पवित्र रमज़ान पर विशेष कार्यक्रम-२०
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महान व सर्वसमर्थ ईश्वर का आभार प्रकट करते हैं कि उसने मुझे २०वां रोज़ा रखने का सौभाग्य प्रदान किया।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jun १९, २०१६ ०६:२३ Asia/Kolkata

महान व सर्वसमर्थ ईश्वर का आभार प्रकट करते हैं कि उसने मुझे २०वां रोज़ा रखने का सौभाग्य प्रदान किया।

महान व सर्वसमर्थ ईश्वर का आभार प्रकट करते हैं कि उसने मुझे २०वां रोज़ा रखने का सौभाग्य प्रदान किया। उससे हमारी प्रार्थना है कि वह हमारे लिए स्वर्ग का द्वार खोले और पवित्र क़ुरआन की तिलावत का सामर्थ्य प्रदान करे और हमारे दिलों को शांति प्रदान करे।

 

इस्लामी इतिहास में आया है कि  पैग़म्बरे इस्लाम ने रमज़ान के पवित्र महीने में शाअबानिया नाम का प्रसिद्ध ख़ुत्बा दिया। उस समय हज़रत अली अलैहिस्सलाम उठे और फरमाया हे ईश्वरीय दूत! इस महीने में सबसे बेहतरीन कार्य क्या है? पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया हे अबुल हसन! इस महीने में बेहतरीन कार्य ईश्वर द्वारा हराम किये गये कार्यों से दूरी करना है और उसके बाद वह रो पड़े। हज़रत अली ने उनसे पूछा हे ईश्वर के दूत आप क्यों रो रहे हैं? पैग़म्बरे इस्लाम ने उत्तर दिया हे अली! मैं इसलिए रो रहा हूं कि इस महीने में तुम्हारा सम्मान नहीं किया जायेगा। मानो मैं देख रहा हूं कि तुम अपने पालनहार की नमाज़ पढ़ने की हालत में हो और सबसे पहला और सबसे अंतिम बदबख़्त समूद जाति के ऊंट की हत्या करने वाले का भाई है जो उठेगा और तुम्हारे सिर पर तलवार मारेगा और तुम्हारे सिर के ख़ून से तुम्हारी दाढ़ी रंगीन होगी।“ आज पवित्र रमज़ान महीने की २० तारीख़ है। कल रमज़ान महीने की २१ तारीख़ है यानी उस महान हस्ती की शहादत का दिन है जो शिष्टाचार, व्यवहार, साहस, बहादुरी और उपासना आदि समस्त गुणों में उस सीमा पर थी जिसे दोस्त- दुश्मन सबने स्वीकार किया है।

 

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम एकमात्र वह व्यक्ति हैं जिसके बारे में ओहद नामक युद्ध में हज़रत जीब्राईल ने प्रसिद्ध वाक्य कहा है कि अली के सिवा  कोई बहादुर नहीं है और ज़ुलफ़ेक़ार के अलावा कोई तलवार नहीं है। अरब में अली वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम का अनुसरण किया। वह एकमात्र हस्ती हैं जिन्हें पैग़म्बरे इस्लाम ने अपना भाई बनाया और फरमाया तुम लोक- परलोक में मेरे भाई हो”

हज़रत अली अलैहिस्सलाम एकमात्र वह हस्ती हैं जिनके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है मैं ज्ञान का शहर हूं और अली उसके द्वार हैं तो जिसे ज्ञान चाहिये वह इस द्वार से आये”

हज़रत अली एकमात्र वह हस्ती हैं जिनके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है” अली का अधिकार मेरे अनुयाइयों पर उस तरह से है जिस तरह से बाप का बेटे पर अधिकार होता है।“ हज़रत अली वह एकमात्र महान हस्ती हैं जो मक्का से मदीना पलायन की रात पैग़म्बरे इस्लाम के बिस्तर पर सोये रहे। पवित्र कुरआन ने इस बारे में कहा है” ईमानदार लोगों में से कुछ ईश्वर की प्रसन्नता के लिए अपनी जान को बेचते हैं और ईश्वर अपने बंदों के प्रति कृपालु है।“

 

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ही वह महान हस्ती हैं जिनके घर के द्वार को पैग़म्बरे इस्लाम ने मस्जिदुन्नबी की ओर खोला था और वही हैं जिनकी महानता को शत्रुओं ने स्वीकार किया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम शहीद के पिता, शहीद के पति और शहीद के भाई के अतिरिक्त स्वयं भी  रमज़ान के पवित्र महीने में शहीद हुए।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में जो वसीयत की है वह शिक्षाप्रद बिन्दुओं से भरी पड़ी है। इस वसीयतनामे अर्थात वसीयतपत्र में इस प्रकार आया है” यह वह चीज़ है जिसका अबुतालिब का बेटा अली वसीयत करता है। वह ईश्वर के एक होने की गवाही देता है और स्वीकार करता है कि मोहम्मद उसके बंदे व उसके दूत हैं ईश्वर ने उन्हें भेजा है ताकि दूसरे धर्मों पर अपने धर्म को विजय दिलाये। बेशक नमाज़, उपासना और मेरा जीवन ईश्वर का है। उसका कोई सहभागी नहीं है मुझे इसका आदेश दिया गया है और उसके समक्ष नतमस्तक हूं तुम्हारे लिए आवश्यक है कि तुम एक दूसरे के साथ भलाई करो। एक दूसरे से द्वेष और फूट से दूर रहो। अच्छे कार्यों और तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय में एक दूसरे की सहायता करो और पाप एवं शत्रुता में एक दूसरे की सहायता न करो। तक़वा अपनाओ कि ईश्वर का दंड बहुत कड़ा है।“

 

 

पैग़म्बरे इस्लाम ने रमज़ान के पवित्र महीने के आगमन पर शाअबानिया नाम का जो प्रसिद्ध ख़ुत्बा दिया था उसके एक भाग में आया है हे लोगो!सच में इस महीने में स्वर्ग के द्वार खुले हैं तो अपने पालनहार से चाहो कि वह उन्हें तुम्हारे लिए बंद न करे और इस महीने में नरक के द्वार भी बंद हैं तो ईश्वर से चाहो कि वह उन्हें तुम पर न खोले। इसी प्रकार शैतान ज़न्जीर में हैं तो अपने पालनहार से चाहो कि वह उन्हें तुम पर हावी न होने दे।“

 

पवित्र क़ुरआन के कुछ व्याख्याकर्ताओं और शिष्टाचार के विद्वानों का मानना है कि स्वर्ग के द्वार खुले रहने से तात्पर्य यह है कि महान ईश्वर रमज़ान महीने में विभिन्न बहानों से अपने बंदों को माफ़ करता है और नमाज़, रोज़ा, पवित्र क़ुरआन की तिलावत करने, दान देने, निकट संबंधियों से संबंध रखने जैसे कार्यों के माध्यम से उन्हें स्वर्ग का पात्र बनाता है और इसी प्रकार उन्हें विभिन्न बहानों से नरक की आग से मुक्ति प्रदान करता है।

हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम स्वर्ग और नरक के बारे में फरमाते हैं” ईश्वर ने किसी सृष्टि की रचना नहीं की मगर यह कि उसके लिए स्वर्ग व नरक में एक स्थान को पैदा किया। तो जब स्वर्ग में रहने वाले स्वर्ग में और जब नरक में रहने वाले नरक में            रहने लगेंगे तो एक आवाज़ देने वाला आवाज़ देगा हे स्वर्ग में रहने वालों! ध्यान दो तो वे भी नरक की आग को देखने लगेंगे और नरक में उनके स्थान दिखाई देने लगेंगे उसके बाद उनसे कहा जायेगा ये तुम्हारे स्थान हैं अगर तुम पाप किये होते और अपने पालने वाले की अवज्ञा किये होते तो तुम भी वहां होते। अगर यहां मरना होता तो निःसंदेह स्वर्ग में रहने वाले असाधारण खुशी के कारण मर जाते इस कारण कि उनसे इन दंडों को हटा दिया गया है। उसके बाद आवाज़ आयेगी हे नरक में रहने वालो! अपने सिरों को ऊपर उठाओ और स्वर्ग में अपने स्थान को देखो। उसके बाद वे अपने सिरों को ऊपर उठायेंगे और स्वर्ग में मौजूद नेअमतों को देखेंगे। उसके बाद उनसे कहा जायेगा हां ये तुम्हारे घर हैं कि अगर तुम दुनिया में अपने पालनहार के आदेश का पालन किये होते तो तुम्हारा स्थान यहां था। इमाम ने फरमाया अगर मरना होता तो नरकवासी असफोस से दोबारा मर जाते और यह है ईश्वर का फरमान जो उसने फरमाया है” वे वही वारिस हैं जिन्हें वरासत में स्वर्ग दिया जायेगा।“

