परमाणु संग्राम की बयार
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अमरीका ने नेशनल सेक्युरिटी स्ट्रैटेजी के नाम से जो नया दस्तावेज़ जारी किया है उसमें कहा गया है कि यह धारणा कि भारत और पाकिस्तान के बीच सैनिक टकराव परमाणु युद्ध तक आगे जा सकता है, गहरी चिंता का विषय है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Dec २४, २०१७ १६:०५ Asia/Kolkata
  • परमाणु संग्राम की बयार

अमरीका ने नेशनल सेक्युरिटी स्ट्रैटेजी के नाम से जो नया दस्तावेज़ जारी किया है उसमें कहा गया है कि यह धारणा कि भारत और पाकिस्तान के बीच सैनिक टकराव परमाणु युद्ध तक आगे जा सकता है, गहरी चिंता का विषय है।

दस्तावेज़ में इस मुद्दे को किसी हद तक नज़रअंदाज़ किया गया है। इलाक़े के लिए किसी भी सुरक्षा रणनीति में दक्षिण एशिया में परमाणु युद्ध की रोकथाम प्रमुख मुद्दा होना चाहिए। डाक्टर किसिन्जर अपनी इस टिप्पणी में सही थे कि भारत पाकिस्तान युद्ध में परमाणु हथियारों के प्रयोग की काफ़ी संभावना है।

अतीत में पाकिस्तान और भारत कई संकटों के दौरान परमाणु टकराव के पहलू से सुरक्षित बच गए। आज दोनों ही देश जटिल टकराव में उलझे हुए हैं।

वर्ष 1971 में पाकिस्तान के समर्थन में चीन के हस्तक्षेप की संभावना सोवियत संघ की ओर से बीजिंग को दी जाने वाली धमकी की वजह से ख़त्म हुई।

वर्ष 1987 में भारत के सैनिक अभ्यास से पाकिस्तान को ख़तरा महसूस हो रहा था तो तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल ज़ियाउल हक़ ने नई दिल्ली में एक मैच देखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कान में कहा था कि पाकिस्तान को हाल ही में हासिल होने वाले एफ़-16 युद्धक विमान ट्राम्बे में भारत के परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच सकते हैं।

वर्ष 1990 में कश्मीर में संघर्ष की वजह से भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव जब बहुत बढ़ गया तो भारत ने युद्ध की धमकी दी थी। उस समय अमरीकी सैटेलाइटों ने डिटेक्ट किया था कि पाकिस्तान एफ़-16 विमानों पर फ़िट होने वाले मिसाइलों पर संदिग्ध परमाणु वारहेड फ़िट कर रहा है। उस समय सीआईए के निदेशक गेट्स ने तनाव को कम करने के लिए दक्षिणी एशिया का दौरा किया था।

मई 1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों बाद भारतीय नेताओं ने ज़ोर दिया कि भारत के परमाणु हथियारों ने शक्ति का संतुलन बदल दिया है। पाकिस्तान ने भारत को किसी भी विध्वंसकारी एडवेंचर से रोकने के लिए परमाणु परीक्षण किया।

पाकिस्तान के परमाणु परीक्षण से पहले वाली रात में भी एक संभावित टकराव को टाल दिया गया। पाकिस्तान के राडार ने भारत के पश्चिमी तटों से एफ़-15 विमानों की उड़ान डिटेक्ट की। यह विचार पैदा हुआ कि भारत और इस्राईल मिल कर पाकिस्तान को परमाणु परीक्षण से रोकना चाहते हैं। अतः नई दिल्ली, तेल अबीब और वाशिंग्टन को तत्काल वार्निंग जारी की गई लेकिन बाद में पता चला कि यह मामला नहीं था। द्विपक्षीय संवाद न होने की स्थिति में कभी भी ग़लत अनुमान के आधार पर युद्ध छिड़ जाने की ख़तरा रहता है।

कारगिल युद्ध के बाद अमरीका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कश्मीर को विश्व का सबसे प्रमुख न्युक्लियर फ़्लैशप्वाइंट कहा था और यह बात आज ही सच दिखाई देती है।

वर्ष 2002 में भारत और पाकिस्तान के बीच लंगे गतिरोध के दौरान कम से कम दो अवसर एसे आए जब पाकिस्तान को यह महसूस हुआ कि भारत के विमान हमले के लिए तैयार किए जा रहे हैं। सार्वजनिक बयानों में पाकिस्तान ने चेतावनी दी और भारत ने भी महसूस किया कि युद्ध से बड़ा नुक़सान होगा। इसके नतीजे में शांति प्रक्रिया बहाल हुई।

आज पाकिस्तान और भारत एक जटिल टकराव की स्थिति में है जो युद्ध का कारण बन सकती है और युद्ध बहुत तेज़ी से परमाणु युद्ध के स्तर तक पहुंच सकता है। अतीत से मिलने वाले पाठ पूरी तरह भुला दिए गए हैं।

भारत में इस समय नरेन्द्र मोदी की सरकार है जो अपनी मुस्लिम दुशमनी के लिए जाने जाते हैं। दूसरी बात यह है कि भारत नियंत्रित कश्मीर में उठ खड़े हुए हैं। इस समय का विद्रोह हुर्रियत नेताओं या पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर है। भारत इस विद्रोह को दबाने में सफल नहीं हुआ है।

तीसरी बात यह है कि भारत ने ’आतंकी हमलों’ के जवाब में ’सर्जिकल स्ट्राइक’ की धमकी दी है। नियंत्रण रेखा पर जारी तनाव इस प्रकार के हमलों का बहाना बन सकता है और फिर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है।

चौथी बात यह है कि वर्ष 2002 के गतिरोध के अनुभाव के बावजूद भारत ने पाकिस्तान से सीमित युद्ध की रणनीति बनाई है भारत ने स्ट्राइक फ़ोर्सेज़ को अगली पोज़ीशनों पर तैनात कर रखा है इस तरह भारत पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आकस्मिक हमला कर सकता है। जवाब में पाकिस्तान कम दूरी के परमाणु मिसाइलों का प्रयोग कर सकता है।

पांचवीं बात यह है कि भारत के वायु सेना प्रमुख ने कहा है कि भारत पाकिस्तान की परमाणु क्षमताओं का पता लगाकर उन्हें ध्वस्त करने में सक्षम है। पाकिस्तान को मालूम है कि भारत अपने बल पर यह काम नहीं कर सकता अतः पाकिस्तान में यह शंका उत्पन्न हो गई है कि कहीं अमरीका ने तो पाकिस्तान की परमाणु शक्ति को निष्क्रय करने की योजना नहीं बना ली है।

अमरीका अतीत में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करा चुका है लेकिन अब अमरीका को मध्यस्थ नहीं समझा जा सकता क्योंकि वह भारत का स्ट्रैटेजिक पार्टनर है।

इन हालात में पाकिस्तान के लिए ज़रूरी है कि परमाणु युद्ध से बचने के लिए वैकल्पिक कूटनैतिक मेकैनिज़्म का प्रयोग करे। इस मेकैनिज़म में चीन, यूरोपीय संघ, अमरीका और रूस का रोल हो सकता है जो वर्तमान संकट को दूर करने के उद्देश्य से भारत और पाकिस्तान से बात करें।

दक्षिण एशिया में परमाणु युद्ध की बहती बहार को नज़रअंदाज़ करना इलाक़े को एसे परमाणु युद्ध के संकट में उलझा सकता है जिसका अतीत में कोई उदाहरण नहीं है।

मुनीर अकरम

संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत