तेल का राष्ट्रीयकरण
२९ इस्फन्द १३२९ हिजरी शमसी अर्थात २० मार्च १९५० को साम्राज्यवादी शक्तियों से ईरानी राष्ट्र के मुकाबले का एक महत्वपूर्ण दिन है।
इस दिन को ईरानी राष्ट्र के इतिहास में तेल के राष्ट्रीयकरण का नाम दिया गया है। २९ इस्फन्द का दिन देशीय एवं विदेशी साम्राज्य से मुकाबले में ईरानी राष्ट्र की सफलता का दिन है। ईरानी राष्ट्र का इतिहास इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले बहुत सारे उतार- चढ़ाव से भरा पड़ा है जिनमें से एक ईरानी राष्ट्र की सम्पत्ति के स्रोतों की लूट- खसोट है।
गुलिस्तान और तुर्कमनचाय जैसे समझौते इस बात के सूचक हैं कि ईरान अतीत में किस प्रकार यूरोपीय, रूसी और उसके बाद अमेरिकी सरकारों के लिए प्रतिस्पर्धा स्थल था। वर्चस्ववादी शक्तियां ईरानी शासकों की कमज़ोरी का लाभ उठाकर अपने दृष्टिकोणों को उन पर थोपती थीं और उनसे विशिष्टताएं प्राप्त करती थीं। इन समझौतों में से एक वह समझौता था जिसे ईरानी सरकार ने baron Julius reuter से किया था। इस समझौते के अंतर्गत समस्त जंगलों, नहरों, पत्थर के कोयले की खदानों, लोहे की खदानों, तांबा, जस्ता और तेल आदि की खदानों से ७० वर्षों तक एक विदेशी कंपनी को लाभ उठाने की अनुमति दे दी गयी। इस समझौते के अनुसार १५ प्रतिशत लाभ ईरानी कंपनी को दिया जाता। यह समझौता इतना विचित्र और विश्वास न करने योग्य था कि एक प्रसिद्ध ब्रितानी राजनेता लार्ड कर्ज़न इस समझौते के बारे में इस प्रकार लिखता है” एक देश के समस्त औद्योगिक स्रोतों को एक विदेशी कंपनी के हवाले कर दिया जाना विचित्र है और तेहरान में ब्रिटेन से दोस्ती कभी इस सीमा तक गहरी नहीं हुई थी” उस समय ईरानी तेल के स्रोतों से ७० वर्षों तक लाभ उठाये जाने को एक ब्रितानी व्यक्ति baron Julius reuter के हवाले कर दिया गया। इस समझौते के ११वें अनुच्छेद में आया है कि पेट्रोल या वही तेल/ पत्थर के कोयले, लोहे, तांबे और जस्ते की खदानों की सूचि में है यानी इससे लाभ उठाया जाना भी इन चीज़ों की खदान की सूचि में शामिल है।
यह समझौता १८७० में किया गया था इसके लगभग ३० वर्ष बाद भी यानी वर्ष १९०२ में समूचे ईरान में ६० वर्षों तक तेल की खोज, उसे निकालने और उसे बेचने की ज़िम्मेदारी विलियम नाक्स डारसी नाम के व्यक्ति के हवाले कर दी गयी। इस समझौते में उत्तरी ईरान के पांच क्षेत्र शामिल नहीं थे। इस समझौते के अनुसार ईरान को केवल १६ प्रतिशत लाभ दिया जाता परंतु ब्रितानी इस थोड़े से भाग को भी देने के लिए तैयार नहीं थे और इस समझौते के आरंभ से ब्रितानी एवं ईरानी कंपनियों के मध्य फाएदे को लेकर सदैव विवाद एवं असमंजस रहा।
द्वतीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन, पूर्व सोवियत संघ और उसके बाद अमेरिका द्वारा ईरान का अतिग्रहण कर लेने के बाद समस्त स्रोतों विशेषकर तेल के स्रोतों को लेकर साम्राज्यवादी शक्तियों के मध्य प्रतिपर्धा तेज़ हो गयी। इस मध्य ब्रिटेन की सरकार ने अपने वर्चस्व की सुरक्षा के परिप्रेक्ष्य में वर्ष १९३३ में ईरान के साथ एक अन्य समझौता किया जो “गैस गुलशाइयान” के नाम से प्रसिद्ध है। इस समझौते पर ईरानी समाज के जागरुक लोगों विशेषकर आयतुल्लाह काशानी ने कड़ी आपत्ति जताई। अलबत्ता ब्रिटेन की साम्राज्यवादी सरकार ने जब यह आपत्ति देखी तो उसने दारसी नामक समझौता निरस्त करके ईरानी सरकार से एक दूसरा समझौता किया जो उससे भी बदतर था और यह समझौता १९३३ के समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आयतुल्लाह काशानी ने इस पर आपत्ति जताते हुए ब्रिटेन की तेल कंपनी के विरुद्ध कड़े शब्दों पर आधारित एक विज्ञप्ति जारी की और कुछ ईरानी प्रतिनिधियों ने संसद में इस समझौते को निरस्त करने का प्रस्ताव भी दिया परंतु चूंकि ब्रिटेन की साम्राज्यवादी सरकार स्थिति को अपने हित में परिवर्तित करने की चेष्टा में थी इसलिए शाह के सुरक्षा कर्मचारियों ने रात को संघर्षकर्ता धर्मगुरू आयतुल्लाह काशानी को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया और उसके बाद उन्हें किरमानशाह स्थानांतरित कर दिया जहां से उन्हें लेबनान देश निकाला दे दिया गया।
