कश्मीर में एमनेस्टी इन्टरनेश्नल को प्रेस कांफ़्रेंस की नहीं मिली अनुमति
https://parstoday.ir/hi/news/india-i76178-कश्मीर_में_एमनेस्टी_इन्टरनेश्नल_को_प्रेस_कांफ़्रेंस_की_नहीं_मिली_अनुमति
भारत नियंत्रित कश्मीर के प्रशासन ने एमनेस्टी इंटरनेशनल को श्रीनगर में प्रेस कांफ्रेंस करने की इजाज़त नहीं दी।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jun १३, २०१९ १४:०४ Asia/Kolkata
  • कश्मीर में एमनेस्टी इन्टरनेश्नल को प्रेस कांफ़्रेंस की नहीं मिली अनुमति

भारत नियंत्रित कश्मीर के प्रशासन ने एमनेस्टी इंटरनेशनल को श्रीनगर में प्रेस कांफ्रेंस करने की इजाज़त नहीं दी।

प्रशासन का कहना है कि जन सुरक्षा अधिनियम के कथित दुरुपयोग के लिए बुधवार को आयोजित होने वाली प्रेस कांफ़्रेंस की अनुमति नहीं दी गयी। इस क़नून के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुक़द्दमे के एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने एक बयान जारी कर आरोप लगाया है कि जम्मू कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम जम्मू-कश्मीर में आपराधिक न्याय प्रक्रिया को ख़राब कर रहा है।

इसके साथ ही वैश्विक मानवाधिकार संस्था ने विवादास्पद जम्मू कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम को ख़त्म करने की भी मांग की। बता दें कि यह कानून पिछले 42 सालों से प्रभाव में है।

टायरनी ऑफ ए लॉलेस लॉ: डिटेंशन विदाउट चार्ज ऑर ट्रायल अंडर द जम्मू कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट’ टाइटल वाली इस रिपोर्ट को ऑनलाइन माध्यम से वैश्विक तौर पर जारी किया गया। हालांकि, एमनेस्टी के कर्मचारियों को इस रिपोर्ट पर राज्य में प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करने दिया गया।

एमनेस्टी के एक प्रवक्ता ने बताया कि प्रशासन ने संस्था को इस विषय पर प्रेस कांफ्रेंस करने की इजाजत नहीं दी। उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था की वर्तमान स्थिति को को कारण बताते हुए हमसे कहा गया कि हमें कार्यक्रम करने की औपचारिक अनुमति नहीं दी जा रही है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के प्रमुख आकार पटेल ने कहा कि यह क़ानून राज्य प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच तनाव बढ़ाने का काम करता है और इसे तत्काल ख़त्म किया जाना चाहिए।

संस्था का कहना है कि उसने 2012 से 2018 तक जन सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ़्तार 210 बंदियों के मामलों का विश्लेषण किया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2007-16 के बीच 2400 से अधिक पीएसए हिरासत के आदेश जारी किए गए। हालांकि, उनमें से अधिकतर फर्जी निकले क्योंकि उनमें 58 फीसदी अदालत द्वारा खारिज कर दिए गए। अकेले साल 2016 में इस अधिनियम के तहत 525 लोगों को हिरासत में लिया गया। (AK)