनुष्य की प्रवृत्ति में सम्मलित है और यह भीतरी आकर्षण, भीषण घटनाओं में उसकी सहायता करता है। ईश्वर के नेक बंदे उपासना के उच्च स्थान को प्राप्त करके, भीतरी व बाहरी समस्याओं से छुटकारा पा लेते हैं और शिष्टाचार के शिखर पर पहुंच जाते हैं।
पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजन इन लोगों में सबसे आगे हैं। वह सर्वसमर्थ ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होकर सर्वश्रेष्ठ स्थान पर पहुंच गये हैं जिन्होंने अनेकेश्वरवाद, भौतिकवाद और अत्याचारी शासकों के मुक़ाबले में तनिक भी विफलता का आभास नहीं किया। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के आचरण में आया है कि जब वह कारागार में थे तो उन्होंने अपने सारे समय को ईश्वर की उपासना और ईश्वर की याद में इस प्रकार बिताया कि जेलर भी उनसे प्रभावित हो गया। अब्बासी शासक के कुछ निकटवर्ती लोग सालेह बिन वसीफ़ के पास आते हैं और कहते हैं कि अबू मुहम्मद पर जितनी सख़्ती कर सकते हो, करो और उन्हें किसी भी प्रकार की छूट न दो। सालेह बिन वसीफ़ ने उनके उत्तर में कहा कि मैं क्या करूं? मैंने अपने जेल के सबसे ख़तरनाक व क्रूर कर्मियों को उनपर नज़र रखने के लिए तैनात किया है और दोनों ही अबू मुहम्मद के साथ रहने के प्रभाव में, न केवल यह कि उन्हें एक बंदी के रूप में नहीं देखते बल्कि वह दोनों ही नमाज़, रोज़े और उपासना में श्रेष्ठ स्थान पर पहुंच गये। उसके बाद उसने उन दोनों को अपने पास बुलाया। शासक के साथियों ने उनसे कहा कि धिक्कार हो तुम पर, तुम को क्या हो गया है कि इस बंदी के बारे में लापरवाही कर रहे हो? उन दोनों ने कहा कि उस व्यक्ति के बारे में जो दिनों में रोज़े रखता है, पूरी रात जागकर ईश्वर की उपासना करता है, क्या कहूं? वह ईश्वर की उपासना और उससे दुआ करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं करता, जब वह मेरी ओर देखते थे तो उनका वैभव व धाक मेरे पूरे अस्तित्व पर छा जाती थी।
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम एक कथन में नमाज़ पढ़ने वालों के स्थान के बारे में कहते हैं कि जब कोई बंदा अपने नमाज़ पढ़ने के स्थान की ओर जाता है ताकि नमाज़ पढ़े तो ईश्वर अपने फ़रिश्तों से कहता है कि क्या तुम मेरे बंदे को नहीं देख रहे हो कि किस प्रकार हर एक से कटकर मेरी ओर आया है, जबकि मेरी कृपा और दया से आशान्वित है। मैं तुम्हें गवाह बनाता हूं कि उसे अपनी कृपा और दया का पात्र बनाऊंगा।
ईश्वर का सच्चा बंदा जो ईश्वर की उपासना और उससे दुआ करने का स्वाद चखते हैं, अपनी प्रतिष्ठा और कल्याण को ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होने में ही देखता है और उसका मानना है कि ईश्वर से निकट होने की सबसे निकट स्थिति सज्दा है। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम सदैव अपने अनुयाइयों को लंबा सज्दा करने की अनुशंसा करते थे और कहते थे कि मैं तुम्हें तुम्हारे धर्म में ईश्वरीय भय, ईश्वर के लिए प्रसास और लंबे सज्दे करने की अनुशंसा करता हूं।
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का वैचारिक व अध्यात्मिक प्रभाव और उनकी सत्य प्रेमी बातें, अब्बासी शासकों को बहुत खटकती थीं और वह सदैव इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को अपने रास्ते से हटाने के बारे में सोचते रहते थे। यही कारण है कि अत्याचारी अब्बासी शासक मोअतमद इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को षड्यंत्र द्वारा शहीद करना चाहता था और अंततः वह अपने इस षड्यंत्र में सफल हो गया और उसने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को विष दिलवा दिया। विष दिए जाने के बाद इमाम कई दिनों तक बीमार रहे और फिर शहीद हो गये।
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का सेवक कहता है कि जब इमाम अस्करी बीमार थे और जीवन की अंतिम घड़ियां थीं, उसी दौरान उन्हें पता चला कि सुबह की नमाज़ का समय हो गया तो उन्होंने कहा कि मैं नमाज़ पढ़ना चाहता हूं। मैंने उनकी जानमाज़ उनके बिस्तर पर बिछा दिया। इमाम अलैहिस्सलाम ने वज़ू किया और सुबह की अंतिम नमाज़ अपने बिस्तर पर पढ़ी और उसके कुछ क्षण बाद उनका स्वर्गवास हो गया।