भारत और उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब को किस की नज़र लग गई?
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भारत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में संशोधन कर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया। इस प्रदेश को विभाजित कर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। फ़ैसले के समय जम्मू-कश्मीर के छोटे-बड़े नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया जो और उनकी नज़रबंदी अभी भी जारी है। जम्मू-कश्मीर में संचार के साधनों को बंद कर दिया गया सभी जगह अर्धसैनिक बल के जवान तैनात कर दिए गए।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Aug २८, २०१९ १४:१२ Asia/Kolkata
  • भारत और उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब को किस की नज़र लग गई?

भारत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में संशोधन कर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया। इस प्रदेश को विभाजित कर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। फ़ैसले के समय जम्मू-कश्मीर के छोटे-बड़े नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया जो और उनकी नज़रबंदी अभी भी जारी है। जम्मू-कश्मीर में संचार के साधनों को बंद कर दिया गया सभी जगह अर्धसैनिक बल के जवान तैनात कर दिए गए।

यह एक ऐसा विषय है कि जिसके बाद एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब की छवि को गहरा धक्का लगा है। वैसे तो जिस तरह भारत की मोदी सरकार और उसके गृह मंत्री अमित शाह बार-बार कह रहे हैं कि यह उसका आंतरिक मामला है और वह इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार रखते हैं, इस बात को अगर एक बार स्वीकार भी कर लिया जाए तो भी उस मंशा को कैसे स्वीकार किया जाए जिसके आधार पर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक धर्म के नाम पर राजनीति, कार्यवाही, फ़ैसले और राणनीति बनाई जा रही हैं। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि यह साफ़ है कि नई दिल्ली ने जो फ़ैसला लिया है वह भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है, केवल इस वजह से नहीं कि यह निर्णय कश्मीर पर लिया गया इसलिए ग़लत है बल्कि इस वजह से कि मोदी और उनकी टीम कल किसी और भारतीय राज्य के लिए भी ऐसा ही कोई फ़ैसला अचानक ले सकती है।

इसी तरह पिछले कुछ वर्षों में कट्टरपंथी हिन्दुओं द्वारा मॉब लिंचिंग जैसी ग़ैर मानवीय और बर्बरतापूर्ण घटनाएं सामने आई हैं जिसमें कथित तौर पर बीफ़ खाने और हिंदूवादी नारे नहीं बोलने पर मुसलमानों को निशाना बनाया गया है। इसके लिए किसी और को ज़िम्मेदार ठहराया जाए उससे पहले यह कहना सही होगा कि सत्ता में शामिल और बड़े पदों पर बैठे लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर फैलाई जा रही कट्टरता से भारत का नैतिक चरित्र प्रभावित हुआ है और इस महान धर्मनिरपेक्ष देश की छवि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ख़राब हुई है। वैसे कुछ लोगों का यह भी मानना है कि, ईशनिंदा जैसे विषयों से जुड़े क़ानूनों ने धार्मिक चरमपंथ को बढ़ावा दिया है और अल्पसंख्यक पहले से अधिक असहाय और असुरक्षित हो गए हैं। धार्मिक कट्टरपंथ अब देश के लोकतांत्रिक संस्थानों पर भी असर डालने लगे है। राजनीतिक दलों में धार्मिक कट्टरता का मुक़ाबला करने का संकल्प कमज़ोर पड़ रहा है। दक्षिण एशिया में भारत सबसे स्थिर लोकतंत्र है। जहां अब कट्टरपंथी हिंदू समर्थक दक्षिणपंथी दल अपने बल पर सत्ता में है। लेकिन वह हिंदुत्व के एजेंडे पर नहीं बल्कि विकास और एक सुशासन के नारे पर सत्ता तक पहुंची है। सरकार तो अपने एजेंडे पर कायम है लेकिन इससे जुड़े हिंदू संगठन पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं।

कुल मिलाकर मुझे लगता है कि भारत में सहनशीलता की अधिक ज़रूरत है क्योंकि हमारी विविधता की जड़ें काफ़ी गहरी है। हमें दूसरे की पूजा पद्धति, उनके रंग, उनके खाने के तरीक़े और भाषा को स्वीकार करने की ज़रूरत है। यही हमारी ताक़त रही है और इसे कमज़ोर करना हमारी सबसे बड़ी विफलता होगी। हम सबको भारत को वैसा ही महान देश बनाना है जैसा सपना इस देश की आज़ादी के लिए बलिदान देने वालों ने देखा था। वैसे सत्य यही है कि भारत की धर्मनिरपेक्षता की जड़ें बहुत मज़बूत हैं और मौसमी कट्टरवाद और चरमपंथ की हवाएं इस गंगा-जमुनी तहज़ीब की नींव पर मज़बूती से ख़डे देश की कुछ समय के लिए भले ही हवा दूषित कर दें लेकिन आने वाला समय एक बार फिर ऐसे सभी लोगों को उनके असली स्थान पर पहुंचा देगा और इस महान देश में प्यार, मोहब्बत, भाईचारा और धर्मनिरपेक्षता के फूल खिलेंगे। (रविश ज़ैदी)