उसी काल में ईरानी संविधान में कुछ परिवर्तन करके संसद को भंग करने जैसे कुछ अधिकार ईरानी शाह को दे दिये गये और १९३३ में होने वाले समझौते को क़ानूनी करने के लिए गैस गुलशाइयान समझौते में एक पूरक जोड़ने के प्रस्ताव को संसद में पेश किया गया परंतु वह पारित न हो सका। यहां तक कि संसद का १५वां दौर समाप्त हो गया और १६वां दौर आरंभ हो गया। इस दौर में तेहरान के लोगों और कुछ वरिष्ठ धर्मगुरूओं के प्रयास से आयतुल्लाह काशानी स्वदेश लौट आये। १६वीं संसद की आरंभिक एक बैठक में आयतुल्लाह काशानी ने एक संदेश दिया जिसमें उन्होंने अपने देश निकाले जाने सहित कुछ बातों को ग़ैर कानूनी बताते हुए उस पर आपत्ति जताई थी। आयतुल्लाह काशानी के संदेश के एक भाग में आया है” ईरान का तेल ईरानी राष्ट्र से संबंधित है और ज़ोर ज़बरदस्ती से किये जाने वाले किसी समझौते का कोई कानूनी महत्व नहीं है और वह ईरानी राष्ट्र को उसके अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता”
ईरानी तेल के राष्ट्रीयकरण के लिए आयतुल्लाह काशानी ने बहुत प्रयास किया। इस संबंध में उन्होंने एक विज्ञप्ति जारी की जिसमें तेल के राष्ट्रीयकरण के लिए किये जाने वाले प्रयास को धार्मिक एवं राष्ट्रीय दायित्व बताया और लोगों ने आयतुल्लाह काशानी तथा कुछ जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व में तेल के राष्ट्रीयकरण के लिए प्रदर्शन किया। अंततः २९ इसफन्द १३२९ हिजरी शमसी को एक प्रस्ताव पारित करके ईरानी तेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
ईरानी तेल के राष्ट्रीयकरण होने का यह अर्थ नहीं था कि ईरान के विरुद्ध ब्रिटेन की साम्राज्यवादी कार्यवाहियां समाप्त हो गयीं बल्कि ईरानी तेल के राष्ट्रीय करण का अर्थ मध्यपूर्व में ब्रिटेन के अवैध हितों के एक भाग का उसके हाथ से निकल जाना था और यही विषय इस बात का कारण बना कि वर्ष १९५३ में अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर तत्कालीन ईरानी प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसद्दिक़ की सरकार के खिलाफ विद्रोह करवा दिया। इस विद्रोह के बाद ब्रिटिश पेट्रोलियम कंपनी, शेल पेट्रोलियम एन वी, गल्फ आयल कार्पोरेशन, मोबिल आयल कार्पोरेशन, स्टंडर्ड आयल कंपनी जैसी कई कंपनियों ने ईरानी तेल के क्षेत्र में नये संकाय का गठन किया।
आयतुल्लाह काशानी उस संवेदशनशील समय में सरकार के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए उठ खड़े हुए और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के नाम पत्र लिखा। उन्होंने नये संकाय के संबंध में जो विज्ञप्ति जारी की थी उसमें अमेरिका और ब्रिटेन की राजनीति तथा इन दोनों देशों की सांठ- गांठ पर तीव्र हमला किया था परंतु चूंकि अमेरिका और ब्रिटेन को समय की ईरानी सरकार का समर्थन प्राप्त था इसलिए उन्होंने १६ कंपनियों से मिलकर बने संकाय के दृष्टिकोणों को ईरानी सरकार पर थोप दिया और एक बार फिर ईरानी तेल की लूट- खसोट शुरू हो गयी और व्यवहारिक रूप से तेल के राष्ट्रीयकरण को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और तेल की खोज, उसे निकालना और उससे संबंधित समस्त गतिविधियां विदेशी एवं पश्चिमी कंपनियों के हवाले कर दी गयीं यहां तक कि यह स्थिति ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता तक जारी रही और उसके आर्थिक दुष्परिणाम क्रांति के सफल होने के बाद वर्षों तक दिखाई दे रहे थे। यहीं नहीं जब ईरान- इराक युद्ध आरंभ हुए तो विदेशी कंपनियों व देशों पर निर्भरता पहले से अधिक स्पष्ट हो गयी।
इस निर्भरता से ईरान के राष्ट्रीय हितों को बहुत नुकसान पहुंचा है। इसी कारण आज ईरान की अर्थ व्यवस्था में प्रगति के मार्गों को ढ़ूढा एवं उनकी समीक्षा की जा रही है और इस संबंध में प्रयास किये जा रहे हैं। इस समय एक प्रयास यह किया जा रहा है कि ईरान की अर्थ व्यवस्था केवल तेल पर निर्भर न रहे। हां यह एक अलग मुद्दा है कि तेल किस तरह विकास व प्रगति का कारण बन सकता है। यह वह मामला है जिसे बहुत से मध्यपूर्व के देशों को सामना है। जिन देशों की आय का मुख्य स्रोत केवल तेल है उन्हें सदैव वर्चस्ववादी एवं ज़ोर ज़बरदस्ती करने वाली शक्तियों की ओर से भय रहता है।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि तेल ऐसी चीज़ है जिससे होने वाली आमदनी विभिन्न क्षेत्रों में विकास का कारण बनती है। दूसरे शब्दों में देश व समाज के विकास में तेल से होने वाली आय की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती।
यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि प्रतिरोधक अर्थ व्यवस्था में तेल पर निर्भरता कम की जा रही है और यह वह चीज़ है जिस पर ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने बल दिया है। इस समय ईरान का तेल उद्योग इस प्रकार हो गया है कि वह पड़ोसी देशों के लिए आदर्श व आधार बन गया है। पिछले तीन दशकों से प्रतिबंध होने के बावजूद ईरान के तेल उद्योग ने ध्यान योग्य विकास व प्रगति की है।