बलात्कार मामलों में महिला गर्भपात की हक़दार हैः हाईकोर्ट
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने बलात्कार पीड़िता की गर्भावस्था 24 सप्ताह से ज़्यादा होने की परिस्थिति में उसकी मेडिकल जांच के संबंध में दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता पर मातृत्व की ज़िम्मेदारी थोपना उसके सम्मानित जीवन जीने के मानवाधिकार के उल्लंघन के समान है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jan २७, २०२३ ११:५१ Asia/Kolkata
  • बलात्कार मामलों में महिला गर्भपात की हक़दार हैः हाईकोर्ट

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बलात्कार पीड़िता की गर्भावस्था 24 सप्ताह से ज़्यादा होने की परिस्थिति में उसकी मेडिकल जांच के संबंध में दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता पर मातृत्व की ज़िम्मेदारी थोपना उसके सम्मानित जीवन जीने के मानवाधिकार के उल्लंघन के समान है।

अदालत ने कहा कि यौन उत्पीड़न के मामले में पीड़िता को मातृत्व की जिम्मेदारी से बांधना उसे सम्मान से जीने के मानवाधिकार से वंचित करने के समान होगा क्योंकि उसे अपने शरीर के संबंध में फ़ैसले लेने का अधिकार है जिसमें उसे मां बनने के लिए ‘हां या ना’ कहने का अधिकार भी शामिल है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि यौन शोषण करने वाले पुरुष के बच्चे को जन्म देने के लिए पीड़िता को बाध्य करना अकथनीय दुखों का कारण बनेगा और बलात्कार या यौन शोषण के वे मामले जहां पीड़िता गर्भवती हो जाती है बहुत गहरा ज़ख्म देते हैं क्योंकि ऐसे में स्त्री को हर पल अपने साथ हुए उस हादसे के साये में जीना पड़ता है।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने आगे कहा कि यह मानसिक पीड़ा है जिसका मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी "एमटीपी" अधिनियम द्वारा ध्यान में रखा गया है जो न केवल गंभीर शारीरिक चोट बल्कि गर्भवती महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर भी ज़ोर देता है।

उच्च न्यायालय यौन शोषण के कारण गर्भवती हुई 14 साल की बच्ची द्वारा अपने 25 सप्ताह के भ्रूण का गर्भपात कराने का अनुमति मांगने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है।

अदालत ने कहा कि यह सोच कर ही रूह कांप जाती है कि ऐसे भ्रूण को अपने गर्भ में पाल रही पीड़िता पर क्या गुजरती होगी, जो हर पल उसे अपने साथ हुए बलात्कार का याद दिलाती है।

कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि गर्भावस्था से तुरंत जुड़े सामाजिक, वित्तीय और अन्य कारकों को देखते हुए, एक अवांछित गर्भावस्था का पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा।

बीते कुछ समय में गर्भावस्था के अंतिम महीनों में चिकित्सकीय देखरेख में गर्भ गिराने की अनुमति देने वाले न्यायिक आदेश का समर्थन करने वाले वकीलों ने कहा है कि इस तरह के मामलों में अदालतों के निर्देश महिलाओं के जीवन के मौलिक अधिकारों और गरिमा के साथ जीने के हक को मान्यता देते हैं। (AK)

 

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