गोडसे देशभक्त! क्या यह एहसान फ़रामोशी नहीं है?
भारत में राष्ट्रवाद और देशभक्ति की बहस कोई नई नहीं है लेकिन नरेन्द्र मोदी के सत्ताकाल में यह बहस अधिक गर्म रही। कई बार टीवी डिबेट में इस मुद्दे पर टकराव की भी नौबत आ गई।
कौन देश भक्त है और कौन नहीं है? कौन है जो किसी अन्य व्यक्ति के बारे में फ़ैसला कर सकता है कि वह देश भक्त है या नहीं? अर्थात देशभक्ति का प्रमाण किससे लिया जाए और किसको यह प्रमाण बांटने का अधिकार है? इस प्रकार के मुद्दे बार बार उठे।
हालिया दिनों नाथूराम गोडसे के बारे में बयान आए जिसने भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी की हत्या की थी।
अभिनेता से नेता बने कमल हासन ने एक कार्यक्रम में अपने बयान में कहा था कि आजाद भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था। कमल हासन ने कहा कि आजाद भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था और उसका नाम नाथूराम गोडसे था। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि यहां पर कई सारे मुस्लिम मौजूद हैं। मैं महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने खड़े होकर यह कह रहा हूं।
उनका यह बयान इस परिप्रेक्ष्य में था कि आतंकवाद के लिए मुसलमानों को ही दोषी मान लेना ग़लत है क्योंकि एक धारणा इस्लामी आतंकवाद के बारे में फैलाई जाती रही है और इस प्रकार के शिगोफ़े छोड़े जाते रहे हैं कि हर आतंकवादी मुसलमान ही क्यों निकलता है? हालांकि यह विचार बिलकुल ग़लत है क्योंकि गैर मुस्लिम आतंकवादियों के नाम भी सामने हैं।
इसी ग़लत धारणा के संदर्भ में बात करते हुए कमल हासन ने कहा कि आज़ाद भारत का पहला आतंकवादी हिंदू था और वह था गोडसे।
इस बयान पर भारी हंगामा हुआ और उनके खिलाफ़ चौतरफ़ा हमले हुए। इस बीच एक बेहद चौंकाने वाला बयान आया। भोपाल लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया है। उन्होंने कहा कि जो लोग सवाल उठा रहे हैं, उन्हें इस बार लोकसभा चुनाव में जवाब मिल जाएगा। प्रज्ञा ठाकुर ने कहा कि नाथूराम गोडसे देशभक्त थे। देशभक्त हैं और देशभक्त रहेंगे। उन्हें हिंदू आतंकवादी बताने वाले अपने गिरेबान में झांककर देखें।
यहीं से इस विषय की गंभीरता बढ़ जाती है। क्योंकि प्रज्ञा ठाकुर जब भाजपा की प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं तो उनके बयानों और विचारों को पार्टी की विचारधारा से जोड़ कर देखा जाएगा। प्रज्ञा ठाकुर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे के संबंध में भी बेहद आपत्तिजनक बयान दे चुकी हैं जिस पर भारी आपत्ति जताई गई थी और भाजपा बड़ी चतुराई से उनके बयान से पल्ला झाड़ रही थी लेकिन गोडसे के संबंध में उनके बयान से यह बात साफ़ है कि भाजपा के भीतर भी ज़रूर इस विचारधारा को समर्थन मिल रहा है वरना भाजपा प्रत्याशी के रूप में प्रज्ञा ठाकुर का मैदान में बने रह पाना शायद संभव न होता।
भारत में जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व प्रज्ञा ठाकुर करती हैं वह काफ़ी पुरानी है लेकिन भारत की ख़ूबसूरती भी यही है कि यहां हर विचारधारा को पनपने का मौक़ा मिलता है। भारत में अलग अलग विचारधाराओं के लोग बहुत लंबे समय से साथ रह रहे हैं। समस्या केवल तब बढ़ती है जब इसी संकीर्ण विचारधारा को पूरे देश पर थोपने की कोशिश की जाती है। मोदी सरकार पर यह गंभीर टिप्पणी की जाती है कि उसके दौरान संकीर्ण विचारधारा को पूरे भारत पर थोपने की कोशिश की गई जो भारत के मूल स्वरूप और मूल स्वभाव पर खुला हुआ अत्याचार है। भारत का स्वभाव यह नहीं है कि किसी पर अपनी विचारधारा थोपी जाए और किसी विचारधारा को कुचला जाए। जिस विचारधारा की प्रतीक प्रज्ञा ठाकुर हैं वह अगर भारत के मूल स्वभाव को कुचलने और बिगाड़ने की कोशिश कर रही है तो इसे एहसान फ़रामोशी के अलावा और क्या कहा जा सकता है?!