भारत और इस्राईल ने स्वर्ग में रचाया विवाह? पाकिस्तान क्या करे?
अपने हालिया भारत दौरे में इस्राईल के प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि दोनों के बीच रिश्ता स्वर्ग में हुए विवाह का रिश्ता है।
लेकिन पाकिस्तान के सिनेट चेयरमैन रज़ा रब्बानी ने कहा कि यह रिश्ता नरक के भीतर बना था। उन्होंने कहा कि अमरीका, इस्राईल और भारत के बीच उभरता गठजोड़ इस्लामी जगत के लिए बड़ा ख़तरा है।
यदि रज़ा रब्बानी और खुलकर बात करते तो उन्हें सऊदी अरब को भी इसी गठबंधन का हिस्सा बताना चाहिए था। सऊदी अरब ने अपने बयानों और कार्यवाहियों से इस्राईल की भरपूर मदद की है। सऊदी अरब ने स्वतंत्र फ़िलिस्तीन राज्य की स्थापना के लिए केवल बयान दिया है लेकिन रियाज़ सरकार ने फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास पर दबाव डाल कर उन्हें दूतावास तेल अबीब से बैतुल मुक़द्दस स्थानान्तरित करने के अमरीका के फ़ैसले को स्वीकार करने पर मजबूर करने की कोशिश की। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने साबित कर दिया है कि उनकी वफ़ादारियां किन शक्तियों के लए हैं।
वर्षों से भारत और इस्राईल के बीच व्यापार हो रहा है और ज़ायोनी शासन से इस्राईल के कूटनैतिक संबंध हैं। हज़ारों इस्राईली टूरिस्ट हर साल भारत जाते हैं। इस समय अमरीका और रूस के बीच इस्राईल भारत के लिए सबसे बड़ा हथियार सप्लायर है। इससे पहले तक भारत फ़िलिस्तीनी सेंटीमेंट का ख़याल रखती थी और इस्राईल से एक दूरी बना कर रखन की नीति पर चल रही थी।
अब नेतनयाहू का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया गया और इस दौरे के विरोध में कहीं बड़े पैमाने पर कोई प्रदर्शन नहीं हुआ इससे लगता है कि जनमत के स्तर पर भी इस मामले में भारत में बदलाव आ रहा है।
इस्राईल सोफ़िस्टिकेटेड वेपन सिस्टम तैयार करता है और बड़े पैमाने पर उसका निर्यात करता है। उसने पिछले साल हथियारों के निर्यात से साढ़े छह अरब डालर की रक़म प्राप्त की।
हालिया दौरे में नेतनयाहू 500 मिलियन डालर के मूल्य के एंटी टैंक मिसाइल सौदे को पुनः पटरी पर लाने में सफल हुए हैं। इससे पहले भारत ने सौदे को रद्द करने का मन बना लिया था। इस्राईल ने भारतीय सुरक्षा बलों को आतंकवाद निरोधक कार्यवाहियों की ट्रेनिंग देने का भी प्रस्ताव रखा है।
भारत यदि इस्राईल से गठजोड़ कर रहा है तो उसका कारण बिल्कुल साफ़ है लेकिन सऊदी अरब इस गठबंधन का हिस्सा केवल अमरीका को ख़ुश करने के लिए बन रहा है। कुछ लोगों का विचार है कि वाशिंग्टन का रास्ता तेल अबीब होकर गुज़रता है।
पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने ईरान की ओर झुकाव की नीति अपनाई तो इससे सऊदी अरब के सत्तासीन ख़ानदान में आक्रोश भर गया। ट्रम्प ने ओबामा की नीतियों पर बुल्डोज़र चलाते हुए तेहरान से हुए परमाणु समझौते से बाहर निकलने की धमकी दी और इस हरकत से उन्होंने जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन, रूस, चीन, यूरोपीय संघ तथा संयुक्त राष्ट्र संघ को भी नाराज़ किया। मगर यह वास्तव में इस्राईल और सऊदी अरब के कानों में बजाई जाने वाली बीन है। दोनों ही लालयित रहते हैं कि अमरीका किसी तरह ईरान के खिलाफ़ कोई कार्यवाही करे।
ट्रम्प के पाकिस्तान विरोधी ट्वीट के बाद जो पाकिस्तानी यह समझ रहे हैं कि अमरीका से निपटने के लिए उनके पास सऊदी अरब और चीन का सहारा मौजूद है उन्हें चाहिए कि नींद से जल्दी जाग जाएं और हालात का भांपने की कोशिश करें। इस्राईल और अमरीका की ओर सऊदी अरब का गहरा झुकाव उसे भारत के क़रीब ले जा रहा है। चीन का भी मामला यह है कि वह कभी भी भारत-पाक तनाव में पड़ने वाला नहीं है।
चीन भी पाकिस्तान की अस्थिरता और चरमपंथ को कंट्रोल करने की अनिच्छा से खिन्न है क्योंकि यह तत्व चीनी इंजीनियरों और वर्करों को निशाना बना रहे हैं। चीन ने पाकिस्तान को बार बार सुझाव दिया है कि सीपेक समझौते के लिए समस्याएं पैदा करने वाली राजनैतिक अस्थिरता को दूर करे। नवाज़ शरीफ़ अपने इस दृष्टिकोण में सही थे कि अपने हमें अपना घर ठीक करना होगा।
इरफ़ान हुसैन
पाकिस्तान के वरिष्ठ टीकाकार
(लेखक के विचार से पार्स टुडे हिंदी का सहमत होना ज़रूरी नहीं है)