 

 

पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं जो भी रमज़ान के महीने में किसी अनाथ का सम्मान करता है यानी उसकी समस्याओं का समाधान करता है ईश्वर प्रलय के दिन उसे सम्मानित करेगा।“

अनाथों पर दया इस्लाम का एक आदेश है और मुसलमानों पर अनिवार्य है कि वे इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए बहुत प्रयास करें। क्योंकि विदित में अनाथ उसे कहते हैं जिसका कोई अभिभावक न हो इस प्रकार से कि केवल महान ईश्वर ही उसका सहारा हो और महान ईश्वर ने इस प्रकार के व्यक्तियों के अधिकारों को बहुत सम्मानीय बताया है और उन पर दया करने पर बहुत बल दिया है। अनाथों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये इसके हज़रत अली अलैहिस्सलाम का पावन जीवन बेहतरीन आदर्श है। अनाथों की सहायता करने में हज़रत अली अलैहिस्सलाम अग्रणी थे और इस बात की चर्चा सबकी ज़बानों पर थी और स्वयं हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं ईश्वर के लिए! ईश्वर के लिए! अनाथों के बारे में कभी ऐसा न करो कि कभी वे भूखे रहें और कभी उनका पेट भरा हो और उनके अधिकार नष्ट हो जायें।“

 

 

एक बार हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहीं जा रहे थे कि रास्ते में वह एक निर्धन महिला से अवगत हुए जिसके बच्चे भूख से रो रहे थे। उनकी मां ने कुछ कार्यों में उन्हें व्यस्त कर दिया उसके बाद खाली पतीली में पानी भर कर चूल्हे पर चढ़ा दिया ताकि इस बहाने से बच्चों को सुला दे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम यह दृश्य देखकर बहुत दुःखी हुए। इसके बाद वे अपने दास क़ंबर के साथ जल्दी से अपने गये और थोड़ी ख़जूर, आटा, चावल और तेल अपने कांधों पर रखा और जल्दी से उस महिला के घर लौट आये। जब उस महिला के घर पहुंच गये तो घर में प्रवेश की अनुमति मांगी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम जब महिला के घर में प्रविष्ट हो गये तो उन्होंने थोड़ा चावल और तेल एक पतीली में डालकर स्वादिष्ट खाना पकाया। उसके बाद उन्होंने जल्दी से बच्चों को जगाया और अपने हाथ से नेवाला बनाकर उन्हें खिलाया यहां तक कि उनके पेट भर गये। उसके बाद उनका दिल बहलाने के लिए हज़रत अली अलैहिस्सलाम चारों हाथ- पैर से ज़मीन पर चलने लगे और उन्हें अपनी पीठ पर सवार करते थे।

 

बच्चे भी चारों हाथ- पैर से हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पीछे –पीछे चलते और हंसते थे। कुछ देर तक बच्चों के साथ खेलते रहे यहां तक कि वे सो गये फिर हज़रत अली अलैहिस्सलाम घर से बाहर निकल गये। उनके दास क़ंबर ने कहा हे मेरे स्वामी! आज मैंने आप से दो चीज़ें देखीं एक का कारण जानता हूं जबकि दूसरे का कारण ज्ञात नहीं है। पहला यह कि खाने का सामान आपने अपने ही कांधों पर रखा और इस कार्य को आपने मुझे करने की अनुमति नहीं दी निश्चित रूप से इसका कारण यह था कि परलोक में इस कार्य का पुण्य बहुत है इसलिए आपने मुझे इसकी अनुमति नहीं दी परंतु आप चारों हाथ- पैर से चलते थे और बच्चों को अपनी पीठ पर सवार करते थे इसका कारण मेरी समझ में नहीं आया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फरमाया जब मैं इन अनाथ बच्चों के पास आया तो देखा कि वे भूख से रो रहे हैं और उनके चेहरों से अनाथ होने के चिन्ह स्पष्ट थे मैंने सोचा कि जब घर से निकलूं तो उनका पेट भरा हो और उनके चेहरों से अनाथ होने के चिन्ह मिट चुके हों।“