भारत को गुड तालेबान की तलाश
ख़बर यह है कि भारत जो पाकिस्तान के ख़िलाफ़ दुनिया भर में गुड तालेबान, बैड तालेबान की टर्मिनालोजी की बुनियाद पर प्रोपैगंडा किया करता था अब ख़ुद अपने लिए गुड तालेबान की तलाश में फिर रहा है। इस बात का ख़ुलासा भारत और अफ़ग़ानिस्तान के दो बड़े मीडिया संस्थानों ने किया है।
द हिंदुस्तान टाइम्ज़ ने अपनी एक ख़ास स्टोरी में भारत के सैनिक सूत्रों के हवाले से ख़बर दी कि भारत पिछले कुछ महीनों से उन तालेबान गुटों की तलाश में है जो राष्ट्रवाद का रुजहान रखते हों। दि हिंदुस्तान टाइम्ज़ और अफ़ग़ानिस्तान के मीडिया नेटवर्क तुलूअ न्यूज़ ने यहां तक दावा किया कि भारतीय सैनिक संस्थानों ने तालेबान नेतृत्व से संपर्क साध लिया है। कुछ सूत्रों का दावा है कि भारतीय प्रतिनिधियों की एक बड़े तालेबान नेता से मुलाक़ात हुई है जबकि कुछ का कहना है कि मुलाक़ात के लिए पैग़ामों का आदान प्रदान हुआ है।
मज़े की बात यह है कि भारत जैसे देश में जहां सिविल सोसायटी की पैठ है तालेबान के साथ संबंध स्थापित करने का काम सैनिक संस्थान कर रहे हैं। इस ख़बर में संदेह की गुंजाइश इसलिए नहीं है कि इस ख़बर का भारत सरकार की ओर से खंडन नहीं किया गया है। इस ख़बर को दस जून को तब और बल मिला जब भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत अफ़ग़ानिस्तान के पुनरनिर्माण के लिए विभिन्न फ़ोर्सेज़ के संपर्क में है।
दि हिंदुस्तान टाइम्ज़ ने इसे भारत की रणनीति में बुनियादी बदलाव का नाम दिया है और साथ ही यह भी कहा है कि भारत की सैनिक संस्थाएं तालेबान के उन कमांडरों से बातचीत कर रही हैं जो किसी भी देश के प्रभाव में नहीं हैं। हिंदुस्तान टाइम्ज़ ने लिखा है कि भारत ने पहली बार खुलकर तालेबान के उन गुटों से संपर्क शुरू किया जो पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भावनाएं रखते हैं। भारत यह काम अफ़ग़ानिस्तान से अमरीका की आनन फ़ानन में वापसी की वजह से कर रहा है।
इस नई स्थिति में कछ चीज़ें ख़ुलकर सामने आई हैं।
पहली बात यह कि तालेबान का तेज़ी से बड़े इलाक़ों पर क़ब्ज़ा देखकर भारत अब उत्तरी एलायंस और अशरफ़ ग़नी जैसे अपने घटकों से मायूस हो चुका है। भारतीय नीतिकार अब इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि तालेबान जल्द अफ़ग़ानिस्तान में निर्णायक पोज़ीशन में पहुंचने वाले हैं। भारत की संस्था गेटवे हाउस में इंटरनैशनल सेक्युरिटी स्टडीज़ के फ़ेलो समीर पाटिल इस स्थिति का विशलेषण करते हुए लिखते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सेना के चले जाने के बाद स्थिति अनिश्चित हो जाएगी। बस एक ही सच्चाई नज़र आ रही है कि गृह युद्ध की स्थिति पैदा होगी। हमें पुरानी झिझक को किनारे रखकर तालेबान से संपर्क का कोई न कोई रास्ता निकालना होगा।
अब अगर भारत कामयाब हो जाता है तो एक तो अफ़ग़ानिस्तान से बिल्कुल बेदख़ल हो जाने का ख़तरा उसके सामने से टल जाएगा और दूसरे यह कि वक़्त पड़ने पर वह तालेबान को आपस में ही भिड़ा सकता है।
भारत ख़ुद को अफ़ग़ानिस्तान का मज़बूत पक्ष समझता है और उसने वहां तीन अरब डालर की रक़म झोंक दी है लेकिन फिर भी वह वहां वैसी पैठ नहीं बना सका जो अफ़ग़ानिस्तान से संयुक्त सीमा रखने वाले देशों की है। भारतीय सैनिक संस्थानों को हाल ही में यह पता चला कि तालेबान के भीतर कुछ गुट एसे हैं जो पाकिस्तान विरोधी सोच रखते हैं। अब भारत इस्लामी सोच के बजाए राष्ट्रवादी सोच रखने वाले तालेबान गुट तलाश कर रहा है क्योंकि अगर कहीं यह गुट हैं तो वही पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खड़े हो सकते हैं। भारत के सैनिक अफ़सरों ने मीडिया को बताया कि पिछले साल भारत की हालत अफ़ग़ानिस्तान के मामले में पतली थी और लगने लगा था कि भारत अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर हो चुका है लेकिन अब हालात बदल गए हैं। इससे साबित होता है कि भारत को तालेबान के भीतर पांव जमाने की उम्मीद पैदा हो चुकी है।
ग़ुलाम मुहयुद्दीन रोज़नामा एक्सप्रेस पाकिस्तान
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