मोदी और शाह द्वारा कश्मीर फ़तह को इतिहास कैसे याद रखेगा?
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5 अगस्त को जब भारतीय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने आर्टिकल 370 और 35ए को ख़त्म करने का एलान किया था तो सोचा था कि उन्होंने वह कारनामा कर दिखाया है जो नेहरू और सरदार पटेल नहीं कर सके।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Sep ३०, २०१९ १४:५४ Asia/Kolkata
  • मोदी और शाह द्वारा कश्मीर फ़तह को इतिहास कैसे याद रखेगा?

5 अगस्त को जब भारतीय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने आर्टिकल 370 और 35ए को ख़त्म करने का एलान किया था तो सोचा था कि उन्होंने वह कारनामा कर दिखाया है जो नेहरू और सरदार पटेल नहीं कर सके।

कश्मीर को प्राप्त विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म करके दोनों ही नेता एक दूसरे की कमर थपथपा रहे थे और उनके भक्त कश्मीर की फ़तह का जश्न ऐसे मना रहे थे, जैसे उन्होंने जंग का वह मैदान मार लिया हो जिसे पिछले 70 वर्षों से कोई योद्धा नहीं जीत पाया हो।

इस मैदाने जंग में मोदी और शाह के सेनापति हैं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, जिनकी चालों और चालाकियों पर दोनों को बहुत भरोसा है। मोदी का भक्त मीडिया इस जीत पर झूम उठा और टीवी चैनलों के एंकरों ने "नेहरू की 70 साल पुरानी ग़लती को प्रधान मंत्री मोदी ने सुधारा" शीर्षक लम्बे लम्बे क़सीदे प्रधान मंत्री की शान में गला फाड़ फाड़कर पढ़ने लगे।

इसके साथ ही देश वासियों और कश्मीरियों को यह समझाने की कोशिश की जाने लगी कि यह फ़ैसला कश्मीर और कश्मीरियों के हक़ में लिया गया है, क्योंकि आर्टिकल 370 कश्मीर और कश्मीरियों के विकास में सबसे बड़ी रुकावट थी और इसके रहते कश्मीर में जारी संकट का समाधान संभव नहीं था।

यह बिल्कुल ऐसे ही है जैसे किसी बच्चे के हाथ से कोई बहुत ही क़ीमती चीज़ लेने के लिए उसे लॉलीपॉप थमा दी जाए।

मोदी सरकार के इस फ़ैसले पर एक दो विरोधी आवाज़ें भी बुलंद हुईं, लेकिन जीत के जश्न में वह सुनी अनसुनी सी हो गईं।

लेकिन इस ऐतिहासिक फ़ैसले को क़रीब दो महीने बीत रहे हैं और कश्मीरी समझने के लिए तैयार नहीं हैं कि यह क़दम उनकी ही भलाई के लिए उठाया गया है, वरना मोदी और शाह को क्या ज़रूरत थी इतना बड़ा जोखिम उठाने की।

मोदी सरकार ने कश्मीरियों को उनकी भलाई समझाने के लिए क्षेत्र में पहले से तैनात लाखों सैनिकों की संख्या में इतना इज़ाफ़ा कर दिया कि कश्मीर को दुनिया का सबसे अधिक सैनिकों की तैनाती वाला क्षेत्र बना दिया।

इस दौरान कश्मीरियों की सुरक्षा का इतना अधिक ख़याल रखा गया कि हर तरह के संचार माध्यमों, टेलीफ़ोन, मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं को बंद कर दिया गया और क़रीब 13,000 कश्मीरी युवाओं को उनके घरों से उठा लिया गया। उनमें एक बड़ी संख्या 8 से 14 साल तक की उम्र के बच्चों की है।

पूर्ण प्रतिबंधों और कश्मीर में भारतीय सैनिकों की बर्बर कार्यवाहियों और बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों से तो ऐसा ही लगता है कि सेना मोदी और शाह की फ़तह के इस जश्न में कश्मीरियों को ख़ुशियां मनाने का मौक़ा नहीं देना चाहती है।

इतने लम्बे समय तक प्रतिबंध और कर्फ़्यू से जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं बढ़ने लगी हैं वहीं भारत में कश्मीर की फ़तह का जश्न मनाने वालों को भी मोदी सरकार के इस फ़ैसले पर संदेह होने लगा है। उन्हें यह लगने लगा है कि कहीं यह कश्मीर का फ़ैसला भी राष्ट्र के लिए नोटबंदी और जीएसटी की तरह घातक साबित तो होने नहीं जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि ख़ुद बीजेपी में कश्मीर की स्थिति को लेकर बैचेनी देखने में आ रही है और मोदी और शाह ने डोभाल को पिछले कुछ दिन के दौरान कई बार नई दिल्ली तलब किया है और अपनी चिंताओं से उन्हें अवगत करवाया है।

कश्मीर पर मोदी सरकार के फ़ैसले की नोटबंदी से तुलना करने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि इन दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। इसलिए कि मनमाने ढंग से की गई नोटबंदी से केवल देश की अर्थव्यवस्था को झटका लगा है, जिसे अगले कुछ वर्षों के दौरान ज़रूरी क़दम उठाकर सुधारा जा सकता है, लेकिन आर्टिकल 370 के हटाने से जो नुक़सान भारतीय समाज को पहुंचने जा रहा है उसकी भरपाई शताब्दियों में भी संभव नहीं होगी।

बहरहाल मोदी और शाह जिन्हें इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की बड़ी चाह है, कहीं इतिहास के लिए कलंक नहीं बन जाएं, जिनकी मिसालें इतिहास के पन्नों में भरी पड़ी हैं। msm