भारत में फिर तेज हुई अफस्पा क़ानून हटाने की मांग
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नागालैंड में सैनिकों की गोलीबारी में 14 लोगों की मौत के बाद एक बार फिर सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून अफस्पा को हटाने की मांग तेज हो गई है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Dec ०८, २०२१ ०७:३३ Asia/Kolkata
  • भारत में फिर तेज हुई अफस्पा क़ानून हटाने की मांग

नागालैंड में सैनिकों की गोलीबारी में 14 लोगों की मौत के बाद एक बार फिर सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून अफस्पा को हटाने की मांग तेज हो गई है।

भारत में अफस्पा क़ानून हटाने की मांग तेज़ हो गई है। नागालैंड और मेघालय में इस कानून को हटाने की मांग बहुत तेज़ी से उठाई जा रही है।  नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने कहा है कि हम केंद्र सरकार से नागालैंड से अफस्पा हटाने की मांग कर रहे हैं। इस कानून ने देश की छवि खराब की है।  उन्होंने कहा कि मैंने केंद्रीय गृह मंत्री से बात की है।  वे मामले को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं।

वहीं, मेघालय के मुख्यमंत्री कोनार्ड के संगमा ने कहा है कि अब वक्त आ गया है कि पूर्वोत्तर से अफस्पा को हटा दिया जाए। इस कठोर उत्पीड़न को तत्काल निरस्त करने के लिए सरकार को कदम उठाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि भारत के नागालैण्ड राज्य में सुरक्षाबलों के हाथों 14 आम लोगों की हत्या के बाद वहां पर हालात तनावपूर्ण हैं। भारतीय सुरक्षाबलों ने म्यांमार की सीमा से लगने वाले भारतीय राज्य नागालैण्ड में सुरक्षा बलों के हाथों 14 आम लोगों मृत्यु हो गई थी जिसे ग़लत पहचान का मामला बताया गया था।  सुरक्षाबलों का कहना है कि उन्होंने इन लोगों को आतंकवादी समझकर मार दिया।

याद रहे कि भारत के कुछ राज्यों में अफस्पा क़ानून लागू है।  सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून एएफएसपीए या अफस्पा क़ानून, भारतीय सुरक्षा बलों को देश में युद्ध जैसी स्थिति बनने पर अशांत क्षेत्रों में शांति व कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए विशेष शक्तियां देता है। इसके तहत सेना पांच या इससे ज़्यादा लोगों को एक जगह इक्ट्ठा होने से रोक सकती है। इसके तहत सेना को चेतावनी देकर गोली मारने का भी अधिकार है।

यह कानून सेना को बिना वारंट के किसी को भी गिरफ्तार करने की ताकत देता है। इसके तहत सेना किसी के घर में बिना वारंट के घुसकर तलाशी ले सकती है।

कई बार सुरक्षा बलों पर इस कानून का दुरुपयोग करने का आरोप लग चुका है।  उनपर यह आरोप फर्जी एनकाउंटर, यौन उत्पीड़न आदि के मामले को लेकर लगे हैं। बहुत से लोगों का कहना है कि यह कानून, मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है। इसे 1958 में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अध्यादेश के तौर पर पेश किया गया था, बाद में इसी वर्ष संसद ने कानून के तौर पर इसको पारित कर दिया था।