मोदी के हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों की स्थिति की एक निष्पक्ष समीक्षा
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के हिंदू-राष्ट्रवादी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार ने मुसलमानों को आधिकारिक रूप से हाशिए पर धकेलने की दिशा में एक बड़ा क़दम उठाया है।
भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा में धर्म के आधार पर नागरिकता प्रदान करने वाले विधेयक को भारी बहुमत से पारित कराने में सफलता हासिल करके मोदी सरकार ने यह साबित कर दिया है कि परिस्थितियां कुछ भी हों वह हिंदुत्व का एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित है।
इस विधेयक के क़ानून में परिवर्तित होने के बाद, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से भारत पहुंचने वाले मुसलमान प्रवासियों को छोड़कर अन्य धर्म के अनुयाईयों को नागरिकता देने का रास्ता साफ़ हो जाएगा।
1947 में भारत ने जब स्वतंत्रता प्राप्त की थी तो उसके संस्थापक नेताओं ने धर्मनिरपेक्षता के आधार पर देश की नींव रखी थी, जिसे मूल रूप से बदलने के लिए यह अभी तक का सबसे घातक वार है।
लोकसभा में कुछ घंटों की बहस के बाद 11-12 दिसम्बर की आधी रात को यह विधेयक 80 के मुक़ाबले 311 वोटों से पारित हो गया।
भारतीय मुसलमान गहरी निराशा और चिंता में डूबे हुए हैं। इसलिए कि विश्व में मुसलमानों की क़रीब सबसे अधिक आबादी को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने के एजेंडे का अब तक का यह सबसे महत्वपूर्ण क़दम माना जा रहा है, जिसके बाद मुसलमानों की एक बड़ी आबादी स्टेटलैस या राज्यविहीन होकर रह जाएगी।
दर असल, आरएसएस और बीजेपी के नेताओं का यह मानना है कि हिंदुस्तान सिर्फ़ हिंदुओं के लिए है और 1947 में देश के विभाजन के बाद मुसलमान हिंदुस्तान में रहने का अधिकार खो चुके हैं। उन्होंने देश में मौजूद 20 करोड़ से अधिक मुसलमानों की समस्या का समाधान निकालने या दूसरे शब्दों में उन्हें ठिकाने लगाने के विभिन्न विकल्पों पर गहन विचार किया और आख़िर में इस नतीजे पर पहुंचे कि इतनी बड़ी संख्या को न ही कोई देश स्वीकार करेगा और न ही इसे नस्लकुशी के ज़रिए मिटाया जा सकता है, हां इसे टुकड़ों टुकड़ों में बांटकर और एक एक करके उसके अधिकार छीनकर इतना कमज़ोर बनाया जा सकता है कि उसे दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर रहने पर मजबूर किया जा सके।
सोमवार को विधेयक पर बहस करत हुए मुस्लिम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, "हम सर्वसत्तावाद (totalitarianism) की ओर बढ़ रहे हैं और भारत को एक फासीवादी राष्ट्र बना रहे हैं।" यह कहते हुए उन्होंने विधेयक की कॉपी के टुकड़े टुकड़े कर दिए। उन्होंने कहाः "हम भारत को एक धर्मशासित (theocratic) देश बना रहे हैं।"
यह विधेयक इसी साल असम राज्य में शुरू हुए एक विवादास्पद कार्यक्रम के बाद लाया गया है, जिसमें राज्य के सभी 3 करोड़ 30 लाख निवासियों को दस्तावेज़ी साक्ष्य के साथ यह साबित करना था कि वे या उनके पूर्वज भारतीय नागरिक थे। लगभग 20 लाख लोगों को जिनमें एक बड़ी संख्या मुसलमानों की है और कई पीढ़ियों से भारत में रहे हैं, स्टेटलैस कर दिया गया।
अब मोदी सरकार ने घोषणा की है कि इस नागरिकता की इस परीक्षा को कि जिसे एनआरसी कहा जा रहा है, पूरे देश में लागू किया जाएगा। और इसके बाद नया क़ानून उन लोगों के लिए कि जो ख़ुद को भारतीय कहते हैं, एक मानदंड बन जाएगा।
2014 में जब से केन्द्र में मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ है, देश में मुसलमानों को राजनीतिक व सामाजिक स्तर पर हाशिए पर धकेलने के प्रयास किए जा रहे हैं।
सबसे पहले असम में नागरिकता परीक्षा ली गई। उसके बाद कश्मीर की अर्ध स्वायत्ता को समाप्त किया गया। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर निर्माण के लिए दे दी गई।
पिछले दशकों के दौरान बांग्लादेश से हिंदू और मुसलमान दोनों ही असम पहुंचे थे। भारत के गृह मंत्री और बीजेपी की जीत के सूत्राधार समझे जाने वाले अमत शाह ने हालिया दिनों में कई बार यह वादा किया है कि उनकी सरकार हिंदुओं को संरक्षण देगी और बांग्लादेश से आने वाले (मुस्लिम) घुसपैठियों को चुन चुनकर बाहर निकालेगी।
मोदी सरकार पहले से ही हज़ारों प्रवासियों के लिए जेलों का एक विशाल नेटवर्क तैयार कर रही है। नए विधेयक के क़ानून बनने की स्थिति में हिंदू प्रवासियों को नागरिकता प्रदान कर दी जाएगी और मुस्लिम प्रवासियों को इन शिविरों में डाल दिया जाएगा।
असम में एक मानवाधिकार अधिवक्ता वदूद का कहना है कि हर राज्य में मुसलमान दस्तावेज़ों के लिए भाग दौड़ कर रहे हैं। देश में एक भय का वातावरण उत्पन्न कर दिया गया है। msm